श्रीमद् भगवद् गीता संजय की नज़र से प्रथम अध्याय : अर्जुन विषाद योग

Share this on :

अक्सर हम सभी लोग दो सवालों के जवाब ढूंढा करते हैं। मुझे लगता है ये सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण है। पहला सवाल है- मैं कौन हूं? और दूसरा सवाल है- मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? जब इन दोनों सवालों का जवाब मिल जाता है, तो मन में शांति आती है, खुशियां आती हैं। हम सभी को जीवन में कई निर्णय लेने होते हैं और निर्णय लेना ही सबसे बड़ी ताकत है। एक सही निर्णय आपको जीवन में कहीं भी पहुंचा सकता है। निर्णय लेने की यह कला तब आती है, जब हमारे पास इन दोनों सवालों के जवाब होते हैं।

मुझे लगता है श्रीकृष्ण ऐसे हैं जिन्होंने अपने मनुष्य अवतार में सभी दु:खों को देखा। एक ऐसा इंसान, जिसका जन्म कैदखाने में होता है, एक ऐसा इंसान जो ग्वाले के रूप में अपना बचपन व्यतीत करता है, एक ऐसा इंसान जो अपने मामा से बहुत कम उम्र में ही युद्ध करना पड़ता है, एक ऐसा इंसान जो राजा बनता है और एक ऐसा इंसान जो ज्ञान की पराकाष्ठा तक पहुंचता है।

अगर आप अपने भीतर छिपी हुई प्रतिभा को सामने लाना चाहते हैं। जीवन में प्रबंधन करना चाहते हैं, एन्टरप्रेन्योर बनना चाहते हैं, एक सफल इंसान बनना चाहते हैं या अपने रिश्तों को बखूबी निभाना चाहते हैं तो श्रीमद् भगवद् गीता आपके लिये बहुत उपयोगी रहेगी।

श्रीमद् भगवद् गीता- अध्याय प्रथम (अर्जुन-विषाद योग)

अर्जुन को विषाद है, अर्जुन को दु:ख है। हमारे जीवन में भी दु:ख आता है, तभी ज्ञान आता है। वे सभी लोग कभी ज्ञानी नहीं बन पायेंगे जिनके जीवन में विषाद न हो। अर्जुन के विषाद के कारण ही उसे अद्भुत ज्ञान की प्राप्ति हुई। अगर आपके जीवन में दु:ख है, तो आपको प्रसन्न हो जाना चाहिये। क्यूंकि अब ज्ञान समझ आ जायेगा। ज्ञान है तो सबके पास लेकिन समझ कुछ ही लोगों को आता है।

शंखनाद के बीच… युद्ध का भयंकर दृश्य… हर तरफ बलशाली योद्धा… अर्जुन श्रीकृष्ण को कहते हैं, ‘कृष्ण, मुझे दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करो, ताकि मैं सभी को देख सकूं।’ क्यूंकि कृष्ण आज सारथी हैं इसलिए कृष्ण इस बात को समझ कर रथ को दोनों  सेनाओं के बीच लाकर खड़ा कर देते हैं। अर्जुन जैसे-जैसे चारों तरफ देखने लगते हैं, विषाद की तरफ बढऩे लगते हैं। भीष्म पितामह, जिनसे अर्जुन ने शिक्षा ली थी, आज वही अर्जुन के विपक्ष में उससे युद्ध करने के लिए खड़े हैं। द्रोणाचार्य, जो अर्जुन के शिक्षक रहे, आज उनके सामने तीर-कमान लेकर खड़े हैं। अर्जुन का अपना परिवार, उनके मामा, चाचा, पुत्र…उन्हें दिखाई देने लगते हैं और जैसे-जैसे वे यह दृश्य देख पाते हैं, विषाद में आते जाते हैं। यह विषाद जीवन को बहुत खराब कर देता है। अर्जुन निराशा में बढ़ते जा रहे हैं। ये सब देखकर अर्जुन फि र सवाल करते हैं,‘हे कृष्ण, इन सभी को मारने के बाद, मुझे जो राज्य मिलेगा, उसका मैं क्या करूंगा? कितना विनाश होगा…कुल का नाश हो जाने पर मेरे जीवन का महत्व ही क्या रह जाएगा?

