ईश्वर और प्रकृति पूर्ण (perfect) हैं

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मस्तिष्क अत्यंत शक्तिशाली है। आइए हम जानें कि हमारा मस्तिष्क किस प्रकार कार्य करता है- सर्वप्रथम जब हम सुनते है तो मस्तिष्क में बिम्ब बनता है। यदि मस्तिष्क एकाग्रचित होता है तो यह इच्छा शक्ति का विकास कर लेता है। यदि मस्तिष्क इच्छुक नहीं हो तो आपको कोई संदेश याद नहीं रह पाएगा। आपकों यह ज्ञात होना चाहिए कि समुचित रूप से कुछ भी कैसे याद रखा जाए और परीक्षा के समय सही उत्तर कैसे दिया जाए? हमारी क्या कमजोरियाँ है ? हमें परीक्षा में कम अंक क्यों प्राप्त होते हैं ? हम सैद्धान्तिक सामग्री क्यों नहीं याद रख पाते ? एकाग्रता की कमी के कारण हम जीवन में इच्छित उपलब्धि नहीं ले पाते।
चलिए हम मस्तिष्क को प्रशिक्षित करते है। एक प्रभावशाली मंत्र का बार-बार उच्चारण करते हैं। उच्चारण करते समय मस्तिष्क में कोई और विचार न लाएँ। इसे तीन बार उच्चारित कीजिए। पुनरावृत्ति आवश्यक है।
परन्तु पुनरावृत्ति के समय यदि आप यही सोचते रहते हैं कि मैं याद नहीं रख सकता, मैं परीक्षा के समय उत्तर भूल जाऊंगा तो ऐसा वास्तव में होगा। इन नकारात्मक विचारां के कारण हमारी संकल्प शक्ति क्षीण हो जाती है जब कि हमारे बीच अधिकांश लोग प्रतिभावान है । हम पूर्णतः सामान्य हैं। अब हम अपनी बौद्धिक शक्ति का परीक्षण करते हैं। हमस्वयं पर ध्यान केंद्रित करें और सर्वप्रथम निम्न मंत्र का अर्थ समझेंगे फिर इसकी पुनरावृत्ति इस आत्मविश्वास के साथ करेंगे कि हम इसे सही-सही रूप से बोल सकते हैं।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इसका मतलब यह है कि प्रकृति पूर्ण (perfect) है जिसे हम बाहरी दुनिया कहते हैं साथ ही साथ हमारे अन्दर की चेतना भी पूर्ण (perfect) है। जिसे हम आत्मा, परमात्मा, ईश्वर और आन्तरिक शक्ति के रूप में जानते है। इस दिव्य शक्ति से ही सब सृजन हो रहा है।  

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क्या बच्चे वो करते हैं जो उन्हें कहा जाता है या जो उनकी अपनी पुस्तकों में लिखा होता हैं ?

