प्रेम एक चमत्कारिक एवं सार्वभौमिक शब्द है।

Share this on :


अपनी प्रत्येक सुबह को आनन्दमय बनाइए। प्रतिदिन इसका स्वागत जोषपूर्ण होना चाहिए। हमें जीवन के प्रत्येक पल का आनन्द लेना चाहिए। जीवन का महत्वपूर्ण तत्त्व आपसी ’संबंध’ है। जो कि व्यक्ति में उत्साह एवं ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाते है, ऐसा तभी होता है जब पारस्परिक संबंध प्रेमपूर्ण एवं निःस्वार्थ हों। षिक्षक-विद्यार्थी संबंध एक सम्मानीय और प्रेमपूर्ण संबंध है। अध्यापन कार्य विद्यार्थी केन्द्रित होना अत्यन्त आवश्यक है, जो शिक्षक का विद्यार्थी के प्रति अगाध प्रेम दर्षाता है।
प्रेम सार्वभौमिक शब्द है। प्रेम चमत्कारी है। प्रकृत्ति हमें बिना किसी शर्त के प्रेम करती है। वर्षा हमें बिना किसी शर्त के प्रेम करना सिखाती है। यह प्रत्येक जीव को समान रूप से जल प्रदान करती है, प्रत्येक खेत में समान रूप से जल-वर्षा करती है। पृथ्वी हमें समान रूप से अन्न प्रदान करती है । पवन सभी स्थानों पर समान रूप से बहती है। ये सभी किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करतेे। सम्पूर्ण ब्रम्ह्ाण्ड प्रत्येक जीव को सार्वभौमिक रूप से बिना किसी जाति, वर्ग और धर्म संबंधी भेदभाव के प्रेम करता है।
दूसरों के प्रति दयाभाव रखिए। एक अच्छा सामाजिक संगठन बनाने का प्रयास कीजिए। जितना अधिक आप दूसरों को महत्व देंगे उतने ही अधिक मूल्यवान संबंध आप प्राप्त करेंगे। आप दूसरों को नहीं बदल सकते, आप स्वयं को ही बदल सकते हैं। लोगों की खुलकर प्रषंसा कीजिए। कृतज्ञ बनिए। प्रतिदिन नई बातें सीखिए। स्वयं में तथा ईष्वर में विष्वास रखिए।
संसार का एक सार्वभौमिक नियम है। जितना अधिक आप देते हैं, उतना अधिक आप प्राप्त करते हैं। किन्तु देने के पीछे मात्र षर्तहीन प्रेम का उद्देष्य होना चाहिए। इसके लिए आपको किसी भी प्रकार के लाभ की प्राप्ति के बारे में सोचे बिना निरन्तर देते रहने का भाव रखना होगा। मात्र इसी आधार पर आप मूल्यवान संबंध विकसित कर सकते है, जो लंबे समय तक चल पाएंगे और आपको कभी पछताना नही पड़ेगा।
To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

Share this on :

स्व-अनुभूति ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है।

Share this on :