मुझे लगता है, ऐसी परिस्थितियां मेरे जीवन में भी आती हैं, हम भी सम्बन्धों के जाल में फं स जाते हैं। हम एक परिवार तक सीमित हो जाते हैं, जबकि जीवन का उद्देश्य तो अलग ही है। अर्जुन भी इसी उधेड़बुन के चलते श्रीकृष्ण से कहते हैं,‘इस युद्ध में विजय के बदले मुझे तीनों लोकों का राज भी मिल जाए, तो भी अपने परिवार को कष्ट पहुंचाने वाले इस युद्ध को मैंं नहीं करना चाहूंगा।’ ये कहकर वे तीर-कमान नीचे रख देता है। अर्जुन पूरी तरह से निराश हो चुका है। हम भी जीवन में अक्सर निराश हो जाते हैं, इसलिए हम सभी के लिए अध्याय दो से लेकर आगे की यात्रा बहुत महत्वपूर्ण होगी।

क्रमश:

Share this on :

Shreemad Bhagwad Geeta Sanjay Ki Nazar Se – Adhyay One

Share this on :

Adhyay One – ARJUNA VISHAD YOGA

Bhagavad Gita  is one of the most beautiful and soul enriching spiritual texts ever written, the protagonist or the central figure Arjuna, the great warrior is a true devotee and inquires to   Lord Krishna about several issues as compelling today as they were ions of years ago.

In the“ Shrimad Bhagavad Gita Sanjay Ki Nazar Se ,I,  Dr Sanjay Biyani have used contemporary, simplified language to bring this inspiring work to life.

In this enlightening text it is explained that when a person goes through misery, it awakens him, and then leads him to experience knowledge. During this periods of darkness and misfortune a person should feel humble and realize that this is the time when he would experience true enlightenment. This is why the very first chapter is referred as Arjuna Vishad Yog. Just like Arjuna faces the dilemma in the battle field so do we all mortal beings in our day to day lives encounter such predicaments.

When in a depression or Vishad, one keeps on seeing everything as not right, It is like a negative zone that engulfs a person, it rattles and jolts them up. These negative thoughts can come at home or at the work place. To move out of this negative space, you need some supporting foundation and a firm base. And that comes to you from knowledge, which is so amply provided by the Bhagwad Geeta ,the beautiful discourse between the Lord and his devotee.

Facing the duty as a warrior to fight the Dharma or righteous war between Pandavas and Kauravas, Arjuna is directed and adviced by Lord Krishna to consummate  his duty as a warrior .

Here Lord Krishna  also perorates the most important questions relevant to our existence which are Who is the real me? What is the purpose of my Life? How can I attain eternal Bliss??

Shri Krishna also explains that the  soul is imperishable and indestructible to the seeker of knowledge who is Arjuna. He explains that the individual soul is unbreakable and infrangible, and can be neither burned nor destroyed.

The soul is immutable, abiding, deathless and eternally the same. This knowledge is of paramount importance for us also as  knowing this, we would not lament and grieve for the temporary body. He compares it to the simple process of a mortal being simply changing clothes. So, the body dwindles and finally dies but the soul does not die: it simply changes bodies.

Through the knowledge of the  Bhagwad Geeta it is expressed tha that those who have purified their awareness, becoming absorbed in sacred acquaintance and exonerating any impurities in the mind, are released from karma that frees them from any future births. They are for ever freed from any more births in the material world and are delivered to the spiritual atmosphere.

In this way we enter into this spiritual journey of “Shrimad Bhagwad Gita” with me Sanjay in this spell bounding series “Shrimad Bhagwad Geeta Sanjay Ki nazar se”

Share this on :

स्टीफन हॉकिंगः युवाओं के रोल मॉडल

Share this on :

ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी में अहम योगदान प्राप्त, 12 मानद डिग्रियों और अमेरिका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान प्राप्त स्टीफन हॉकिंग भले आज इस दुनिया में ना रहे हो लेकिन आज के युवाओं के लिए आत्ममंथन और प्रेरणा के लिए स्पष्ट पदचिन्ह छोड़ गए। 21 वर्ष की आयु में डॉक्टर्स ने हॉकिंग को बता दिया था कि उन्हें मोटर न्यूरोन नामक लाइलाज बीमारी है और उनके पास जीने के लिए दो-तीन साल शेष बचे हैं। आज हम में से किसी के साथ ऐसा हो जाए तो सम्भवतरू सिर्फ दो वर्ष भी जीना असंभव हो जाए परन्तु स्टीफन हॉकिंग ने 55 वर्ष मोटर न्यूरोन बीमारी को ही नहीं हराया बल्कि वो सब कारनामे कर डाले जो किसी भी इंसान की सर्वोच्च उपलब्धि कही जा सकती है। आज भी हम अपने जीवन में सामान्य समस्याओं से घबरा जाते हैं। स्टीफन की लगभग सभी मांसपेशियों से उनका नियंत्रण खो चुका था और वो अपने गाल की मांसपेशियों के जरिए अपने चश्में पर लगे सेंसर को कम्प्यूटर से जोड़कर ही बातचीत कर पाते थे। हमारे सामने सवाल इस बात का नहीं होता है कि हमारे पास कौन-कौन सी शारीरिक और मानसिक दुर्बलताएं है बल्कि सवाल इस बात का है कि हम सब लोग अपनी कितनी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का उपयोग कर पाते हैं। वास्तव में हम सभी लोग अपनी इन क्षमताओं का 5 प्रतिशत भी उपयोग नहीं करते, शायद हम तो यह भी नहीं जानते कि हर कार्य कर्म नहीं होता सिर्फ वहीं कार्य कर्म होता है जो चौतन्यता यानि होश में किया जाए। हमारें ज्यादातर काम या तो दोहराव है या फिर भीड़ का अनुसरण। हमें उन सब तरीकों की खोज करनी होगी जिनके आधार पर हम जीवन के हर क्षण प्रेरित रह सके और जीवन को एक बड़े लक्ष्य से जोड़ सके। मानव जाति का विकास चुनौतियों के कारण ही तो हुआ है फिर आज हम चुनौतियों से क्यों घबरा जाते हैं। इस माह स्टूडेंटस परीक्षाओं में व्यस्त हैं मैं उन्हें ये सलाह देना चाहता हूॅ कि परीक्षाओं की तैयारी में सबसे बड़ी बाधा बार-बार उन परीक्षाओं से प्रत्याशित परीणामों को सोचने के कारण होती है। आप सभी अपना पूरा ध्यान कर्म पर लगाए ताकि आपकी अनमोल क्षमताओं का आपके लक्ष्य को प्राप्त करने में सही- सही उपयोग की जा सके। मैं आपसे यह आग्रह करता हूं कि परीक्षाओं के दिनों में प्रतिदिन सुबह १५ मिनट एकाग्रता को बढ़ाने के लिए मेडिटेशन भी करे।

आज महिला सशक्तिकरण की बात की जा रही है जबकि हम सभी जानते है कि महिलाएं मानसिक रूप से पुरूषो से अधिक शक्तिशाली होती हैं। स्टीफन हॉकिंग द्वारा भी अपनी मानसिक क्षमताओं का ही उपयोग किया गया था।

इन दिनों मैंने श्रीमद्भगवद गीता का गहनता से अध्ययन किया। मैनें पाया कि श्रीमद्भगवद गीता जो कि १८ अध्याय में विभक्त है और इसमें कुल ७०० श्लोक श्रीकृष्ण, अर्जुन, संजय और धृतराष्ट्र के द्वारा कहे गये है। यह पुस्तक हमारे जीवन में उठ रहे तनाव और अवसाद को कम कर हमारी निर्णायक क्षमता को बढ़ा देती है। जो अवसाद आज से लगभग 5150 वर्ष पूर्व अर्जुन को थे कमोवेश उसी प्रकार के तनाव और अवसाद आज हम सभी के जीवन में भी है। जब हम तनाव मुक्त होकर अपने लक्ष्य पर ध्यान लगाते है तो हमें ना सिर्फ बड़ी सफलताऐं मिलती है बल्कि हमारी निर्णय क्षमता बढने के साथ-साथ हमें प्रसन्नता की अनुभूति भी होती है।

मैं बड़े ही हर्ष के साथ लिख रहा हूं कि श्रीमद् भगवद् गीता पर 18 अध्याय का कार्यक्रम तैयार किया गया है। जिसे आज के परिप्रेक्ष्य में बड़ी आसान और सरल भाषा में शीघ्र ही टीवी पर प्रसारित और यूटयूब पर अपलोड करने जा रहा हूं।

Share this on :

व्यक्ति समाज के लिए या समाज व्यक्ति के लिए

Share this on :



