LAW OF ATTRACTION

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LAW OF ATTRACTION

 

प्र.1 Law of attraction की थ्योरी क्या है?
उत्तर :
ये बहुत ही रूचिकर थ्योरी है और ये थ्योरी ग्रेविटी थ्योरी जैसी ही है और चाहे हम माने या ना माने, ये अपना काम करती है। मैं ऐसा महसूस करता हूँ कि हमारी ैवबपमजल में जो यह समस्याएँ आ रही हैं, जैसे – महिलाओं को लेकर जो समस्याएँ आज समाज में व्याप्त हैं, ये कहीं ना कहीं हमारी ही कमी है। क्योंकि हमारी सोच नकारात्मक होती जा रही है। तो हमारे साथ घटनाएँ भी नकारात्मक ही घटित हो रही हैं और परीक्षा के दौरान भी यह देखा जाता है कि कुछ लोग तो कम पढ़ कर भी अधिक अंक ले आते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग दिन भर पढ़ने के बाद भी कम अंक प्राप्त कर पाते हैं। इसीलिये यह विषय है आपकी भावनाओं का आपके संवेग का और आपकी सोच का । तो जितनी आपकी सोच सकारात्मक होगी उतना ही परिणाम भी सकारात्मक होगा।
प्र.2 क्या Law of attraction की थ्योरी वैज्ञानिक है या सिर्फ मानसिकता बदलने अथवा सकारात्मकता लाने का एक जरिया मात्र है?
उत्तर :
यह एक बहुत ही अच्छा प्रष्न है क्योंकि लोग इसे एक आदर्ष बात मानते हैं। लेकिन यहाँ मैं लोगों को बताना चाहूँगा कि यह कोर्इ आदर्ष नहीं बलिक इसके पीछे विज्ञान है। इस बात को सत्यापित करने के लिए मैनें शरीर की संरचना पर काफी अध्ययन किया तो मैंने पाया कि हमारे पूरे शरीर में से हमारा सिर्फ मसितष्क 2 से 3 सेमी. आकार का है और हमारे षरीर की ऊँचार्इ लगभग 5.5 से 6 फीट होती है तो समस्या ये उत्पन्न होती है कि हम जब भी कोर्इ चीज सोचते हैं तो इससे हमारी सोच का एक पैटर्न बनता है जिसे हम इलैक्ट्रो मैग्नेटिक वेव्स भी कहते हैं और देखा जाये तो भौतिक विभान में भी इस पर काफी काम हो रहा है। इसे क्वान्टा फिजिक्स भी कहा जाता है। क्वान्टा अर्थात बहुत छोटा नैनो पार्टिकल। हम जो भी सोच रहे हैं तो हमारी सोच की तरंगें नियमित रूप से घूमती है। कभी वो आपस में मिल जाती हैं तो कभी एक दूसरे से अलग हो जाती है। इसी तरह यह प्रक्रिया नियमित रूप से चलती रहती है। इसका मतलब हमारे शरीर की सबसे ताकतवर व मजबूत मषीन, हमारे मसितष्क से इलैक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगे निकलती हैं जो हमेषा घूमती हैं और हमारी ये सोच की तरंगेें जो इलैक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों के रूप में घूम रही हैं। अपनी समकक्ष समान आवृत्ति वाली तरंगों को ढूंढती हैं इसीलिये मनुष्य आम जिन्दगी में अक्सर यह बोलते हैं अभी-अभी यह काम सोचा और वो हकीकत में पूरा हो गया। तो यह सिद्ध होता है कि यह कोर्इ आदर्ष नहीं बलिक पूरी तरह विज्ञान द्वारा सत्यापित है।
प्र.3 करियर में ये थ्योरी कैसे इम्पीलमेंट होती है ? और ये पूरी प्रक्रिया कैसे काम करती है?
उत्तर :
करियर की बात करें तो आप देखेंगे कि बहुत से लोग प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में व्यस्त हैं उनमें कुछ CA बनना चाहते हैं तो कुछ CS, कोर्इ बैंक की तैयारी कर रहा है तो कोर्इ टीचर बनना चाहते हैं। इनमें से कोर्इ ना कोर्इ किसी परीक्षा की तैयारी में लगा है। इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है आपका किसी बात को सोचने का तरीका कैसा है? क्या आपको लगता है कि परीक्षा में पेपर सिलेबस से बाहर का आयेगा। या फिर आप अनुभव करते हैं कि आपका पेपर अच्छा नहीं होने वाला है। या फिर अपनी याददाष्त कमजोरी होती महसूस समझते हैं। चाहे आप कुछ भी नकारात्मक सोचें पर मानके चलिये इन सब बातों से आपका ऊर्जा स्तर कम ही होता है। अगर आप सकारात्मक सोचेंगे तो आप अधिक ऊर्जावान बनेंगे आपके विचारों में भी ऊर्जा ही रहेगी। इसीलिये व्यावहारिक जीवन में आपने बहुत से लोगों को कहते हुए सुना होगा कि हम जो सोचते हैं वही परीक्षा में आ जाता है। इसके विपरीत कुछ कहते हैं कि जो सोचा, कभी नहीं आया। इसलिये मुझे यकीन है कि यदि आप सकारात्मक सोच रखेंगे तो आपके विचार सही दिषा में कार्यानिवत होंगे और जीवन में आप अधिक अर्जित कर पायेंगे।