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एक बालक की अच्छी परवरिश अत्यंत उपयोगी है। बच्चे अपने माता-पिता या गुरूजनों या बड़ों का ही अनुकरण करते हैं। माता-पिता या बड़ों को अपने बच्चों के जीवन में आदर्श ;तवसम उवकमसद्ध बनना चाहिए।
आजकल माता-पिता अपने बच्चों के साथ समय व्यतीत नहीं कर पाते क्योंकि वे अत्यन्त व्यस्त है। उन्होंने उनके लिए अच्छे विद्यालय, महाविद्यालय, कई आधुनिक सुविधाओं जैसे मोबाइल, ट्यूशन, कोचिंग, गाड़ी आदि की सुविधाएं तो प्रदान की है। फिर भी बच्चे अपने माता-पिता से दूर होते जा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है ? सम्बन्धों में संवादहीनता क्यों हो रही है ?
हम सभी अत्यधिक शक्तिशाली हैं। हमारे शरीर में लगभग 300 से 500 खरब कोशिकाएँ होती हैं और प्रत्येक कोशिका में लगभग 8 GB मैमोरी क्षमता होती है। किन्तु हम इस शक्ति का प्रयोग क्यों नहीं कर पाते है। केवल कॉलेज ही विद्यार्थियों को शक्तिशाली नहीं बना सकता। वास्तविक शिक्षा माता-पिता द्वारा ही दी जानी चाहिए जो बच्चे को एक वास्तविक मनुष्य बनने में सहायक होगी। माता-पिता बालक के सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षक होते है। परवरिश शक्तिशाली होनी चाहिए तभी बच्चों की वास्तविक अभिवृद्धि हो सकेगी। बालक के जीवन की पहली शिक्षक माता ही होती है। माता सदैव प्रेममयी एवं आपका ध्यान रखने वाली होती है। वह अपने बच्चे पर पूरी निष्ठा से ध्यान देती है और उसके जन्म के पहले क्षण से उसका सजग होकर पालन पोषण करती है। पहले दिन से ही एक माता अपने बालक को स्वप्रेरणा से इशारों और अशाब्दिक क्रियाओं (non verbal action) के द्वारा प्रेम की भाषा सिखाती है। बालक बचपन में माता-पिता के साथ लुकाछिपी खेल खेलते हुए आनन्दित होता है। परन्तु जैसे ही वह युवावस्था में पहुंचता है माता-पिता के साथ असहज होता चला जाता है। जब माता-पिता उनके कक्ष में पहुंचते हैं तो बच्चे वहाँ से चले जाते हैं। बच्चे अपने साथियों के साथ वाट्सएप, कम्प्यूटर, फेसबुक की अपनी ही दुनिया में व्यस्त हो जाते है। हम आपसी वार्तालाप हेतु बहुत कम समय निकाल पा रहे हैं। अब सम्बन्धों और आपसी व्यवहार में बहुत कम भावनाएँ और बहुत तर्क रह गया है।
परन्तु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्या है – आपके बच्चे का भविष्य या आपकी नौकरी या व्यवसाय ? सबसे महत्त्वपूर्ण है बच्चों के भविष्य का निर्माण करना। यदि चरित्र विलुप्त हो जाता है तो सब कुछ खो जाता है। यदि आप समग्र विश्व को जीतकर अपना चरित्र खो देंगे तो आपको क्या लाभ होगा ? आइए हम अपने बच्चों को मूल्य सिखाएँ। हमारे घर-परिवार के सम्बन्ध और नींव को सशक्त बनाएँ। अपने बच्चे को मानसिक रूप से मजबूत बनाएँ। उन्हें कृतज्ञ रहना सिखाएँ। उन्हें माता-पिता के पैर छूना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना सिखाएँ। श्रेष्ठ सकारात्मक कार्य बालक में कृतज्ञता का भाव उत्पन्न करना ही होगा। इसी प्रवृत्ति से जीवन में स्वास्थ्य, सम्पत्ति, सम्बन्ध, आजीविका और सफलता की प्राप्ति होगी। इसके लिए मैं आपको तीन सुझाव देता हूँ –
कहिए – ‘‘धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद ‘‘। न केवल बोलिए बल्कि इसे अनुभव भी कीजिए और तीन बार कारण सहित, कार्य करने से पूर्व और कार्य समापन पर धन्यवाद कहिए। अपने माता-पिता, नियोक्ता, पेड़ों, प्रकृति और अपने भोजन के प्रति कृतज्ञ रहना सीखिए।
मनुष्य स्वयं के लिए और समाज के लिए जीता है । हमें अधिकाधिक उपयोगी बनना चाहिए। हम सभी ऊर्जापुंज ही तो हैं। अभिभावक जब तक स्वयं अपने आचरण में इन सब चीजों को नही लाएंगे तब तक ऐसा सिखाना महज औपचारिकता ही होगी। बच्चे बड़ों को देखकर ही अधिक सीखते हैं। वे पुस्तकों व निर्देशित बातों से नहीं सीख पाते बल्कि व्यावहारिकता से अधिक सीखते हैं।
हम भौतिक शरीर नहीं है। क्या हम सकारात्मक हैं? सकारात्मकता अच्छी ऊर्जा प्रदान करती है। नकारात्मकता कुण्ठा को जन्म देती है। इसलिए हम क्रोधित होते हैं, दूसरो को आहत करते हैं और उग्र हो जाते है। अपनी ऊर्जा को कैसे रूपान्तरित करें। नकारात्मक ऊर्जा से कैसे मुक्त हो ? इस हेतु हमें एक सामान्य शब्द ‘‘मुझे माफ कर दीजिए‘‘ (i am sorry) का प्रयोग करना होगा।
हम सभी गलतियाँ करते हैं परन्तु हम में से कितने लोग गलती स्वीकार कर कहते है कि ‘‘मुझे क्षमा कीजिए‘‘ हम अहंकारयुक्त जीवन जीते हैं। प्रत्येक दिन के प्रारंभ पर सुबह अपने बच्चों को माता-पिता के चरण स्पर्श करना सिखाएं तभी वे अपने अहंकार से मुक्त हो सकेंगे। वे अपनी गलती पर कह पाएंगे कि ‘‘मुझे क्षमा कीजिए‘‘। उन्हें नजरें मिलाकर कारण सहित और अच्छी भावना के साथ गलती स्वीकारना सिखाए।
हममें से अधिकांश लोग एक सामान्य गलती करते हैं कि हम अपनी माँ से झूठ बोलते है या अपने माता-पिता से सत्य छिपातंे है। यह हमारे द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है। आइए आज से हम यह संकल्प ले कि यह अपराध पुनः नहीं दोहराएंगे।
हम सही रूप से कार्य करें और ‘‘कर्म के नियम‘‘ को समझे। प्रत्येक कार्य के लिए समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है। जीवन मे कुछ प्राप्त करने के लिए आपको कुछ करना होगा, कुछ त्यागना होगा। हमें एकाग्रचित होना चाहिए। जानना चाहिए कि क्यांे बच्चे एकाग्रचित नहीं हो पाते। उन्हें अपना उद्देश्य निर्धारित करना सिखाना होगा। उनकी रूचि का ध्यान रखते हुए उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सहायता करे। जीवन एक लंबी यात्रा है – सम्पूर्ण मानव और मानव बनने के बीच। अपने बच्चों को प्रतिदिन इस दूरी को तय करने में सहायता कीजिए।