स्वार्थ, स्वार्थ, स्वार्थ चारों तरफ स्वार्थपरक दुनिया बनती जा रही है। जिसको देखो येन केन प्रकारेण सबको पैसा चाहिए, प्यार चाहिए लेकिन सिर्फ अपने लिये, दूसरों को देने के लिये उनके पास न प्यार है न पैसा। स्वार्थ की धुन में कुछ लोग इतने डूब जाते हैं कि उन्हें सही-गलत का फर्क ही पता नहीं रहता। यह लोग गलत तरीकों का इस्तेमाल करके देश की जनता का पैसा लूटते हैं, जैसे कि नीरव मोदी। इनकी कंपनी ने पंजाब नेशनल बैंक के साथ धोखाधड़ी करके 11,300 करोड़ रुपए का घोटाला किया है। जिसके लिए बैंक के कर्मचारियों की मिलीभगत से गलत तरीके से लेटर ऑफ अंडरटेकिंग को दिखाकर आयात के नाम पर पैसा लिया गया। लेटर ऑफ अंडरटेकिंग एक प्रकार की गारंटी होती है जो जारी करने वाला बैंक अपने ग्राहक के लिए लेता है जिसको आधार मानकर दूसरा बैंक ग्राहक को पैसे दे सकता है।
वहीं स्वार्थपूर्ण प्रेम का एक दुखद वाकया अभी जयपुर में देखने को मिला जिसमें वेलेंटाइन डे पर निकाह नहीं करने पर एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका पर तेजाब डाल दिया। यह कैसा प्रेम है जहां सिर्फ पाने की ललक है? लगता है ये समाज किस दिशा जा रहा है?
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या ऐसे समाज में हमारी आने वाली पीढिय़ा रह पाएंगी? लोग क्यों सिर्फ अपना ही भला चाहते हैं चाहे उसके लिए उन्हें कोई गलत काम ही क्यों न करना पड़ जाए। बहुत गहराई से सोचने पर हमने जाना कि इन सारे सवालों का जवाब श्रीमद्भभगवद गीता में दिया गया है। इंसान शरीर रुपी रथ से चलता है और इस स्थूल शरीर रथ को चलाती हैं हमारी इंद्रियं जो रथ के घोड़े समान है और इन इंद्रियों को चलाता है हमारा ‘मन’ जो इन सारी समस्याओं का कारण भी है। इसलिए कहा भी गया है मन के मते न चलिये मन के मत अनेक। इंसान का मन ‘मोह’ के कारण राग द्वेष में फंसा रहता है। मन हमेशा स्वयं पर केंद्रित रहता है, यह हमेशा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए इंद्रियों को अपने प्रिय विषयों की ओर खींचता रहता है।
आज समाज में धर्म की समझ खत्म होती जा रही है, शायद क्योंकि अब धर्मपरक शिक्षा व्यवस्था नहीं रही, और परिवार के सदस्यों को छोटे बच्चों को धर्म का अर्थ समझाने का समय नहीं मिल रहा है। कारण जो भी हो लेकिन आज समाज से धर्म का हृास होता जा रहा है और यह एक स्वार्थपरक समाज बनता जा रहा है जहां लोगों को जो पसंद है बस वो चाहिए चाहे उसके लिए कुछ भी गलत रास्ता अपनाना पड़े।
इंसान को आज समझना होगा कि अपने हित से पहले हमें परिवार का हित देखना चाहिए और परिवार के हित से पहले गांव का हित देखना चाहिए और गांव के हित से पहले देश का हित। अगर हम ये जानना चाहते हैं कि हमारा कोई भी कर्म धर्म के अनुसार है या नहीं तो हमें यह देखना होगा कि वह समाज हित में है या नहीं। वेदों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सूत्र वाक्य कई हजार साल पहले दे दिया था जिसका भाव था सारी पृथ्वी को अपने परिवार की तरह मान कर चलो, हम सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
कुछ ही दिनों में होली आने वाली है हमने पहले भी कहा है कि बुराई, भ्रष्टाचार और बेईमानी की होली जलनी चाहिए, तो आइये इस बार ”स्वार्थ’ की होली जलाएं।
इसी के साथ आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ…

Dr. Sanjay Biyani

 

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

Share this on :

समाज में आर्थिक खुशहाली के लिए एन्टरप्रेन्योर्स को बढ़ावा दिया जाना बहुत ही आवश्यक है

Share this on :