प्र.4 क्या इस थ्योरी का कोर्इ व्यकितगत अनुभव या कोर्इ उदाहरण है, जो आपके साथ हुआ हो या आपने होते देखा हो ?
उत्तर :
जी हाँ, अगर किसी भी अनुभवी व्यकित का जिक्र करें तो वो आज जिस भी स्तर पर पहुंचे, उसे सोचने व उस पर अमल करन के बाद ही पहुंचे। हम जिनके बारे में सकारात्मक सोचते हैं वो चीजें हमार आसपास आने लग जाती हैं। यहाँ मैं आपको अपने जीवन का उदाहरण देना चाहूंगा। मैं बचपन से ही किताब लिखने में इच्छुक था। तो मैंने 15 से भी अधिक अलग-अलग विषयों पर किताबें लिख डाली क्योंकि मैं लिखना चाहता था और सोच का ये पेटर्न मैं अपने मसितष्क में विकसित कर रहा था। बावजूद इसके मैं मध्यम वर्ग परिवार से था, फिर भी मैं हमेषा सपने देखता था कि मैं समाज में एक उधमी के रूप में अपनी एक अलग पहचान कायम करूंगा और मैं भी समाज में व्याप्त बेरोजगारी को दूर करने के लिए अपने निर्देषन में दूसरे व्यकितयों का काम दूंगा। और आज आप देखेंगे कि मैं जो सोचता था वो मेरा सपना सच हो गया। अब एक अहम बात ये है कि इस स्ंूष्वषिजजतंबजपवद की थ्योरी में क्या सिर्फ आपके विचारों का ही महत्त्च है । तो मैं आपको बता दूं कि इसमें सिर्फ विचार ही नहीं बलिक विचारों के साथ भावनाएं भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। और जब विचारों व भावनाओं का संयोजन होता है तो आपकी सोचने की आवृत्ति शकितवान हो जाती है। पर यदि आप बात तो अच्छी कर रहे हैं लेकिन आपको अनुभव अच्छा नहीं हो रहा है इसमें एक चीज सकारात्मक व दूसरी नकारात्मक है। और गणितीय नियम के अनुसार सकारात्मक और नकारात्मक को मिलाने पर परिणाम नकारात्मक ही आता है। तो जैसा आपका सोचने का तरीका होगा आपको अनुभव भी वैसा ही करना पड़ेगा।
प्र.5अगर यूथ इस ला को अपनाना चाहे तो इसे कैसे प्रयोग करना चाहिए कि उन्हें इसके जरिये कामयाबी मिले?
उत्तर :
ये निषिचत रूप से यूथ के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है अगर वो इसे समझ जायेंगे तो मेरा मानना है कि उनके करियर की राह बहुत ही आसान हो जायेगी। व्यकितगत रूप से इस ला को उपयोग करने के कुछ स्टेप्स हैं जिनका अनुसरण करके हम कामयाबी की तरफ बढ़ सकते हैं और अपने सपनों को हकीकत में बदल सकते हैं। इसे प्रयोग करने के चार स्टेप्स हैं जिन्हें यदि अपनाया जाये तो आप जो सपना देख रहे हैं, वो एक दिन जरूर साकार होगा। अगर इसे प्रमाणित करना हो तो आप किसी विशेषज्ञ व सफल व्यकित से पूछेंगे तो पायेंगे कि उन्होंने भी जीवन में कामयाब होने के लिये यही चार काम किये होंगे जिनकी वजह से उन्होंने अपने जीवन में अपने लक्ष्य को प्राप्त किया।
सूत्र नं.1 : अपने उद्देश्य को निर्धारित व स्पष्ट करें –
सबसे पहले अपने सपने को, अपने उद्देश्य को निर्धारित करें। पूर्ण रूप से उसे स्पष्ट करें उसमें किसी भी प्रकार के संदेह की आषंका ना हो। उदाहरण के लिये यदि आप किसी कम्पनी के ब्थ्व्ष्बनना चाहते हैं तो पहले कम्पनी का ढांचा आपके मसितष्क में स्पष्ट होना चाहिए कि किस सेक्टर की कम्पनी में आप जाना चाहते हैं यह पूर्ण रूप से आपको पता होना चाहिए। इसी प्रकार यदि आप किसी भी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हैं तो पहले उसे अपने मसितष्क में दृढ़ करिये फिर ही उस दिषा में आगे बढि़ये। क्योंकि ये ब्रह्रााण्ड आपकी भाषा व संस्कृति को नहीं समझता। आपकी अस्पष्ट सूचनाएँ वहां तक नहीं पहुंच पाती हैं। हाँ लेकिन ये ला आपके मसितष्क में जो उद्देश्य रूपी छवि जो उत्पन्न हुर्इ है और स्पष्ट भी है तो उसे जरूर समझता है।
सूत्र नं. 2 : उद्देश्य को लिखना –
जब आपके मसितष्क में आपके उद्देश्य स्पष्ट हो जाये तत्पश्चात उनको लिखा जाना अत्यन्त आवश्यक है। और अपने शरीर की सबसे शकितशाली उपकरण मसितष्क को इसे बार-बार दिखाइये कि यह मेरा उद्देश्य है, मैं इसे पाने के लिए उत्साहित हूँ और मैं इसे जीवन में हासिल करके ही रहूँगा। इसे अपने सामने उस हर जगह लगा डालिये जहाँ से यह आपको बार-बार दिखार्इ दे और आपके मसितष्क में उसे देखकर हलचल हो।
सूत्र नं. 3 : मानस दर्षन अर्थात विज्यूलाइजेषन –
आपके अपने उद्देश्य का मानस दर्षन करना है उसे लेकर कल्पना करनी है कि आपने उसे अपने जीवन में प्राप्त कर लिया है और अधिक से अधिक उसे महसूस करना है ताकि उससे संबंधित संवेग व भावनायें आपमें उत्पन्न हो और उसे पाने के लिए आपके अन्दर एक जाष बना रहे।
सूत्र नं. 4 : प्रयत्नपूर्वक रहिए –
आपके अपने उद्देश्य को पाने के लिए हमेषा प्रयत्नपूर्वक रहना चाहिए। आपके उद्देश्य के लिए किये गये प्रयत्न ही आपको सफलता दिलाने का जरिया बनते हैं। उदाहरणार्थ अगर आपको विदेष जाना है तो जब तक आपका पासपोर्ट नहीं बनेगा तब तक आप जा नहीं सकते। इसीलिये ये बहुत महत्वपूर्ण सूत्र है। आपके प्रयासों में सच्चार्इ व र्इमानदारी होनी चाहिए। आपको खुद पर एक अटूट विष्वास करना चाहिए कि हाँ ये काम आप कर सकते हैं। कभी-2 किन्हीं परिसिथतियों में आपको आत्म प्रेरित भी होना पड़ सकता है।
ये वो चार सूत्र हैं जिन्हें अपनाकर आप जीवन में कामयाबी हासिल कर सकते हैं व सफलता की ऊँचार्इयों को छू सकते हैं।
प्र.6 हम अपने जीवन में कर्इ कुछ चीजों को लेकर बहुत कल्पना करते हैं लेकिन उसे प्राप्त नहीं कर पाते। क्या कुछ ऐसी चीजें भी हैं जो हमें नही करनी चाहिए?
उत्तर :
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान आपको एक ही काम है जो नहीं करना है – नकारात्मक सोच! आप जितना हो सके अपने आपको नकारात्मकता से दूर रखें। आपको सिर्फ सकारात्मक ही बने रहना है और जीवन में सकारात्मकता बढ़ाने का एकमात्र उपाय कृतज्ञता है। और सिर्फ एक षब्द शुक्रिया आपके पूरे जीवन को सकारात्मक बना देता है। जैसा मैनें पहले भी जिक्र किया है कि हर समय ये अनुभव करिये कि आप बहुत ही आभारी हैं, सौभाग्यषाली हैं कि आप मनुष्य बने और आपमें अपने लक्ष्य को पाने की काबिलियत है।
इस प्रकार आप अगर इन चारों सूत्रों को अपनायेंगे तो अधिक सकारात्मक बन सकेंगे और मुझे लगता है कि आपको वो चीजें मिल ही जाती हैं जिनकी कभी आपने कल्पना की थी। आप अधिक ऊर्जावान बन जाते हैं। वाकर्इ ये प्रक्रिया यदि कोर्इ व्यकित अपने जीवन में अपनाता है तो उसका ना सिर्फ करियर बलिक जीवन भी सरल व उíेष्यपूर्ण बन जाता है।
मैनें जो सुझाव आपको दिये हैं उसे जीवन में र्इमानदारी से अपनायें, अच्छा सोचें व थोड़ी मेहनत करें। मैं यकीन के साथ कहता हूँ कि आपको जिन्दगी में वो मुकाम हासिल होगा जिसकी आपने ख्वाहिष की है।

धन्यवाद !!!