ज्ञान का सर्वोच्च स्तर क्या है? प्रत्येक व्यक्ति को संसार का थोड़ा बहुत ज्ञान तो है परन्तु कोई भी जीवन की समस्याओं से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाता क्योंकि सर्वश्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति अभी शेष है। ऐसा ज्ञान जो व्यक्ति को श्रेष्ठ व्यवसाय, रोजगार, और संतुष्टि प्रदान करता है, जो मानसिक चिड़चिड़ेपन (irritation) और ईर्ष्या (jealousy) को समाप्त करता है और जिससे भय, कमजोरी, लालच और लगाव समाप्त हो जाते हैं, यही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। यह ज्ञान सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य है, पूर्णतः सरल है और अत्यधिक प्रासंगिक है।
स्वयं की एक शरीर के रूप में नहीं, बल्कि एक आत्मा के रूप में पहचान करना ही सर्वाेच्च ज्ञान है। हम शरीर नहीं, बल्कि शरीर और आत्मा का संयोजन हैं। शरीर मस्तिष्क की पाँच संवेदनाओं द्वारा संचालित किया जाता है, जो बुद्धि द्वारा नियंत्रित की जाती हैं और हमारी बुद्धि हमारी आत्मा (चेतना) द्वारा नियंत्रित की जाती है।
मैं एक शक्तिषाली आत्मा हूँ। मैं एक ऊर्जा हूँ। यही ज्ञान का सर्वोच्च स्तर है। सर्वोच्च आत्मा ईष्वर है और मैं उसका एक भाग हूँ। यह ज्ञान यदि समझा जाए तो सभी समस्याओं का सरलता से समाधान हो पाएगा। ऊर्जा न तो कभी उत्पन्न की जा सकती है न कभी नष्ट की जा सकती है। ब्रह्माण्ड में सभी कुछ ऊर्जा ही है। हम सभी सर्वश्रेष्ठ ऊर्जा के अंश है। जिसे ‘ईष्वर‘ नाम दिया गया है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड इसी सर्वश्रेष्ठ ऊर्जा द्वारा संचालित किया जाता है।
जिस क्षण आप समझ पाते हैं कि ‘‘आप एक शक्तिषाली आत्मा हैं’’, आप कभी भयग्रस्त नहीं होंगें, लालच का अनुभव नहीं करेंगें तथा ईर्ष्या कभी नहीं करेंगें। आप संसार की प्रत्येक वस्तु को एक शक्तिषाली आत्मा के रूप में देखते हुए कोई भेदभाव और ईर्ष्या का भाव नहीं रखेंगे। अपना धैर्य सरलता से नहीं खोएंगे। यदि आप यह ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तो आप अपने मस्तिष्क, संवेदनाओं और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख पाएंगे, आप प्रतिक्रिया देने की अपेक्षा बुद्धिमानी के साथ कार्य कर पाएंगें। सभी ईष्वर की संतान है। आप अनुभव करेंगें कि सभी आपसे कहीं न कहीं और किसी न किसी रूप में संबधित हैं और हम सभी एक बड़े परिवार का अंग है।
‘‘मैं ईष्वर का एक अनिवार्य अंग हूँ’’ यह विचार कर आप असीम प्रसन्नता और एक सर्वोच्च शक्तिषाली स्त्रोत से जुड़ेगें। यही सर्वोच्च ज्ञान है जो स्वानुभूति लाता है, और ईष्वरानुभूति की ओर ले जाता है।

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com
 

Share this on :

अपना लक्ष्य निर्धारित कीजिए और अपने स्वप्न का अनुभव कीजिए।

Share this on :



सोमवार, सप्ताह का पहला दिन जिसे निर्मल एवं उत्साहपूर्ण ऊर्जा के साथ प्रारंभ किया जाता है। यह ऊर्जा आपके चेहरे और व्यवहार में परिलक्षित होनी चाहिए। आपका चेहरा आपके मस्तिष्क में चल रहे भावों का सूचक है। कई बार आप नीरस जीवन जीते हैं तो आपके चेहरे पर उत्साहहीनता की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। अतः आपको अपनी प्रवृत्ति में सुधार करना होगा। जब आप मुस्कुराते हैं तो आपके चेहरे पर अलग ही सौंदर्य दिखाई देता है। जब आप ‘सेल्फी’ लेते हैं तो आप मुस्कुराते हैं, किन्तु यह मुस्कुराहट मात्र कुछ क्षणों के लिए होती है।
मेरी यही कामना है कि आप हर पल इसी प्रकार मुस्कुराते रहें क्यों कि यदि आपको ही आपका उत्साहहीन चेहरा पसन्द नही है तो दूसरे लोग इसकी प्रषंसा कैसे करेंगे। आपको यह बात सदैव याद रखनी होगी और यह आपकी आदत बन जाएगी जो भविष्य में सदैव आपके व्यवहार में परिलक्षित होगी। अपनी अध्ययन की मेज पर अपना लक्ष्य लिखें और उसे पढ़कर निरंतर उसकी ‘पुनरावृत्ति ( Repetition) कीजिए जो आपके लिए अत्यंत आवष्यक है। यदि आप किसी बड़े संस्थान में कभी जाते है तो पायेंगे कि वहाँ एक ओर ‘मिशन’ (Mission) लिखा होता है और दूसरी ओर ‘विजन’(Vission) लिखा होता है। उदाहरण के लिए नासा जैसे संस्थान का अपना मिशन और विजन है।
प्रत्येक व्यक्ति का जीवन मूल्यवान है और सबको अपना स्पष्ट मिशन और एक विजन अवष्य रखना चाहिए। अतः अपना लक्ष्य निर्धारित कीजिए। इससे आप अपने व्यवसाय, रोजगार तथा सम्पूर्ण ंजीवन का आनंद ले पाएंगे और समाज की श्रेष्ठ रूप से सेवा भी कर पाएंगे। यदि आप अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर प्रत्येक कार्य को नियोजित रूप से करते हैं तो निश्चित रूप से अपने स्वप्न को साकार कर पाएंगे। अतः आवष्यक है कि अपना लक्ष्य निर्धारित करने का प्रयास करें।
लक्ष्य की प्राप्ति हेतु स्वस्थ शरीर मनुष्य की पहली प्राथमिकता है। अतः आपको अपने शरीर को स्वस्थ रखने हेतुु उचित प्रयास करना चाहिए। इसके लिए प्रतिदिन सुबह 15 मिनट का व्यायाम (Exercise) अवष्य कीजिए जो आपको स्वस्थ रखेगा और आप संपूर्ण ऊर्जा के साथ कार्य कर पाएंगे एवं अपने प्रत्येक लक्ष्य की प्राप्ति कर पाएंगे।