नरसिम्हा राव सरकार के कार्यकाल के दौरान वर्ष 1991 में एक समय आया था, जब भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह कर्ज में डूब कर दिवालियेपन की दिशा में पहुंच चुकी थी। सरकार के पास देश का सोना गिरवी रखकर ऋण लेेने के सिवाय, कोई भी रास्ता नहीं बचा था। इसका प्रमुख कारण सेवा व उद्योग जैसे क्षेत्रों में सरकारी दखलअंदाजी व लाइसेंस प्रणाली थी। उस वक्त नरसिम्हा राव सरकार द्वारा उदारीकरण की नीति अपनाकर सरकारी दखलअंदाजी व लाइसेंस प्रणाली को समाप्त किया गया था। हम सभी जानते हैं कि टेलीकम्यूनिकेशन, इंश्योरेंस व एजुकेशन के क्षेत्र में लाइसेंस राज कम करने से सेवा क्षेत्र में बहुत बड़ा सुधार व इंफ्रास्ट्रक्चर गत दशक में तैयार हो गया है। हम सभी यह भी जानते हैं कि हर जागरूक व्यक्ति अपने बच्चों को निजी स्कूल व कॉलेज में ही पढ़ाना चाहता है और इसी तरह जब स्वास्थ्य की बात आती है, तो भी हर व्यक्ति निजी क्षेत्र के अस्पतालों का ही रूख करता है। बावजूद इसके सरकारी तंत्र समय-समय पर शिक्षा, चिकित्सा और व्यापार आदि क्षेत्रों में हस्तक्षेप करके निजी क्षेत्र के लिए एक नकारात्मक वातावरण तैयार करता ही रहता है। हाल ही में इसके कई उदाहरण देखने को मिले हैं। इनमें सबसे पहला उदाहरण मैैक्स अस्पताल का लाइसेंस रद्द किया जाना रहा। किसी एक डॉक्टर की लापरवाही की सजा समस्त स्टेकहोल्डर को दिया जाना किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री को यह समझना चाहिए कि सरकार एक फे सीलिटेटर के रूप में कार्य करती है, ना कि डिक्टेटर के रूप में। इस सम्बन्ध में मैक्स अस्पताल को सुनवाई का अवसर दिए बिना यह कदम उठाना किसी भी प्रकार से उचित नहीें है। इसी प्रकार की घटना दिल्ली स्थित रेयॉन स्कूल के साथ भी देखी गई थी। रेयॉन स्कू ल की कुल १८६ शाखाएं देश में कार्यरत हैं। किसी एक शाखा में हुई दुर्घटना के लिए डायरेक्टर को दोषी मानते हुए कार्यवाही किया जाना किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीें कहा जा सकता।

हाल ही में राजस्थान सरकार के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा निजी कॉलेजों की फीस तय करने का फैसला लिया जा रहा है। सभी कॉलेजों के संसाधन व गुणवत्ता भिन्न-भिन्न है, ऐसे में एक समान फीस किस प्रकार तय की जा सकती है? वैसे भी सरकार प्रदेश के ३५००० निजी स्कूलों की फीस पर लगाम कसने में अब तक असफल साबित हुई है। इस तरह की दखलअंदाजी से ना सिर्फ एन्टरप्रेन्योर हतोत्साहित होते हैं, बल्कि सरकारी तंत्र में भी भ्रष्टाचार पनपने लगता है। आवश्यकता इस बात है कि सरकार, एन्टरप्रेन्योर्स को सुविधा व मार्गदर्शन प्रदान करने वाली संस्था के रूप में काम करे। समाज में आर्थिक खुशहाली के लिए एन्टरप्रेन्योर्स को बढ़ावा दिया जाना बहुत ही आवश्यक है। किसी एक घटना या किसी एक पक्ष को जानकर निर्णय लिया जाना उचित नहीं है। निजी शिक्षण संस्थाएं व निजी अस्पताल आज भी बेहतरीन सेवाएं देने के साथ-साथ नियामक संस्थाओं से जुझते रहते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में इन क्षेत्रों को जनता के द्वारा सहज तौर पर ही नियन्त्रित किया जाना चाहिए।

प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ…
To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

 

Dr. Sanjay Biyani

 

Share this on :

आपके जीवन में आपके नाम का क्या महत्त्व है ?