 

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करियर काउन्सलिंग व कोचिंग

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प्र.1 करियर काउन्सलिंग व कोचिंग का क्या अर्थ है? क्या ये दोनों चीजें एक हैं या एक-दूसरे से अलग हैं?
उत्तर :
सबसे पहले तो मैं आपको बता दूं ये जो समय है ये यूथ के लिए बहुत ही उपयुक्त है क्योंकि हर यूथ इस समय अपने करियर को लेकर चिनितत है और कुछ न कुछ बनना चाहता है, जीवन में अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहता है। इस सिथति में उनके लिए करियर काउन्सलिंग व कोचिंग को समझना बहुत ही जरूरी हो जाता है। इसके लिए सबसे पहले तो हमें काउन्सलिंग व कोचिंग का सही अर्थ जानना होगा। क्योंकि अधिकांषत: हम इन दोनों ही शब्दों को एक-दूसरे की जगह बदल देते हैं तो यहाँ मैं स्पष्ट कर दूं काउन्सलिंग एक बहुत ही छोटी प्रक्रिया है वरन कोचिंग काउन्सलिंग की तुलना में लम्बा मार्ग है।
काउन्सलिंग के बारे में यह कहा जा सकता है कि यह 15 मिनट, ) घंटा या अधिक से अधिक 1 घंटे की गतिविधि है। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि ये बहुत ही छोटी प्रक्रिया है। इसके विपरीत कोचिंग एक लम्बी गतिविधि है या यूँ कहिए एक लम्बी तकनीकी व अधिक समय लेने वाली प्रक्रिया है। पर चूँकि बात आपके करियर की है तो ये किसी भी यूथ के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि इसमें समय तो अधिक लिया ही जा सकता है जिसके द्वारा ही अपने भविष्य की रूपरेखा बना सकते हैं।
प्र.2 करियर काउन्सलिंग व कोचिंग देानों में से अधिक महत्वपूर्ण कौन है ?
उत्तर :
इसे समझने के लिए हमें सबसे पहले अपने करियर को समझना पड़ेगा क्योंकि करियर किसी भी विधार्थी के लिए बहुत अहम होता है क्योंकि करियर के आधार पर ही यूथ अपनी आगे की तीस, चालीस, पचास साल व पूरा जीवन निषिचत करते हैं। तो यह एक बहुत ही लम्बी प्रक्रिया है। और ये कोर्इ छोटी नहीं वरन बहुत ही लम्बी और महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। क्योंकि किसी भी यूथ के करियर इतना महत्वपूर्ण है कि जिस पर उसका भविष्य निर्भर करता है और यह निर्णय पूरे जीवन में सिर्फ एक बार ही लिया जाता है तो मेरा मानना है कि इस निर्णय को बहुत ही सोच समझ कर लिया जाना चाहिए। अन्यथा उनके भविष्य पर इसके नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।
प्र.3 आपने बताया कि करियर कोचिंग बहुत ही लम्बी प्रक्रिया है तो इस प्रक्रिया में कोर्इ एक कोच हमें भविष्य के सम्बन्ध में मार्गदर्शन देते हैं या एक से अधिक कोच हमें सलाह देने के लिये उपलब्ध होते हैं?
उत्तर :
यह बहुत ही रूचिकर बिन्दू है क्योंकि कोच जो हैं वो हमारे आस-पास ही मौजूद होते हैं लेकिन उन्हें पहचान नहीं पाते हैं और मैंने यह महसूस किया है जीवन में एक व्यकित के चारों ओर उसका कोच हर वक्त उपसिथत होता है लेकिन वो उसे देख नहीं पाता । चाहे बात करें हम किसी भी महान शखिसयत जैसे कि हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम साहब उनके पास भी यही चोर कोच थे जिन्होंने उन्हें सही मार्गदर्षन दिया और जिनकी वजह से ही वो आज इस मुकाम तक पहुंचे। ठीक उसी तरह हर यूथ के जीवन में यही चारों कोच मौजूद होते हैं।


आज मैं आपको बाताऊंगा कि ये चार कोच कौन-2 से हैं –
कोच नं. 1 – एक व्यकित खुद अपना सबसे बड़ा कोच होता है।
कोच नं. 2 – व्यकित के माता-पिता भी उसके लिए कोच की ही भांति ही होते हैं। क्योंकि बचपन में भी उन्हीं की अंगुली पकड़ कर वो जीवन में चलना सीखते हैं
कोच नं. 3 – हर व्यकित के षिक्षक भी उसके कोच ही हैं क्योंकि हम जीवन में उनके बिना भी आगे नहीं बढ़ पाते।
कोच नं. 4 – किसी भी व्यकित के मित्र भी उसके कोच के समान ही हैं।