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आत्मविश्वास बढ़ता है जब आप दूसरों को प्रोत्साहित करते है।

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एक बच्चे के समान ताली बजाकर स्वयं को ऊर्जावान कीजिए। अपने आसपास के लोगों पर ध्यान दीजिए। यदि वे मुस्कुरा रहे है तो वे सभी ऊर्जावान है और यदि वे दुखी है उनमें ऊर्जा निम्नतम स्तर पर है। जब आप दुखी होते है तो आप सर्वाधिक ऊर्जा खर्च कर रहे होते हैं यह ऐसा है जैसे कि आपने मोबाइल का गूगल मैप सर्च करना शुरू कर दिया हो जिसके कारण आपको कोई दूसरी महत्त्वपूर्ण सूचना प्राप्त नहीं हो रही है तथा मोबाइल की बैट्री तेजी से खर्च होने लग गई हो।
यदि आप उच्च ऊर्जा स्तर पर जीना चाहते हैं तो एक शिशु के समान मुस्कराइए और ताली बजाइए जो एक अच्छी ध्वनि उत्पन्न करती है। ध्वनि हमारे जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ध्वनि मस्तिष्क को संदेश भेजती है और मस्तिष्क की तंत्रिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं तथा स्पंदन उत्पन्न करती हैं। इस स्पंदन से ऊर्जा उत्पन्न होती है। यदि ध्वनि प्रभावशाली नहीं है तो यह नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा जिसके कारण हमारे कार्य समुचित रूप से नहीं होंगे और यदि ध्वनि सौम्य, शक्तिशाली और सकारात्मक होगी तो यह सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगी और हमारे कार्य समुचित रूप से होंगे। हमारे आस-पास जो भी अच्छा कार्य हो रहा हो उसे प्रोत्साहन देने के लिए ताली बजाना ना भूलें।
आइए! हम प्रतिदिन अपना मूल्यंाकन स्वयं करंे तभी हम महान् कार्य कर सकंेगे। स्वयं का आकलन स्वयं कीजिए और अपने जीवन में ईमानदारी को स्थान दीजिए। स्वप्न लीजिए और स्वप्न पूर्ण करने हेतु कठिन परिश्रम कीजिए। आइए हम समय व्यर्थ न करें। कार्य के समय कार्य करें और खेल के समय खेले। आलोचना बंद करे और परिस्थितियों को बिना दूसरों को दोष दिए स्वीकार करें। स्वयं, अपने माता-पिता और अपने गुरूजनों पर विश्वास करें और उन्हे लगातार धन्यवाद देने का भाव बनाएं।

 

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भय से मुक्ति कैसे पाएँ ?