Share this on :



बहुत समय से मैं इस विषय पर रिसर्च करता आ रहा हूँ कि आदमी के जीवन में उसके नाम का क्या महत्त्व है और उनके नाम के अनुसार उनका व्यक्तित्व कैसा है ? मैंने पाया कि जिसका जो नाम है लगभग -लगभग उसका व्यक्तित्व एक लंबे समय बाद वैसा ही बन जाता है। जरा सोचे कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण क्या है ? इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है कि ‘शब्द शक्ति है‘, ‘शब्द ऊर्जा है‘ और यह शक्ति और ऊर्जा जब किसी के लिए बार-बार दोहराई जाती है तो वह एक वाइब्रेशन लेकर आती है। वह वाईब्रेशन एक एनर्जी को जन्म देती है और वह एनर्जी जब किसी के पास आती है तो वह शब्द एक शेप लेकर संरचित हो जाते है और धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व में वह रूपान्तरण होने लगता है इसलिए लोग दुःशासन नाम नहीं रखना चाहते, दुर्योधन नाम नहीं रखना चाहते। सभी लोग सकारात्मक और बेहतरीन नाम रखना चाहते है, क्यांकि एक लम्बे समय बाद पूरे समाज को यह बात समझ आई कि नामकरण संस्कार एक बहुत बड़ा संस्कार है और नाम का जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है। नाम के अनुसार ही हमारा व्यक्तित्व बन जाता है। जब भी हम किसी को पुकारते है, आवाज देते है या बुलाते है तो उसका अपना नाम उसके ऊपर थ्रो किया जाता है और नाम के प्रभाव से वो बच नहीं सकता है क्योंकि वह एनर्जी एक दिशा में प्रसारित कर दी गई है और उस एनर्जी के अनुसार सामने वाले का व्यक्तित्व एक शेप लेता है । इसलिए जो भी शब्द बोले, सोच समझकर बोले क्योंकि शब्द ही तो ब्रह्म है, शब्द ही तो चेतना है, शब्द ही तो शक्ति है। इसलिए अगर गाली भी बोले तो जरा सोच-समझकर बोले क्योंकि उसकी एनर्जी के प्रभाव से ना आप बच पाएंेगे ना सामने वाला। नाम का प्रभाव आपके व्यक्तित्व पर कितना हुआ है यह आपकी उम्र पर भी निर्भर करता है आपकी उम्र बढ़ने के साथ-साथ आपके नाम को पुकारने की संख्या भी बढ़ती रहती है और जैसे-जैसे यह आवृति बढ़ती है उस नाम से सम्बन्धित एनर्जी आपमें उतरने लगती है और आपका व्यक्तित्व बहुत हद तक आपके नाम के अनुसार हो जाता है।

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

 

Dr. Sanjay Biyani
Share this on :

क्या प्रेम करना अपराध है ?

Share this on :



आज के हजारों साल पहले चन्द्रगुप्त ने अपने गुरू चाणक्य से एक सवाल किया था मुझे धनानन की पुत्री से प्रेम हो गया है, क्या प्रेम करना गुनाह है ? तब से लेकर आज तक यह सवाल हर किसी के जेहन में बार-बार आता है। आधुनिक युग के बायॅफ्रेंड/गर्लफ्रेंड कल्चर में यह सवाल लगभग हर युवा के मन में रहता है। इन दिनों कई युवाओं ने मुझसे भी यह सवाल किया। उनका पूछना था कि क्यों हमारे घरवाले हमें प्रेम करने से रोकते है ? क्या प्रेम ताकत नहीं है ? क्या प्रेम एनर्जी नहीं है ? क्या प्रेम जीवन नहीं है ? प्रेम करना चाहिए या नहीं करना चाहिए ?
उस समय चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को जवाब दिया -चन्द्रगुप्त, तुम्हारे जीवन में अखण्ड भारत का महान लक्ष्य रख दिया गया है। इसलिए प्रेम में समय गंवाना कदाचित उचित नहीं है। इस जवाब की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है। अर्थात् अगर आपके जीवन में कोई महान लक्ष्य है, तो फिर उस लक्ष्य से प्रेम कीजिए फिर आपको सब छोटे लगने लगेगे। अभी जीवन में लक्ष्य का छोटा होना या लक्ष्य का ना होना इस तरह के उन्माद पैदा करता है। अगर वास्तव में आप बिना लक्ष्य के जीवन बिताना चाहते है तो मैं कहूंगा कि प्रेम कीजिए, बाॅयफ्रेंड बनाइए, गर्लफ्रेंड बनाइए। लेकिन हर चीज की एक उम्र होती है। जब हम युवावस्था में हो अर्थात 25 वर्ष की उम्र में हो तो उस समय तो सबसे महत्त्वपूर्ण यही है कि हम अपने लक्ष्य से प्रेम करें। प्रेम किसी व्यक्ति से ही हो यह जरूरी नहीं है। प्रेम तो सजीव या निर्जीव किसी वस्तु से भी किया जा सकता है प्रेम ही तो दुनिया की ताकत है।
प्रेम करना अपराध नहीं है लेकिन गलत वक्त पर गलत फैसला लेकर उसे प्रेम का नाम देना अपराध है।
अगर आपके जीवन में आपने कोई लक्ष्य तय कर लिया है, अगर आप आई.ए.एस, आर.ए.एस, सी.ए या डाॅक्टर बनना चाहते हे तो सबसे पहले अपने लक्ष्य से प्रेम करें। यही आपको शक्तिशाली बनाएगा, यही आपको महान् बनाएगा। ये फैसला आपके हाथ में है कि जीवन लक्ष्य से जीना है या बिना लक्ष्य के । अगर जीवन लक्ष्य के साथ जीना है तो निश्चित रूप से अपने लक्ष्य से प्रेम करें।