तो ये हैं वो चार कोच जो हमेषा व्यकित के साथ होते हैं और अगर इन चारों को सही तरह से सदुपयोग किया जाये और उनकी बराबर मदद ली जाये तो मुझे लगता है हम हर समस्या का समाधान ढूंढ सकते हैं और अपनी रूचि, मेहनत व लगन द्वारा अपना सही करियर विकल्प भी चुन सकते हैं।
प्र.4 जब विधार्थी भ्रमित होते हैं तो सलाह मांगने काउन्सलर के पास जाते हैं लेकिन जब विधार्थी खुद ही कोच हैं तो भ्रम क्यों?
उत्तर :
देखिये भ्रम वहां उत्पन्न होता है जहां पर स्पष्टता तथा निषिचतता नहीं होती है इसके लिए विधार्थियों को स्वयं ही अपने जुनून व रूचि को तलाष करना पडे़गा। इस तलाषी में निषिचत रूप से दूसरे लोग उनकी मदद करते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि एक विधार्थी को यह मालूम ही नहीं होता कि कितने करियर विकल्प उनके पास उपलब्ध हैं । सबसे पहले तो वो खुद उस पर काम कर सकता है। फिर मदद ले सकता है अपने माता-पिता की जो उससे कुछ कोर्सेस के बारे में जानकारी देंगे। इसके बाद फिर वो मदद ले सकता है अपने षिक्षकों की जो करियर से संबंधित कुछ नर्इ बातों पर प्रकाष डालेंगे। इसके बाद फिर बारी आयेगी उसके मित्रों की। तो इस तरह से वो एक लम्बी सूची तैयार कर सकता है। इसके बाद वो इसे विस्तृत रूप से स्पष्ट कर सकता है। इस तरह से ये प्रथम सीढ़ी होगी जिनमें अप्रत्यक्ष रूप से ये सभी लोग उसकी मदद करेंगे। उसके बाद धीरे-धीरे ये सब छोटे समूहों में वर्गीकृत किये जाते हैं। और सभी के विकल्पों को मिलाकर लगभग 40-50 विकल्प विधार्थी के समक्ष उपलब्ध हो जाते हैं जिनको सबसे पहले पहचाना जाता है फिर उनका मूल्यांकन किया जाता है। इसके बाद व्यावसायिक विषेषज्ञों को ढूंढा जाता है और जब यूथ उन्हें देखेगा, उनकी जीवन शैली से परिचित होगा और उनसे जाकर मिलेगा, उनसे बात करेगा तो करियर संबंधी जितने भी भ्रम उसके मसितष्क में चल रहे हैं तो उन सभी सवालों के जवाब उसे मिल जाते हैं।
प्र.5 एक संदेह हमेषा विधार्थियों के मन में रहता है कि उन्हें कौनसा विकल्प चयन करना चाहिए और वरन पूरी प्रक्रिया में अपने कौशल को व खुद को पहचानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है लेकिन खुद के कौषल को लेकर ही यूथ में जो संदेह उन्हें वे कैसे दूर करें?
उत्तर :
मुझे लगता है कि सबसे पहले विधार्थी ये मालूम कर लेना चाहिए कि उसके पास विभिन्न कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं। उसके बाद उसे उन सब लोगों से मिलना पड़ेगा जो उसके विकल्प से सम्बन्ध रखते हैं। मान लीजिए कि आप इंजीनियर बनना चाहते हैं सबसे पहले आपको इस क्षेत्र का चयन कर उन सभी इंजीनियरों से व्यकितगत रूप से मिलना पडे़गा। इसी प्रकार यदि आप प्रषासनिक सेवा में जाना चाहते हैं तो आप उन सभी प्रषासनिक अधिकारियों की जीवन शैली को भी देखना पसंद करेंगे और आप व्यकितगत रूप से यह अनुभव करना चाहेंगे कि मैं यहाँ आरामदायक अनुभव कर रहा हूँ नहीं या नहीं, ठीक इसी प्रकार कोर्इ पत्राचार की लाइन में जाना चाहता है तो उसे स्टूडियो जाकर वहां के माहौल से परिचित होना पडे़गा क्योंकि व्यकित को अपनी रूचि का अनुमान तो खुद ही लगाना पड़ता है। हर व्यकित खूबसूरत व अलग तरह का है। यदि हमें भी जीवन में अवसर प्राप्त हों तो हम अपनी रूचि अनुसार सही विकल्प का चयन कर सकते हैं। इसी प्रकार 40-50 तरह के विकल्प जब हम ढूंढते हैं तो उनके बारे में सभी महत्वपूर्ण जानकारी अर्जित कर लेते हैं तब हम अपने माता-पिता व षिक्षकों की सहायता ले सकते हैं फिर हमारे लिए जरूरी है हमारे करियर विकल्प से संबंधित व्यकितयों से मिलें तथा उस वातावरण के बारे में जान लें। तो इस प्रक्रिया को अगर व्यवसिथत ढंग से पूरा किया जायेगा तो यूथ अपनी सिथति को पहचान पायेंगे और अपनी सभी शंकाओं का समाधान उनके पास होगा और आप स्वयं संतुषिट का अनुभव करेंगे।
प्र.6 जैसे कि आपने बताया कि करियर कोचिंग एक लम्बी प्रक्रिया है तो इसे न्यूनतम किस आयु से शुरू कर दिया जाना चाहिए कि हम समय रहते श्रेष्ठ निर्णय ले सकें?
उत्तर :
देखिये किसी ने खूब कहा है कि जब जागो तभी सवेरा आपको जब से यह प्रक्रिया समझ में आ जाये तभी इसकी षुरूआत कर देनी चाहिए। और पूरे उत्साह से इस कार्य में लग जाना चाहिए। क्योंकि एक तरह से देखा जाये तो ये एक छोटे अनुसंधान कार्य की भांति ही है। जिसमें आपको खुद पहले करनी होती है। कुछ चीजें अपने करियर से संबंधित पता लगानी होती हैं। स्वयं को पहचानना होता है। आपको स्वयं ही लोगों से जाकर मिलना होता है और करियर से संबंधित सूची भी आपको स्वयं ही तैयार करनी पड़ती है। या यूँ कहिए कि यह एक विधावाचस्पति कार्य की भांति ही एक छोटा अनुसंधान कार्य है। और यूथ को अपनी रूचि का पता लगाना है। क्योंकि मुझे समाज में सबसे बड़ी समस्या से अनुभव होती है, अधिकांषत: 60 से 70 प्रतिषत लोग वो काम करते हैं, जो वो नहीं करना चाहते थे। इसी कारण वो लोग काम करते-2 भी निराषा का अनुभव करते हैं तथा दूसरों से र्इष्र्या करने लगते हैं। और अपने काम में आनन्द की अनुभूति नहीं कर पाते। समाज में लोगों की यह धारणा है कि अगर वे सरकारी नौकरी में जायेंगे तो अधिक सफल बन जायेंगे। पर हकीकत ये है कि किसी भी नौकरी को करने से व्यकित सफल नहीं बनता बलिक उसे खुषी से करने से सफल बनता है। इसीलिये अपनी रूचि व षौक को पहचानना युवाओं की आज की सबसे बड़ी जरूरत है। और यहीं हम लोग गलती कर रहे हैं। और इसका महत्व नहीं समझ पा रहे हैं। दूसरों के कहने पर अपने जीवन के निर्णय ले रहे हैं। और हम दूसरों के बल पर ही सुरक्षित होना चाहते हैं। सबसे पहले इसीलिये हमें खुद का जानना व पहचानना होगा तभी हम अपने जीवन से संबंधित सही निर्णय ले पायेंगे।
प्र.7 करियर कोचिंग प्रक्रिया की षुरुआत कहाँ से व कैसे होनी चाहिए? कैसे यूथ अपने कोच को पहचाने, अपने कौषल को पहचाने? तथा इसके लिए कौनसी प्रक्रिया अपनाये ?
उत्तर :
मुझे लगता है कि 9 व 10 की आयु कोचिंग प्रक्रिया की शुरुआत के उपयुक्त है। क्योंकि 11 में उन्हें 3 या 4 विकल्प में से एक का चयन करना पड़ता है। इसीलिये 11 से पहले दो साल पूरा उपयुक्त तरीके से इस पर काम कर लिया जाये तो उन्हें अपने लिये सही व उचित विकल्प का ज्ञान हो जाता है। विधार्थी उनके बारे में पूरी सूचनाएँ आसानी से एकत्रित कर सकते हैं। देखा जाये आज हर क्षेत्र में इतने विकल्प हैं जैसे – इंजीनियरिंग में, पत्राचार में, वाणिज्य में, प्रबन्ध में, मेडिकल में जहाँ देखिये वहाँ इतने विकल्प फैले हुए हैं कि अगर इनकी एक सूची तैयार की जाये तो हम पायेंगे कि इनकी संख्या 400 से भी ज्यादा है। और इन विकल्पों को जानना तथा इन पर काम करना ये पूरे दो साल की गतिविधि है। इसीलिये मैं सोचता हूँ कि अगर विधार्थियों द्वारा 9 व 10 में ही ये काम षुरु कर दिया जाये तो उनके भविष्य के लिए यह बहुत ही अच्छा है। और अगर अज्ञानतावष विधार्थी 9 व 10 में ना शुरू कर पाये तो 11 की आयु में भी उनके लिए देर नहीं हुर्इ है। बस देर है उनके बारे में जानने की और उन्हें पहचानने की, वैसे भी देखा होगा आपने कि लोग अपने करियर में परिवर्तन लाते ही रहते हैं। और 3-4 सफल बाद वापिस उस सिथति में आ जाते हैं जहाँ से उन्होंने शुरूआत की थी।
इसीलिये दिखावे में ना रहे कि उसने ये काम किया है तो मैं भी ये कर लूं। अपनी पसन्द व अपने जुनून को पहचाने व उसी अनुसार विकल्प चुनें। मुझे पूर्ण विष्वास है कि कामयाबी आपके कदम चूमती नजर आयेगी।

धन्यवाद !!!