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भौतिक शरीर अत्यन्त शक्तिशाली है किन्तु आपके अनुसार कौन अधिक शक्तिशाली है-हमारा मस्तिष्क या शरीर ?
जब आपके समक्ष कोई प्रश्न रखा जाता है तब आपको उसका ज्ञान होता है। इसलिए परीक्षा के समय आप अधिक सचेत हो जाते हैं और इस दौरान पूरे वर्ष की अपेक्षा अधिकाधिक सीखते हैं और परीक्षाकाल के अतिरिक्त अन्य समय में पढ़ी गई अध्ययन सामग्री की अपेक्षा अधिक याद कर पाते हैं।
इस दौरान हम 60.70 % सीखा गया ज्ञान प्रभावी रूप से कंठस्थ (memorise) रख पाते हैं क्योंकि हमारा मस्तिष्क अत्यधिक शक्तिशाली है और आप उस दौरान एकाग्रचित होते हैं।
मस्तिष्क अत्यन्त शक्तिशाली उपकरण है किन्तु हम अपने मस्तिष्क को बहुत ही आरामदायक स्थिति में रखते हैं । यदि हम अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित करे तो यह कई चमत्कार कर सकता है। यह सम्पूर्ण शरीर को निर्देशित करता है। आप अपने मस्तिष्क की सहायता से अद्भुत चमत्कार कर सकते हैं। अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने हेतु आपको सही दिशा में सोचना होगा। जैसे ही आप अपने मस्तिष्क में एक विचार प्राप्त करते हैं आप सोचना शुरू कर देते हैं जैसे ही आप सोचते है आपमें भावनाएँ उत्पन्न होती हैं और यह भावना स्पन्दन उत्पन्न करती है जो ऊर्जा उत्पन्न करता है। यदि मस्तिष्क सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करता है तो अंततः आप सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करेंगे और इसके फलस्वरूप आप सकारात्मक रूप से आवेशित होंगे और यह आपके कार्यो में भी प्रतिबिम्बित होगा। आपके विचार, क्रिया (action) उत्पन्न करते हैं और बार-बार होने वाली क्रियाएँ हमारी आदतों का निर्माण करती है। अपनी आदतों को देखिए जो आपके स्वभाव (attitude) का निर्माण करती हैं। इस स्वभाव के कारण भाग्य का निर्माण होता हैं। इस तरह हम ही अपने भाग्य के निर्माता हैं।
अपने विचारों को महत्त्व दीजिए और प्रतिदिन एक सकारात्मक विचार लिखिए। उस विचार का अनुभव कीजिए। प्रत्येक सुबह तथा रात को सोने से पूर्व उसे जोर से पढ़िए तभी आपको बुरे स्वप्न से मुक्ति प्राप्त होगी और एक आनन्ददायक सुबह के साथ दिन का आविर्भाव होगा। इससे एक अच्छी मनःस्थिति का निर्माण होगा।
हममें से प्रत्येक के पास एक मस्तिष्क है किन्तु सबकी विभिन्न मनोस्थितियाँ है। मस्तिष्क एक hardware है और मनःस्थिति एक software है जो अधिक महत्त्वपूर्ण है। साॅफ्टवेयर को श्रेष्ठ बनाने हेतु आपको एक समुचित विचार रखना होगा। शरीर के लिए भोजन आवश्यक है और सकारात्मक ऊर्जा ही मस्तिष्क का भोजन होती है।
प्रतिदिन अच्छे विचार न केवल लिखें अपितु दूसरों के साथ बाँटे भी । जितना आप बाँटेंगे यह आपके ऊपर उतना बेहतर प्रभाव डालेंगे। इस प्रकार यह आपके साॅफ्टवेयर अर्थात् मनोस्थिति पर स्थायी प्रभाव डालेगा।
यह विचार प्रबंधन (management) हमारे जीवन का श्रेष्ठ उपकरण है। जो हम देखते है वह हमारे मस्तिष्क में जाता है और कार्यो में कुछ समय बाद प्रतिबिम्बित होता है। अतः कुछ क्षण के लिए आइए कुछ अच्छा सोचे और गायत्री मंत्र का समुचित अर्थ समझते हुए उच्चारित करें। आपके प्रत्येक कर्मो के पीछे एक सही कारण या तर्क होना चाहिए। जब आप अपने तर्क का प्रयोग करते है तो आप एक अच्छा भाव एवं अच्छी ऊर्जा उत्पन्न कर पाते हैं।
ॐ भू र्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमही
धियो योनः प्रचोदयात्।

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एक आध्यात्मिक व्यक्ति कैसे बना जाएं ?