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

 

Dr. Sanjay Biyani
Share this on :

भारतीय राजनीति में योगी विचारधारा की आवश्यकता

Share this on :


योगी कौन होता है ? योगी उसे कहा जाता है जो सांसारिक प्रपंचों को छोड़ कर अपना जीवन किसी एक विचार के लिए समर्पित कर देता है चाहे वो ईश्वर प्राप्ति का विचार हो, आत्म साक्षात्कार करने का विचार हो या ब्रह्म को जान लेने का विचार हो। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि योगी के जीवन का एक निश्चित लक्ष्य होता है जिसे प्राप्त करने के लिए वो कठोर स्व-अनुशासन का पालन करता है और घर परिवार का भी त्याग करने को तैयार हो जाता है।
अब बात आती है कि आखिर राजनीति में योगी विचारधारा की क्या आवश्यकता है ? सही मायनों में राजनीति एक बहुत बड़ा समाज सेवा का कार्य है जिसमे नेता को समाज के विकास और सामाजिक समस्याओं के निवारण के उद्देश्य से कार्य करना होता है । भारतीय समाज अनेकता में एकता वाला समाज है जहां तरह-तरह की सामाजिक समस्याएं भी रोज सामने आती रहती हैं । इन समस्याओं का समाधान करने के लिए भारत की जनता द्वारा 545 लोकसभा सांसद, 245 राज्य सभा सदस्य और लगभग 4120 विधानसभा सदस्यों को चुना जाता है । इन 4,910 व्यक्तियों के हाथों में सवा सौ करोड़ देशवासियों वाले इस अति विशाल परिवार को सही दिशा में ले जाने का जिम्मा होता है।
अब यह समझना जरूरी हो जाता है कि एक सामान्य इंसान जो 5-7 सदस्यों वाले अपने छोटे से परिवार को संभालने में इतना उलझा रहता है कि उसको परिवार के अलावा कुछ सोचने का समय ही नहीं मिल पाता है तो ये 4,910 व्यक्ति अपने निजी परिवार और व्यापार के साथ इतने विशाल देश को संभालने का समय कहां से निकाल पाते होंगे ?
पार्ट टाइम राजनीति की वजह से देश के विकास कार्यों की गति धीमी रह जाती है । क्यूंकि राजनेता का पूरा ध्यान उसके असली कार्य समाजसेवा में न होकर भिन्न-भिन्न कार्यों में बंटा रहता है इसलिए परिवारवाद और भाई-भतीजावाद भी राजनीति पर हावी रहता है, जिसके चलते राजनेता सिर्फ अपना, अपने परिवार का और अपने प्रिय लोगों का ही भला करने की सोचते रहते हैं। उनको यह सोचने का समय ही नहीं मिलता कि उनको पूरे देश को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।
ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि क्या इतने विशाल देश में ऐसे 5,000 काबिल आदमी भी नहीं हैं जो एक योगी की तरह, सिर्फ और सिर्फ इस देश को चलाने के लिए अपना तन-मन और धन सब अर्पण कर सकें? एक योगी कि तरह अपने परिवार, व्यापार, रिश्तेदार का त्याग कर के 24 घंटे सिर्फ और सिर्फ देश के विकास के लिए जुट जाए। इतिहास गवाह रहा है कि वही राजनेता देश को आगे ले जाते हैं जो समाज को अपने देवता की तरह पूजते हैं, समाज के दर्द को अपना दर्द समझ कर उसे दूर करने में जुटे रहते हैं। चाहे कलाम साहब का उदाहरण ले लीजिये या अटल बिहारी बाजपेयी जी की बात करिये और वर्तमान में योगी आदित्यनाथ हों या मोदी जी इन सबके जीवन में एक समानता मिलेगी और वो है ‘योगी विचारधारा’। इनके जीवन में समाजसेवा के अलावा और कोई कार्य ही नहीं और शायद इसीलिए अपने कार्यों के बल पर इन्होने लोकप्रियता के उस ऊंचे मुकाम को प्राप्त किया जो अद्भुत है। एक लक्ष्य, एक विचार और उसके प्रति जीवन को समर्पित कर देना यही आज राजनीति की आवश्यकता है। आज राजनीति को ऐसे लोग चाहिये जिनके पास 24 घंटे सिर्फ एक ही काम हो और कोई काम ही न हो जो उनका ध्यान भटका सके। जब तक पार्ट टाइम राजनेता का समय परिवार और व्यापार में उलझा रहता है तब तक भ्रष्टाचार की भी संभावना बनी रहती है, जैसे ही राजनेता परिवार और व्यापार के झंझट से निकल जाता है तब उसे सिर्फ अपना असली काम दिखता है। हमें पूरा विश्वास है कि इस राजनीति के कीचड़ को अगर साफ किया जा सकता है तो वो योगी विचारधारा के व्यक्तियों को राजनीति में आगे बढ़ा कर ही किया जा सकता है क्यूंकि सिर्फ एक सच्चा योगी ही ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ की विचारधारा पर चलकर सारे समाज को अपना परिवार मानता हुआ, अपने जीवन को समाज कार्य में अर्पित कर सकता है। प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ….