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मीडिया का कार्य सत्य को समाज के सामने रखना है परंतु हमें सबसे पहले सत्य को ही समझना होगा

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क्या कभी हमने सोचा है कि हमारे मन मे डर क्यों रहता है क्यों व्यवसाय करना खतरे का काम लगता है क्यों लगभग हर महिला स्वयं को असुरक्षित समझने लगी है क्यों माता.पिता अपने बढ़ते हुए बच्चे के भविष्य को लेकर आशंकित है क्यों हम एक दूसरे की मजबूरी का फायदा उठा लेना चाहते है क्यों चिकित्सा सुविधाएं बेहतरीन होने के बावजूद भी हमारी औसत आयु बेहतर नहीं हो पा रही है क्यों हमारे देश मे भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ता ही जा रहा है क्यों हमारी अदालतों मे मुकदमे तेजी से बढ़ते ही जा रहे हैं इन सबके मूल मे जाएंगे तो हमें पता चलेगा कि इन सबके पीछे के कारण समाज में तेजी से बढ़ती जा रही नकारात्मक सोच है। यह भी सच है कि आपसी संवाद का सुगम व सरल होना समाज के विकास का आधार हैए परंतु अगर इस संवाद में समाज के एक पक्ष यानी नकारात्मकता को ही बढ़ा.चढ़ा कर दिखाते हैंए तो क्या समाज का विकास होगाघ् हमारे आस.पास का वातावरण सबसे अधिक अगर प्रभावित होता है तो वो हैए अखबार इंटरनेट टीवी और फिल्म इंडस्ट्री से। टैक्नोलॉजी का विकास निश्चित रूप से खूब हुआ है परंतु हमें सोचना पड़ेगा हमने टैक्नोलॉजी से संवाद का वातावरण पोजीटिव बनाया है या नेगेटिव। कभी.कभी यह भी लगता है कि शायद हम जन्म से ही नेगेटिव हैं तभी तो हमें एक व्यक्ति द्वारा किए गए सौ अच्छे काम कम और एक बुरा काम ही अधिक नजर आता है। शायद इसी मानसिकता को हमारे मीडिया ने आधार बनाकर अपने व्यवसाय को बढ़ाने की सोच रखी है। दूसरी तरफ यह भी सच है कि पोजीटिविटी के चिंतन से ही हमें ऊर्जा मिलती हैए मनोबल मिलता हैए खुशियां मिलती हैं और सच में श्रेष्ठ जीवन मिलता है।
कुछ समय पूर्व मुझे जापान रहने का अवसर मिलाए मैं सोचने लगा इस मुल्क की बेतहाशा तरक्की का आखिर कारण क्या है तो मैंने पाया वो सिर्फ एक ही है और वो है पोजीटिव थिंकिंग।
एक लम्बे समय बाद हम अपने कार्यों का परिणामों के आधार पर अवलोकन करने लगते हैं। एक सर्वे से यह भी पता चला कि वो अखबार लंबे समय में नकार दिए गए जो लम्बे समय से नेगेटिविटी को ही आधार मानकर चल रहे थे। वास्तव में हम सभी बढऩा चाहते हैंए प्रसन्नता चाहते हैं और भयमुक्त रहना चाहते हैं। इन दिनों प्रतिष्ठित अखबारों में पोजीटिविटी का ट्रेंड बढऩे लगा हैए कुछ पृष्ठ तो बस इस सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए ही रिजर्व कर दिए गए हैं। एक प्रतिष्ठित अखबार ने नो नेगेटिव न्यूज ऑन मंडे का विचार बना लिया है जो कि स्वागत योग्य कदम है।
कुछ लोगों का कहना है कि मीडिया का कार्य सत्य को समाज के सामने रखना है। परंतु हमें सबसे पहले सत्य को ही समझना होगा। अगर एक डॉक्टर अपने मरीज का सिटी स्कैन देखकर इतमिनान से मरीज के 10 दिन में मरने की घोषणा कर उसे तुरन्त प्रभाव से अवगत करा दे तो क्या यह सत्य हैघ् यह सत्य होते हुए भी सत्य नहीं हैए सत्य तो वह होता है जिससे स्वयं का कल्याण तो हो पर उससे पहले दूसरे का कल्याण हो और जो ईश्वर यानी ऊर्जा की तरफ ले जाने वाला हो। कभी.कभी तो चुप रहना भी सत्य की परिभाषा में आ जाता है। बियानी टाइम्स का नये कलेवर में पहला अंक 2 वर्ष पूर्व 1100 अखबार से आरम्भ किया गया थाए आज 30000 अखबार प्रतिमाह पाठकों के मध्य पहुच रहे हैं। गत दो वर्षों की यात्रा में हमने सदैव ऊर्जाए सकारात्मक सोच व ताजा खबरों पर ही पूरा ध्यान केंद्रित किया। इसी दिशा में पोजीटिव से मस्तिष्क को शक्तिशाली कैसे बनाऐंए यू केन सक्सीडए 360 व्यू ऑन योर करियर वॉय शूड आई से थैंक्यू और प्रेम और भावनाएं सर्वस्व हैं जैसे पॉजिटीव व प्रेरणादायक साहित्य समाज मे समर्पित किये गये हैं। पाठकों से गत दो वर्षो मे जो प्रेम और समर्थन मिलाए उसके लिए सह्रदय आभार प्रेषित करना चाहूंगा। पाठकों से अपेक्षा रहेगी कि अखबार के सम्बंध में अपना फीड बेक जरूर भेंजे।
आइये हम सब मिलकर पॉजिटिविटी की तरफ बढऩे का फैसला करें।
5 सितम्बर को शिक्षक दिवस हैए इस अवसर पर गुरू के रूप में अपनी मांए बाऊ जी व शिक्षकों को सह्रदय धन्यवाद देना ना भूलेंए क्योंकि पॉजिटिविटी को बढ़ाने का यह बेहतरीन अवसर है। प्रेमए स्नेह व शुभकामनाओं के साथ फिर मिलेंगे।

Dr. Sanjay Biyani(Dir. Acad.)
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आरक्षण का लाभ शिक्षा में दिया जाए या नौकरी में दिया जाए या फिर राजनीति में दिया जाए