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प्रत्येक दिन और प्रत्येक पल एक उत्सव है। यदि आप वर्तमान का आनन्द ले रहे हैं तो यही जीवन जीने का उचित तरीका है। हम इस प्रवृत्त्ति को अपने जीवन में कैसे विकसित कर सकते हैं। एक आध्यात्मिक व्यक्ति कैसे बना जाए जो कि शांति का अनुभव कर सके और सुख की प्राप्ति कर सके। प्रत्येक मनुष्य को एक दिन जाना होगा। कोई भी अमर नहीं है। यह जीवन का सबसे बड़ा सत्य है कि एक दिन हमें यह संसार त्यागना होगा फिर भी हम पूरे समय अनेक कार्यो में लिप्त रहते हैं।
यहां कई लोग हैं जो अपने जीवन का मूल्य कम आंकते हैं और जीवन का आनन्द नहीं ले पाते हैं। कई लोग ऐसे हैं जिन्हें प्रार्थना करना और अच्छी बाते सुनना व्यर्थ कार्य लगता है।
यदि मैं यह कल्पना करूं कि आज यह मेरे जीवन का अन्तिम दिन है तो मैं अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ बेहतर करने का प्रयास करूंगा। यह दृष्टिकोण आपको आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करेगा।
आप प्रातः काल धन्यवाद दे सकते हैं क्यों कि आज आप जीवित एवं स्वस्थ है। आप कह सकते है ‘‘हे परमात्मा – कोटि-कोटि धन्यवाद क्योंकि आज मैं इस दिन का आनन्द ले सकता हूँ। मैं सम्पूर्ण जगत को देख सकता हूँ। आज मैं अपने भाग्य (destiny) को बदल सकता हूँ‘‘। आप ईश्वर को इसलिए भी धन्यवाद दे सकते है क्यों कि आपके प्रिय लोग आज आपके समक्ष जीवित हैं। ऐसा हो सकता है, एक दिन आपके परमप्रिय आपके साथ न रहे। उस दिन आपको समझौता करना होगा और उस हानि को स्वीकार करना होगा। अतः आज आपके पास ईश्वर के समक्ष कृतज्ञ होने का पर्याप्त कारण है क्योंकि आपके प्रिय लोग सुरक्षित हैं और स्वस्थ हैं।
आप कितनी बार सोचते हैं कि आपके समक्ष कुछ अच्छा होगा या आप कोई अच्छा समाचार या नई वस्तुएँ प्राप्त करेंगे तो आप प्रसन्न होंगे किन्तु यह पूर्णतः गलत है। आपकी प्रसन्नता किसी बाह्य परिस्थिति पर निर्भर नहीं करती। प्रसन्नता आपके भीतर निवास करती है। यह आपकी प्रवृत्ति पर निर्भर करती है कि आप जीवन को किस प्रकार स्वीकार करते हैं।
सही समय पर उचित कार्य कीजिए। ‘‘कार्य के समय कार्य कीजिए और खेल के समय खेलिए। सुनने के समय मात्र सुनिए। एक समय में एक ही कार्य कीजिए। वे लोग मूर्ख होते है जो सुनने के समय समय बोलते है जब कि उस समय उन्हें सुनना ही चाहिए। सुनने की क्रिया आपको तर्कशक्ति (reasoning) प्रदान करती है।
बुद्धिमान व्यक्ति ही दूसरों को सुनते हैं। जब कि मूर्ख व्यक्ति सोचते हंै कि उन्हे किसी परामर्श की आवश्यकता नहीं है। हम ध्यान क्रिया (meditation) द्वारा एक शांतिपूर्ण जीवन प्राप्त कर सकते है। चलिए आंखे बंद कर उचित लय में ‘‘ú‘‘ का उच्चारण (chant) करते हैं। आज यह महसूस करते हंै कि ऊर्जा हमारे पैर के अंगूठे से शीर्ष की ओर बह रही है, हमारे संपूर्ण शरीर को सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण कर रही है।
इस प्रकार जीवन अद्भुत हो जाता है और आप प्रसन्नता का अनुभव करते है। आप अपने चारों ओर प्रसन्नता का संचार कर सकते है।

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प्रत्येक दिन को उत्सवपूर्ण कैसे बनाएं ?