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

Share this on :

How to take a sound sleep

Share this on :

 



Today I want to talk about a word, this word is really very powerful…… people named there daughter as “Nisha”, Nisha is a negative word, I thought today is a good day to understand this word and it will help us to know the meaning of freshness, and power.

Look at the small children, if you really have a zeal to learn, learn from them, they are the good teachers, we can even learn from them when they are smiling, when they are sleeping… we can count when they sleep but we can’t on elders.
The person who can sleep well can wake up well… The person who can smile like shinning stars can gain the energy like star too.

So why we can’t sleep? ….. Tomorrow I met some teachers they complain that they can’t sleep but in morning they write poems, how the restless people can explain the beauty in poems, I wonder? Sleeping at night is very important, so let’s discover why small children sleep well and why elders can’t.

A small child is full of happiness because they don’t have ego and this thing should be learn from them. When we grow we become egoistic and this ego gives birth to frustration, irritation and anger. This ego has widened its roots in the whole society. So let’s focus on the remedy…. Why ego? Because when we grow older we continuously use the words “Me & my”, why me? Why not me? This is mine etc.

We should learn from the nature they are providing equal things to us, rain from clouds, oxygen from trees, all oceans, soil, mountains are there for us..
Their aim is to give and give and give.

We should not focus on ourselves only, when we think about others we travel the journey of me to us … and this helps us to get relief, to get sleep at night.
If we really want to know the magic of sleeping we should make ourselves ego free, and to be ego free we have to think about others more.

“May I help you please?”… Is the ultimate solution of all the problems?

The above words increase the level of happiness and freshness.

So in this season ask tress ” may I help you” ,ask birds may I help you please, these words helps to polish the society, these words helps to have you a beautiful sleep.

 

Share this on :

Oneness of God, Oneness of religion, Oneness of humanity…..

Share this on :

Oneness of God, Oneness of religion, Oneness of humanity…..

Tomorrow, I went to a place, people over there are happy, laughing and positive vibes are coming from them….. Leaving that place I went to the next one where people are screaming , crying and cursing god for a sudden death in the family.

Wholeness is not just a word we should understand its deep meaning which helps us in accepting all the things in a better way.

We became happy and welcome the new born but we are sad and unhappy on death, why?

Rather we should surrender to the decision of God. We should understand that both are the decision of god , we need to accept it and try to overcome the problem.

Both joy & sorrow, birth & death are one, they are just different sides of the same coin.

Harmony brings joy to our life, smiles on our lovely faces which ends up all the negativity within us.

People face stages on mishaps-

  1. They don’t accept what happens.
  2. Why me? Why not other?
  3. Crying & curse their destiny.
  4. Accepting the things & try to solve it.

If on the first  step we accept things and take them as one, we can find more solution to a problem.

Accepting things brings peace & ultimate happiness the our lives.

The morning session in Biyani Group of Colleges ends with ” OM MANI PADME HUM” where om stands for god, mani stands for money , padme stands stands for lotus and hum stands for soul.

All the faculty members & students bow down, fold their hands and depicting oneness of mind and soul.

 

Share this on :