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हाल ही में लाखों लोगों की भीड़ अहमदाबाद में इकट्टी हुई और पटेल पाटीदार आरक्षण का मुद्दा गुजरात में गरमाने लगा। इसके बाद पटेलों ने दांडी से साबरमती तक की विशाल रैली निकालने की सोची। कभी गुर्जर आरक्षणए कभी जाट आरक्षणए तो कभी मुस्लिम आरक्षण समय.समय पर ये सब आंदोलन के रूप में सुलगते रहे हैं। यह भी सच है कि अंग्रेजों ने लगभग 200 वर्षों तक हम लोगों पर शासन किया और समाज के लगभग सभी वर्गों ने जीवन में आर्थिक परेशानियों को इस दौरान महसूस किया है। शायद इसीलिए सभी लोग जल्दी से जल्दी किसी भी प्रकार से आर्थिक रूप से सुरक्षित हो जाना चाहते हैं। समाज का जो वर्ग जितना शोषित रहाए वह उतनी ही बड़ी आरक्षण की मांग रखने लगा। आरक्षण के मसले को समझना है तो हमें शुरुआत से समझना होगा। वेदों में उल्लेख मिलता है कि वर्ण का आशय रंग या त्रिगुण से है। पहला सफेद रंग सत्व गुण माना गया हैए दूसरा लाल रंग रज गुण माना गया है व तीसरा काला रंग तमस गुण माना गया है। समाज का वह वर्ग जिसने ज्ञान व ब्रह्म प्राप्ति को आधार बनायाए उसे ब्राह्मण कहा गया। ये सत्व गुण प्रधान थे। वह व्यक्ति जो नेतृत्व व सुरक्षा का कार्य देखते थे उन्हें क्षत्रिय कहा गया। ये रज गुण प्रधान थे। समाज का वह वर्ग जो व्यवसाय व प्रबंधन का कार्य देख रहे थे उन्हें वैश्य कहा गया तथा इनमें सत्व व रज दोनों गुण विद्यमान रहते हैं तथा कृषिए पशुपालन व सेवा का कार्य करने वाल शुद्र कहलाए । इनमें तमस गुण प्रधान रहा। इस प्रकार कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था की गई थी। परन्तु समय बीतता गया और इंसान वर्ण को जाति में बदलता गया और आखिरी में इंसान ने वर्ण को कर्म बना दिया। वास्तव में अगर इतिहास को देखें तो चन्द्रगुप्त शूद्र जाति के होते हुए भी अपनी नेतृत्व क्षमता के कारण सम्राट बनाए गए। इसी प्रकार परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी 21 बार क्षत्रियों का विनाश करते हैं। कहने का आशय यह है कि हर व्यक्ति में असीम क्षमताएं होती हैं। जरूरत इस बात की है कि शिक्षा के दौरान उसके स्वाभाविक गुणों का विकास किया जाये। हमारे संविधान द्वारा आज हर व्यक्ति को अपनी योग्यता के अनुसार अपना कॅरियर चुनने का विकल्प उपलब्ध है। परन्तु फिर भी संवैधानिक प्रावधान व राजनैतिक महत्त्वकांक्षाओं के कारण विद्यार्थी ना तो अपनी योग्यता का पता लगाना चाहता है और ना ही अपनी इन योग्यताओं को बढ़ाना चाहता है क्योंकि उसका पूरा ध्यान आरक्षण कोटे के द्वारा उपलब्ध नौकरी को प्राप्त करने में लग गया है। समाज के एक बड़े वर्ग द्वारा आरक्षण समाप्ति की बात की जा रही है तो किसी दूसरे वर्ग द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण की बात की जा रही है। वास्तव में हमें सोचना होगा कि आरक्षण का लाभ शिक्षा में दिया जाए या नौकरी में दिया जाए या फिर राजनीति में दिया जायेघ् नौकरी व राजनीतिए योग्यता के आधार पर दिये जाने पर ही देश का समुचित विकास संभव है तथा योग्यता का निर्माण उचित शिक्षा प्रणाली से ही संभव है। कितना अच्छा हो कि समाज के सभी पिछड़े वर्गों के बच्चों को बेहतरीन शिक्षा प्रदान की जाए और इस काम के लिए उदारवादी तरीके से आरक्षण दिया जाये। जिस समय योग्य व्यक्तियों को योग्य काम मिलने लगेगाए देश के आर्थिक हालात बदलने लगेंगे। आरक्षण आंदोलन से सिर्फ समाज में कानून व्यवस्था ही खराब नहीं होतीए लोगों में द्वेष की भावना ही पैदा नहीं होती बल्कि अयोग्य व्यक्तियों द्वारा कार्य संभालने से देश की राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था भी चरमराने लगती है। अगर हम वास्तव में देश को विकसित राष्ट्र में बदलना चाहते हैं तो हमें उदारवादी नजरिये से हर युवाओं को योग्य बनना होगा और इसके लिए शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाना होगा। इस बात पर विश्वास करना होगा कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। इसी प्रकार नौकरी व राजनीति में जातिगत आधार पर आरक्षण के मुद्दे पर पुनरू विचार करना होगा। इतना ही नहीं समाज को महिलाओं को भी समान अवसर उपलब्ध कराने होंगे। आइए आने वाले नवरात्रा में शक्ति का पूजन करेंए हांए हमें लगता है श्क्ति का आशय शारीरिक शक्ति से नहीं बल्कि इन भावनाओं की शक्ति से है। नवरात्र के अवसर पर सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं प्रेम स्नेह व सम्मान के साथ फिर मिलेंगे।

Dr. sanjay Biyani(Dir. acad.)
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पुरानी पीढ़ी द्वारा नई पीढ़ी के साथ जितना संवाद किया जायेगा बच्चों का जीवन उतना ही उन्नत खुशहाल और सुरक्षित बन जाएगा।

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आज की भागती दौड़ती जिंदगी मे सभी लोग व्यस्त दिखाई देते है। पेरेन्टस् जहाँ अतिरिक्त कार्य कर अधिक कमा लेना चाहते हैंए वहीं स्टूडेन्ट पढ़ाई के साथ.साथ अतिरिक्त कोचिंग कर भविष्य को निश्चित करने में लगे हैं। इसी तरह से हम सभी ने अपनी.अपनी प्राथमिकता तय कर रखी है। पेरेन्टस् और बच्चों मे संवाद की कमी बढ़ती जा रही है इस कारण बच्चों में चिड़चिड़ापनए कुण्ठा व हीन भावना उनके व्यवहार में स्पष्ट देखी जा सकती है। क्या कभी हमने सोचा है कि क्यों बढ़ती उम्र के बच्चे सोशल साईटस् पर अधिक समय बिताने लगे है। क्या कभी हमने सोचा है कि बच्चे अपनी गलतियों को क्यों छुपाने लगे हऔर बात.बात पर क्यों झूठ बोलने लगे हैंघ् क्यों बच्चे घर से अधिक बाहर के वातावरण में अधिक खुश रहने लगे हैं। साइकोलॉजिकली ऐसा देखा जाए तो इसके पीछे यह कारण स्पष्ट रूप से दिखता है कि घर के वातावरण में प्रेम व भावनात्मक लगाव की कमी के कारण बढ़ती उम्र के बच्चे इस कमी को बाहर के वातावरण में ढूंढने लगे हैं और शायद इसी कमी के कारण पेरेन्टस् भी ऐसा ही कर रहे हैं। इसी कारण सोशल मीडिया साइटस् पर 10 से 16 साल तक के 85 फीसदी बच्चों की पसंद व्हाटसएपए फेसबुकए गूगल प्लस जैसी सोशल साइटस् बन गई हंै। यह बात भी सत्य है कि हर व्यक्ति हर समय सोशल साइटस् पर अपडेट रहना चाह रहा है। एक बडा सच यह भी है कि आज तक जितने भी उपकरण विज्ञान ने बनाये हंै उनका मुख्य कारण मनुष्य के समय की बचत करना ही रहा है पर गौर से देखें तो सोशल साइटस् पर बढ़ती व्यस्तता ने लगभग हर व्यक्ति के समय को कम कर दिया है। सर्वे से यह बात भी सामने आई है अगर एक व्यक्ति कई घंटे तक मोबाईल पर व्यस्त रहता है तो उसके ब्रेन हेमरेज की संभावना बढ़ जाती है। साथ ही साथ मोबाईल के प्रयोग से रेडिएशन के कारण हमारे शरीर पर बहुत हानिकारक प्रभाव भी पड़ता है। इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि पुरानी पीढ़ी द्वारा नई पीढ़ी के साथ जितना सामाजिक . सांस्कृतिक संवाद किया जायेगाए बच्चों का जीवन उतना ही उन्नतए खुशहाल और सुरक्षित बन जाएगा। एक अध्ययन यह भी है कि सोशल मीडिया के कारण अधिकांश बच्चे साइबर क्राईम व लैगिंक शोषण के शिकार होते जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने स्वयं अपने बच्चों को फेसबुकए ट्वीटर से दूर रखा और मोबाइल का उपयोग शनिवार और रविवार को ही करने की इजाजत दी है। आइये हम सब लोग देखा.देखी के आधार पर घर से बाहर अतिरिक्त व्यस्तता व सोशल मीडिया पर अत्याधिक व्यवस्था को कम कर अपने समय को अपने बच्चों व परिवार के साथ बितायें ताकि बढ़ती उम्र के बच्चो में प्रेम व भावनात्मक असंतुलन को कम किया जा सके। बच्चों को सफल बनाने से भी अधिक आवश्यक है कि उन्हें अच्छा इंसान बनायें। यह समय बच्चों के कैरियर विषय को चुनने का भी है इस चुनाव में बच्चे की रूचि व कैरियर काउंसलर की सलाह ली जानी चाहिये।
हमारे जीवन में पिता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। 21 जून को फादर्स डे पर हम सभी एक निश्चय करें कि इस दिन से हम सभी अपने पिता को सिर्फ पिता ही नहीं एक लाईफ कोच के रूप में मन से स्वीकार करें तथा इस अवसर पर उन्हें अपने हृदय से धन्यवाद देना ना भूलें। प्रेमए स्नेह व सम्मान के साथ।