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धन्यवाद कहने का प्रयास करे, दृढ़तापूर्वक तीन बार धन्यवाद कहें, कारण के साथ धन्यवाद कहें, कार्य आरम्भ करने से पूर्व धन्यवाद कहें, कार्य के समापन पर धन्यवाद कहें। इस तरह आप धन्यवादी बने।
रविवार अर्थात सूर्य का दिवस। सूर्य अथाह ऊर्जा का स्रोत है। जब सूर्य चमकता है तो अंधकार विलुप्त हो जाता है, समस्त बादलों का लोप हो जाता है। सोमवार चन्द्रमा का दिन है। चन्द्रमा सौम्यता का परिचायक (symbol) है। चन्द्रोदय के साथ ही भीषण गर्मी शीतलता में रूपान्तरित (transform) हो जाती है। यदि आपको इस कला का भान है तो आप अपने प्रत्येक क्षण को, प्रत्येक दिवस को स्वयं उत्सवपूर्ण बना सकते हैं। बस आप प्रतिपल व प्रतिदिन धन्यवाद देते जाएँ।
ताली बजाकर स्वयं को ऊर्जावान बनाएँ। रविवार अर्थात सकारात्मकता (positivity) और सकारात्मकता तभी बढ़ती है जब आप प्रतिपल कृतज्ञ (thankful) हों।
धन्यवाद कहने का प्रयास करंे ? दृढ़तापूर्वक तीन बार धन्यवाद कहें, सकारण कार्यारम्भ से पूर्व तथा कार्य के समापन पर धन्यवाद कहें। निष्चित रूप से यह धन्यवाद देने का सही तरीका है क्योंकि इससे आपको बेहतर अनुभव होगा।
यदि आप इस कला को स्वीकार कर लेते है तो प्रतिदिन रविवार होगा। आप प्रत्येक दिन का आनन्द लेंगे और प्रतिपल प्रत्येक कार्य में आनन्द का अनुभव करेंगे। इसी प्रकार कृतज्ञता (gratitude) की प्रवृत्ति विकसित कीजिए।
यदि नौकरी करने वाले सभी व्यक्ति अपने नियोक्ता को धन्यवाद दे तो वह अधिक उल्लास एवं दक्षता के साथ सकारात्मक कार्य करेगा। सभी सम्बन्ध इसी प्रवृत्ति से मधुर और सुदृढ़ होगें। आपकी कृतज्ञता से ही आपको अच्छे और दृढ़ सम्बन्ध प्राप्त होंगे। यदि आप अपने जीवन में इन छोटी छोटी बातों को महत्त्व देंगे तो बड़े मूल्यों व खुशियों की प्राप्ति होगी।

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इगो फ्री कैसे रहें ?