 

Share this on :

मोबाइल के समान हमें स्वयं को भी प्रतिदिन चार्ज (Charge) करना चाहिए।

Share this on :



हमें सदैव ऊर्जावान रहना चाहिए। हम सभी शक्तिशाली हैं। हम उन लोगों को ऊर्जावान बना सकते हैं, जिनमे ऊर्जा बहुत कम होती है यदि हम सकारात्मक ऊर्जा से युक्त होते हैं तो इसका तात्पर्य है कि हमारे भीतर अत्यधिक ऊर्जा है। मोबाइल के समान हमें स्वयं को प्रतिदिन चार्ज करना चाहिए।
यदि हम सूर्योदय के समय सूर्य की किरणों के समक्ष होते हैं तो हमें सूर्य से संसार की सर्वश्रेष्ठ ऊर्जा प्राप्त होती है और सूर्यग्रहण के समय चारों ओर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक किरणें व्याप्त रहती हैं। सूर्य अथाह ऊर्जा का स्त्रोत है। शक्तिषाली होने के लिए हमें ऊर्जावान होना पड़ेगा। यदि हमें ऊर्जा प्राप्त करने की प्रक्रिया ज्ञात नहीं है, तो प्रातःकाल जल्दी उठकर संसार के सौंदर्य को महसूस करने का प्रयास करना होगा। ऊर्जा हमें सकारात्मक जीवन जीने हेतु प्रोत्साहित करती है। मेडिटेशन द्वारा स्वयं को पूर्णतः एकाग्रचित्त और समर्पित कर हम स्वयं में सकारात्मक ऊर्जा विकसित कर सकते हैं।
ऊर्जा प्राप्त करने हेतु हमें कछुए की तकनीक अपनानी होगी जो आवष्यकतानुसार अपने अंगों को समेट और फैला सकता है। इसी प्रकार मेडिटेशन के द्वारा हम स्वयं के भीतर झाँकते है। यह एक आंतरिक यात्रा है। इसके द्वारा हम अपने मस्तिष्क को एकाग्रचित्त कर पाते हैं। अपने मस्तिष्क को शक्तिषाली बनने दीजिए ताकि आप स्वस्थ रह सकें। यदि आप में नकारात्मक ऊर्जा है तो आप शीघ्र रोगग्रस्त हो जाएंगे।
यदि आप एक षिक्षक हैं तो आपके चारों ओर कई विद्यार्थी होंगें जो आपसे निरंतर पढ़ने और कार्य करने की ऊर्जा प्राप्त करने आते हैं। अतः सर्वप्रथम षिक्षकों को स्वयं ऊर्जावान होना चाहिए ताकि वे विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर सकें। उदाहरणस्वरूप नर्सिंग व्यवसाय में आप बीमार व्यक्तियों से घिरे होते हैं जिनमें ऊर्जा कम होती है। उनकी सेवा के लिए आप में अधिक सकारात्मक ऊर्जा होनी चाहिए। मरीजां को स्वस्थ होने और सकारात्मक रहने की ऊर्जा देकर ही उन्हें स्वस्थ किया जा सकता हैं। अतः हम सभी को मेडिटेशन करना चाहिए ताकि हम श्रेष्ठ ऊर्जा प्राप्त कर सकें और समाज को सर्वोत्तम ऊर्जा दे सकंे।
प्रतिदिन प्रार्थना करने हेतु समय निकालिए। बाहरी संसार की अपेक्षा स्वयं के भीतर ध्यान केंद्रित कीजिए। संसार के प्रत्येक जीव के लिए सदैव कृतज्ञ रहिए। ऐसे मनुष्य बनिए जो सदैव दूसरों की सेवा करने हेतु तैयार रहे, तथा सभी को प्रोत्साहित करे। आइए! इस संसार को सकारात्मक ऊर्जा से युक्त पवित्र स्थान बनाएँ।