Dr. Sanjay Biyani(Dir. Acad.)
May – Biyani Times Editorial
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Desire, passion and interest

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What is desire and passion?
Desire is the seed for everything which we see around. It is a very powerful thing. But I believe this desire is an external element and not internal.
The inner voice or inner element is our passion. For example, if a child watches a movie and aspires to be an actor, this feel is external and hence is desire. Usually, we don’t get what we desire but get what we are actually i.e. what is our passion.
What are beliefs?
The key component of everything is belief. And the belief is shattered due to wrong selection. As one opted for something inappropriate and hence people discard the same and beliefs are shattered, due to which people make compromises. If you want that your belief and confidence should be protected then one must have firm passion and find their own inner strengths and interest.
When we have many options then how to make correct selection?
In simple words, there are two words attraction and love. Attraction is what we get outside, externally and love is what we fill from inside. Like one likes computers but also gets influenced by seeing people performing and dancing on television, then one has to find out they have neither given any performance on stage nor in front of friends. Also if have performed, then it might not have been so effective. Then I suggest they should follow each & every small step, take peoples feedback, especially teachers & parents. Also should evaluate does this thing is what I want to be or I am fascinated with some temporary influences.
It’s a very this line of demarcation between attraction & love and often people make wrong decisions by not recognizing their love and attractions.
Will it be right to evaluate our self first for all the options that we are thinking for us?
Absolutely, unless you will not explore yourself and keep getting influenced from outside till then you won’t be able to take right decision. Others get influenced by the actual strength of a person and not by any outer influence.

Is any personal experience of your own or you have seen somebody has taken a decision in confusion and later repented the same?
I have seen many cases of students who visited college for BBA or any other course and later realized interest in dancing etc and loft the course and switched to other course and later unfortunately they failed as they lost both course because may just followed their desire without putting the requisite hard work for it.
Advises for youngster for making their belief?
Youngsters differ in their beliefs. Some are very confident & some are very depressed. For e.g. – if you take a wrong decision and so you are rejected then your belief will be shattered. I think belief is formed when cause & effect relationship are mixed. Like you did some work, succeeded and your confidence is boosted. Confidence is not built by lecture, decisions and knowledge but is made out of experience & real life situations.
How to take good decision in students and parent’s perspective?
Success is not what we wanted to be. Success is what we did and enjoyed doing it and learn from it. I think we need to redefine success. As whenever we assume or link success with a target we become depress as the governing factor becomes someone else. Actually, the governing factor for our success is we alone if you are enjoying your work then you are on right track. If you want to realize your passion don’t make such external governing factors as supreme target to evaluate you & your performance. Make your experience & real life experience also the base for exploring your passion. If you are interested, passionate and can understand your inner voice then it is possible to be successful.

Dr. Sanjay Biyani(Dir. Acad.)

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Career in Engineering

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What are the main qualities needed or requisite for becoming an engineer?
Firstly a student must be an innovative researcher. I suggest for having a passionate engineering career one must check that whatever they have an innovative, exploratory research aptitude or not. During childhood if you have been curious and experimental with instruments and machines, then you can be an engineer.
Explain some demanding popular branches in engineering?
Although Bill Gates and Steve Jobs didn’t had their engineering degrees but succeeded because of their logical thinking. Therefore, I suggest students who have logical thinking and aptitude can be good programmers and hence can opt for computer engineering and develop their own computer programmes.
What is the difference between electrical and electronic engineering?
In electrical engineering deals with the study of the basics of a device or instrument but when we have to design and assemble a component it comes under the head of electronic communication and networking.
How we can differentiate between mechanical and civil engineering?
Some students’ likes designing and have great interest in machines, designing and creativity then depending on their interest and aptitude can opt for mechanical or civil engineering.
What is the basic requirement for being an eligible candidate for engineering student? Is biology or any graduate student eligible to apply for any engineering course?
Yes, students from biology background can become engineers. There are few branches in engineering which offer courses for biology students like biotechnology and food technology can be new innovative engineering careers for a biology or non-mathematics students. Usually, there is a format of U.G to P.G courses but students can also avail P.G to P.D programmes i.e. post graduate course to post doctorate course is also available. After the post graduation we can do 3 years research programme and then 2 years post doctorate programme in which we get scholarships for our research work. Even after qualifying competitive exams like JRF and GMAT also we can do our research work.

Usually IIT students opt for MBA after completing their degree, so what could be options after engineering other than MBA?
MBA is a good option for those who have interest in industry and likes to work in corporate settings. Usually, in engineering students they need a place to learn basic managerial skills and corporate culture also. Those who like technical field and study much can opt for M.Tech after their graduate programme.