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मनुष्य में आत्मसम्मान का भाव कभी-कभी स्वयं को आदर देने की अपेक्षा अंहकार (ego) को उत्पन्न कर देता है। सबसे बड़ा रोग ‘अभिमान‘ ही है। इस रोग की न कोई चिकित्सकीय जांच (medical test) संभव है न ही चिकित्सा विज्ञान (medical science) के पास कोई उपचार। अन्य सभी रोगों जैसे -टाइफाइड, बुखार, मलेरिया आदि की चिकित्सकीय जांच एवं औषधीय उपचार संभव है परन्तु जो अहंकार नामक रोग से ग्रसित है उन्हें अपनी इस समस्या का आभास ही नहीं है। यही समस्या है जो आपको ज्ञान के समीप नहीं आने देती । वास्तव में यदि समस्या स्पष्ट होती है तो समाधान भी संभव है परन्तु इस अहंकार की समस्या का निवारण बहुत ही मुश्किल है। तो फिर समाधान कैसे प्राप्त हो ? इस समस्या के चलते आप कई बार क्रोध, अवसाद (depression) या चिड़चिड़ेपन (irritation) से ग्रसित हो जाते है।
यदि आप वास्तव में इस समस्या की पहचान करना चाहते है तो यह देखो कि आपके निकटतम संबंधी जो आपको सबसे प्रिय हो, वह आपमें कोई गलती या कमी इंगित करे तो क्या आप क्रोधित और चिड़चिड़े हो जाएंगे इससे आपको पता चल सकता है कि आप अहंकार की समस्या से ग्रसित है।
आपका अहंकार आपको किसी की नहीं सुनने देगा। यदि आपको यह आभास हो जाए कि कौन बोल रहा है ? किस उद्देश्य (intention) से बोल रहा है और वह क्यों आपकी कमी को इंगित कर रहा है तो आप इसे सहज एवं धैर्यवान होकर सुनेंगे और अहंकार से मुक्त हो सकेंगे।
यदि आप एक अच्छे श्रोता नहीं है तो आप ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। यदि आप अपने नियोक्ता (employer) को ठीक से नहीं सुनते तो आप कोई अच्छी नौकरी नहीं कर पाएंगे। वास्तव में अपने स्वयं के विचारों को सम्मान देना ही अहंकार है और दूसरों के विचारों को भी सम्मान देना स्वाभिमान है।
अभिमान का तात्पर्य खुद को मान देना
स्वाभिमान का तात्पर्य दूसरों को मान देना।
जब आप दूसरों की सुनते हैं और दूसरों के विचारों को सम्मान देते हैं तो आपको सही मायने में ज्ञान की प्राप्ति होती है। दुर्भाग्यवश जो दूसरों की नहीं सुनते वे ट्रायल एंड एरर (trial & error) पद्धति से ही सीख पाते हैं।
उचित होगा कि हम अपने शिक्षकों से सीखेँ, शिक्षकों को धन्यवाद दे ताकि उनसे सदैव सीखा जा सके। अन्यथा शिक्षक आते रहेंगे और जाते रहेंगे परन्तु आप ज्ञान की प्राप्ति कभी नहीं कर पाएंगे। जब आप शिक्षकों के प्रति कृतज्ञ होते है तभी आप सुनने की योग्यता धारण करते हैं।
यदि आप सोचते हैं कि आप हमेशा सही हैं तो आप ‘अहम्‘ की समस्या से ग्रसित है और किसी से कुछ नहीं सीख सकते। उचित होगा कि आप अपनी अहंकार की प्रवृत्ति की समस्या को पहचाने तभी इस समस्या का समाधान प्राप्त होगा। अहंकार मुक्त जीवन जीने का प्रयास करें साथ ही अच्छे श्रोता बनने का प्रयास करें

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Why the colorful Holi is better than the bon fire Holi ?

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holi

I think the basic reason for our economic and social problems is our negative thinking. On the contrary, our neighbor Japan is just the opposite. There, every person gives more importance to the moral values. Every person looks at the life with a nationalist view and is full of gratitude.
Normally either people talk about the magnificence of ancient India or they are seen giving suggestions about the problems of modern India in Present times. For a long time I have been thinking that this is such a paradox. On the one hand we talk about being the (Vishwa guru) the masters of the world, on the other hand we find that this country is divided into 565 Dynasties. Even today we find individualistic thinking. Every person seem to be thinking only about himself. Actually if we look at the basis of social, economic and political problems we find that the biggest problem is negative thinking. Keeping this view in mind if we look at the pillars of democracy like legislature, executive, judiciary or Journalism we find that every leader is busy criticizing the other person and focuses at the weaknesses. Whether you visit the secretariat or collectorate we find that every person is busy finding excuses for not doing anything. When we look at bureaucracy we find that administrative officers who get big positions with fat salaries are given this position so that they can take decisions in favour of our country but unfortunately either these people do not allow the work to be done or they find reason to not to do the work. For their petty personal benefits they don’t mind the bigger loss of the country. We all know that passivity or pessimistic thinking never helps any country, nor does it allow the country to grow. You must have hardly heard one leader or a bureaucrat praising anyone else.
I think the basic reason for our economic and social problems is our negative thinking. On the contrary, our neighbor Japan is just the opposite. There, every person gives more importance to the moral values. Every person looks at the life with a nationalist view and is full of gratitude. No matter how many number of materialistic things we may collect, the element of our success will be prominent only if we start thinking positively. Negative thinking starts from childhood. When the child is very young, first the parents start scaring him, then the teachers scare him in the school or college where he studies. Finally the place where he works, his employers do the same thing.
Actually there are two ways of working. One is the way of fear and the other is love. Just because the path of love is little more difficult, the person has to develop himself. On the other hand path of fear is easy so people find it convenient to choose the option of scaring others. Fear gives birth to anger, worries and greed.
So, now let us look at two day festival of Holi from the emotional point of view. Day one of holi is the day where we burn are negativity into the bonfire of Holika. Holika wanted to burn Prahlad because of her anger and jealousy but actually Prahlad never got burnt. So, only that thing gets burnt which is supposed to burn not everything. We all like the colorful holi played with colours because these are colours of love and purity. Let us celebrate holi with a positive thinking. On the occasion of Holi my best wishes to all.
Regards,
Dr. Sanjay Biyani