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Thought Management

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How does our thinking and grasping process impacts on our career?
What we are, what we have it’s all the result of a thought. If we know the right way of thinking, we can attain anything we want.
What is the process for thinking or a thought?
The first step of our destiny is thought that comes to our mind. First the thought comes to mind and then enters our heart, which will feel that thought. Like we read news in the newspaper regarding some mishap and we feel bad or sad for the same. When our brain and heart combines it gives birth to attitude. Attitude can be positive or negative depending upon the thought that we entertain in our mind. Positive thought will be converted into positive feel and hence in positive attitude. Similarly, if we had any negative thought, it will generate negative feel and attitude. I suggest and believe that we should start our day with positive thoughts and that’s why we have been publishing a newspaper” Biyani Times”, whose circulation is around 30,000 in which we convey people all positive thoughts and information.
As we had a thought we connect it with the feel and it gives birth to attitude. And with this attitude every day we are doing some action. Our all actions are the results of our attitude. If we have positive attitude then actions will be positive and if negative attitude then actions will be negative. The way these actions keep on repeating it makes our habit. That’s why it is believed that till the age of 20 years we can incorporate good habits in a person because after 20 years, it becomes quite impossible to reshape a person’s attitude. Once a habit is made it shapes our personality. And so is the personality it will either lead to success or failure accordingly.
As our mind grasp negative things very easily and quickly, so how to overcome this problem and what will be the process for it?
Although today around us there are so many things which serves negativity to our mind and it is also true we cannot stop them all. So in that case what we can do is that we can change our self. We should everyday aim to grasp positive things. Like if we start our day with positive thoughts, positive feel, positive attitudes, positive actions, positive habits, positive personalities and positivity in our work, then slowly and gradually we will learn to tackle negativity. We don’t have to stop any negativity but we have to increase positivity.
How impactful is the thought process in terms of career for the youths of today?
It’s a fact that whatever we will become or get is not because of our books, but because of our thoughts. If we have made our life style like this in which every day we read something inspiring and motivating, all that makes our thoughts, feel and ultimately shapes our attitude.
Actually if we define life, it is nothing more than attitude. If one changes their attitude one can change their life and that can be done because of our thoughts. Sometimes back I went to Japan and realized that people there are very humble and polite. They bow and wish everyone to show gratitude by saying” oh hio gojayo mass” which means “thank you very much”. Basically all this is a thought pattern; even an Indian who will go there will adapt this habit.
Therefore, I believe we can change the world by changing our thought process.

Dr. Sanjay Biyani(Dir. Acad.)

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How to overcome Fear

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How to end fear?
Actually courage is life and fear is death. As a counselor I have deduced that everything bears a perfect answer. And if we have that perfect answer we will definitely follow the right direction. Youth of today is suffering from the problem of fear, with fear they are appearing for examinations or interviews, or performing on stage. With this approach their performance and intellect is badly affected.
The fundamental reason for fear is the lack of faith. There is a deep relationship between faith and fear. If our faith starts increasing then our fear starts decreasing. Some people don’t trust others like students don’t trust their teachers, employees don’t trust their employer etc. some people grow with such habit and hence their personality becomes introvert. If we want to live with power, courage and energy then we have to overcome fear.
What is fear? From where it starts and why it is called fear?
Fear is not any external entity. It is what we have inside. As such we have all power inside us so is this fear inside us. I sometimes relate this concept with the great scientist, father of physics, Albert Einstein. He stated that
E=mc^2
Where, E stands for energy, m stands for mass and c stands for velocity.
Our body is not important, but the frequency and velocity which moves with our body in the form of feeling. If this feeling is of fear, it reduces the performance level of the body and if this velocity is full of courage then our body will always be active and we can perform efficiently. Therefore, if we want to live our life with courage and enthusiasm, we have to find solution for the problem of fear. The biggest destruction and distraction factor in youth is the element of fear and to overcome it they have to accept faith in their life.
How to enhance faith and trust for others?
We have explored all difficult things but didn’t understand how to enhance our personality. Faith can be easily enhanced. There is a complete balance in all facets of nature. Everyday new flowers grow, birds fly and many more. All this is not due to man but almighty. Human knowing that the god is a perfect and unique creator but still lacks faith on god. Hence never felt grateful to his creation. Such nature generates neutral power because we don’t give anything and hence can’t expect to receive something. For expecting something to come first we have to give faith and gratefulness for what we got.
Isn’t it important that first time we keep faith on our self and then on others?
It’s quite right but it is not an easy task. For growing a crop first we have to sow seeds. Similarly, first we have to give faith and then will receive the same. In the beginning a children should learn to trust their parents and believe their knowledge and experience. Also they should have faith on god.
Most importantly the human should have faith on law of karma, on the cause and effect relationship and on the consistency of the work.
I disagree with the Newton’s law which states that every action has an equal and opposite reaction. I believe that every action will give more than equal & opposite reaction chain. From any reaction we get multiple reactions that is why whatever we do comes back to us from the universe. If we really want to enhance our confidence, we have to study slowly and gradually grow this habit of keeping faith. The great industrialist DhiruBhai Ambani, Narayan Murti & Bill Gates have their own kind of firm faith because they trusted people around then and that’s why they were successful. If we will also grow faith element in us and everyday when we wake up we thank and link god, our parents and our karma with the beliefs, we will receive it from everywhere in the form of confidence.

Dr. Sanjay Biyani(Dir.Acad)

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Career, Anger & Success

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Is it true that anger can be managed?
Exactly, I believe that any problem on this earth has a solution. And hence the problem of anger can be managed, it has a solution too.
Is there any connection or relationship between career and anger?
Basically career is a combination of mind, heart & time. So, if because of anger if we distract our mind and heart it will definitely affect our career. If we have to make our good career then we have to peacefully use our mind. And we are able to do so we can achieve successfully whatever we want.
How can one manage anger?
What I believe that anger can be managed by postmortem analysis. In postmortem analysis first of all there is anger and then one gets shift to silence. It will definitely cause disturbance either in heart or in brain. The chemical reactions will take place in our body as the feeling of anger has already been aroused.
In postmortem analysis once anger is created either we take it on our own or take out it externally by shouting at others. Ultimately this anger will have a bad impact on both on our body or on others with whom we get angry. This is what happens in postmortem analysis. I believe that if we have to see the real analysis for it then first of all we have to train our mind because we have two things:
First we have to check, who are we slave or master. If we are master, then we can train our mind, made it realize that I’m your owner, I will give you instructions, and you will not give me instructions.
Also apart from it if we think to control external conditions and circumstances then we won’t be able to manage our anger because we can’t control actions of other people.
How control and manage inner anger?
Actually it is a fact that it can never be guaranteed that anger can be totally omitted from any person’s personality. Only thing that can be done is that we have to train our self and have to keep telling our self that we are a very powerful person, you are not a body, you are a soul, we have to aware our self about self only, in spite of changing circumstances we have to get connected with happiness, train our mind and start feeling that we are beyond the body then I think slowly and gradually we can make our self powerful through mind and follow the path which ultimately leads to success.
Are there certain circumstances where anger is a requisite reaction?
I think anger is both good and bad. Actually it depends on situation. To explain it, if the anger is sponsored by our thoughts i.e. you got angry according to the situation on somebody who is not listening to you and you show anger to train that person then the anger is right. On the other hand, if the anger is not sponsored and it is not at all related to any mind activity and its intention is also not clear, then such anger is harmful.
Can we control what to speak or what not when we are angry?
We have to adopt a policy of “seeking forgiveness” and “forgiving people”. Such a habit actually completes a man and relaxes soul. If we have been very angry and so shouted on somebody, then we should politely apologize to that person. Slowly and gradually our mind gets trained with such attitude and we start doing even unconsciously.
This is a good practice. And if we practice it and keep patience before reacting we can control anger. In reality people escape from apologizing and follow wrong path.
How anger and irritation can be stopped from hampering career?
One’s behaviour and personality can actually control anger. But for that one has to show genuine interest and analyze that how worse impact is caused on us due to anger, how much energy is lost because of anger, performance and achievement are badly affected. We have to understand the cause and effect relationship and make our self realize what is actually important for us then giving anger its right place. Youth knowing their powers can channelize them in right direction.
Some tips with which anger can be managed and personality can be enhanced?
The people to whom you show gratitude like parents, teachers, teachers, neighbour, friends etc. you can never be angry with them. Develop the habit of showing gratitude by keeping “Thank you” in your words and action. All this makes you happy and angry with anybody.

Author:Dr.Sanjay Biyani

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