 

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Welcome Spring Season

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Today is Basant Panchmi. We celebrate this day by worshiping goddess Sarasawati who is considered as goddess of knowledge.
Saraswati is called the Mother of the Vedas and the repository of Brahma’s creative intelligence. Saraswati is also called Vak Devi, the goddess of speech.

Sarasawati is an emotion. If Sarasawati/education is given importance in our life then our voice will be sweet and we become knowledgeable. If we give importance to anything then that thing comes to our life. So worship goddess Sarasawati with good feelings and emotions so that we will get good words, good voice and good knowledge.
Prayer means to increase our desire. By giving importance to desire we get fulfillment. Let us welcome spring season from today. In this season you will find yellow flowers start blooming all around. Marigold & golden mustered flowers make the surroundings golden & happy. You can see these flowers blooming on both sides of the highway which goes to Jodhpur or to Delhi.
This season is really appreciable/blossoming season. Make this day full of happiness. Try to love yourself and understand your real self. Everything is in our inner self. People are searching happiness outside but actually it is inside us.

When we pray, we search inside, as a result of this search we find God. Self realization leads to God realization. If we can realize ourselves we can move towards perfection. If we cannot understand our own value then we loose our self image in our own eyes.
Let us appreciate our own self and our own creativity. If you can realize your own potential then you can became great like Chankya, Chandragupta or Ashoka.
To awake, to arise is life. Mostly people are mentally sleeping. Let us awaken and evaluate ourselves. If you have the power to face challenges you can become an emperor.
Close your eyes & bring the feeling of divinity inside, power of forgiveness and start the day with prayer. Let us repeat the Ganesh mantra which will bring knowledge to us.
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Thoughts delivered in Morning Assembly on 1 feb 2017
By Prof. Sanjay Biyani
Director(Acad.)

 

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How to oxygenate and detoxify your brain

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Bring silence, keep your mind quiet. There is lot of noise inside. You have studied cell, atom. If atom is also subdivided nothing seems to be visible.
Fold your hands and close your eyes and bring silence. Everywhere there is silence so that you can recall everything you learnt from your memory. You may feel you are going to forget everything you have learnt.
But your brain is not so poor. If someone forgets, it is because they feel that they are going to forget all they have learnt. But mind does not function like this. One can recall everything one has learnt. Whatever is learnt or read comes back easily in mind. Something that we can remember throughout our life. So we all are gifted with good memory.
All religions agree that silence or zero state are most powerful stage. Everywhere God is nothing but zero, nothing but energy.
Let us scientifically understand why we say “OM”? Why while chanting we do deep breathing which supplies oxygen to our brain or to neurons of brain. Method of breathing is very important. If we take ten seconds while inhaling, we should take thirty seconds while exhaling. Because of this supply of oxygen increases which purifies our blood. And we release triple amount of carbon dioxide.
This also increases your memory power, concentration will be more. Body gets Oxygenated and detoxified. Better understand this scientific method and try to do everything logically.
Now take a deep breath and we will chant “OM” with right attitude. Why in a temple, Gurudwara, Church do we get better vibration ? This is because we get benefited by good vibration which creates energy and energy is never destroyed.
Why can’t we listen to good things ? It is because of our bad Karmas. Do good actions and you will be able to listen well.
Thoughts delivered in Morning Assembly on 28th .Jan.2017
By Prof. Sanjay Biyani
Director(Acad.)

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