अन्य प्रष्न जिसका उत्तर दिया जाना चाहिए, अपनी इच्छा शक्ति को कैसे बढ़ाया जाए, ताकि अत्यधिक ऊर्जा प्राप्त कर सकें, जो जीवन जीने हेतु पर्याप्त और समुचित हो।
उक्त प्रष्न का उत्तर देने हेतु हम तीन प्रमुख शब्दों पर ध्यान केन्द्रित करेंगें-
प्रथम मुख्य शब्द है- समर्पण। यदि आप समर्पित रहते हैं तो आप सभी कुछ प्राप्त कर सकते है। आपको अपने संकल्प के प्रति पूर्णतः समर्पण करना होगा।
द्वितीय मुख्य शब्द है- कठिन परिश्रम। हमें कठिन परिश्रम करना होगा, क्योंकि जीवन में इसका कोई अन्य विकल्प नहीं है।
अंतिम मुख्य शब्द है- ध्यान केन्द्रित करना। अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करना। हम इसी के द्वारा अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। यदि हम इन शब्दों का अर्थ समझते है और इन्हें अपनी अभिवृत्ति में अपना लेते हैं तो हम एक सफल मनुष्य बन जाएंगें। हम लोगों को प्रसन्न रख पाएंगें और एक अत्यंत उत्तरदायी मनुष्य बन जाएंगें। आइए, हम सब संगठित हो जाएँ ताकि हम सभी अच्छे मनुष्य बन पाएं और यह संसार एक सुरम्य स्थान बन पाए।

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

Share this on :

जीवन में चुनौतियों का सामना कौन कर सकता है

Share this on :



यदि हमारा जीवन पूर्णतः सुविधाजनक है तो भला हम क्यों चुनौतियों को स्वीकारेंगे ? कौन चुनौती स्वीकार कर सकता है ? चुनौतियों को स्वीकार कर उनका सामना करना परम आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति चुनौती का सामना नहीं कर पाता। केवल वही व्यक्ति जिसके जीवन में कोई उद्देश्य है वही चुनौती स्वीकार कर पाएंगे। यदि आपके जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है तो आपको कोई चुनौती स्वीकार करने की आवश्यकता महसूस ही नहीं होगी। जीवन को व्यावहारिक रूप से लीजिए। जीवन में कोई लक्ष्य आने दीजिए। तभी आप तुच्छ वस्तुओं में व्यस्त न होकर बड़े विचारों की ओर अग्रसर होंगे। आप स्वयं में आशावादी (optimistic) दृष्टिकोण एवं सकारात्मक प्रवृत्ति का विकास कर पाएंगे।
यदि आप जीवन का आनन्द मात्र लेना चाहते है तो चुनौतियां लेने की कोई आवश्यकता नहीं होगी। परन्तु पशु-पक्षी भी जीवन का आनन्द मात्र ही लेते है तो मनुष्यों और जन्तुओं के बीच क्या अन्तर है ?
आपके पास एक शक्तिशाली मस्तिष्क है जो संसार की सर्वशक्तिमान मशीन है। गुरूजन जो आपको प्रशिक्षण दे रहे हैं, आपको महान कार्य करने हेतु सक्षम बना रहे हैं। वे एक महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं और वह है आपके जीवन उद्देश्य निर्धारण करने में आपकी मदद। व्यक्ति का उद्देश्य निर्धारित होने पर ही उसका महत्त्व बढ़ता है। सभी महान विभूतियाँ अपने बाल्यकाल में साधारण बालक ही थे किन्तु उनके निश्चित उद्देश्य के चलते वे महान व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हुए। अतः आपको भी स्वयं अपने जीवन का उद्देश्य निर्धारित करना चाहिए। स्वयं अपना लक्ष्य सृजित कीजिए। एक ज्वलंत इच्छा रखिए और निरन्तर स्वप्न देखते हुए इस दिशा में प्रयास कीजिए। अपने स्वप्न से प्रेम कीजिए और इसे परिपूर्ण करने हेतु सक्रिय रहिए। स्वतंत्र चिन्तन कीजिए। यदि आप IAS, RAS, CA, CS या व्यवसायी बनना चाहते हैं तो आज से ही शुरूआत कीजिए।

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

Share this on :

ईश्वर और प्रकृति पूर्ण (perfect) हैं

Share this on :



मस्तिष्क अत्यंत शक्तिशाली है। आइए हम जानें कि हमारा मस्तिष्क किस प्रकार कार्य करता है- सर्वप्रथम जब हम सुनते है तो मस्तिष्क में बिम्ब बनता है। यदि मस्तिष्क एकाग्रचित होता है तो यह इच्छा शक्ति का विकास कर लेता है। यदि मस्तिष्क इच्छुक नहीं हो तो आपको कोई संदेश याद नहीं रह पाएगा। आपकों यह ज्ञात होना चाहिए कि समुचित रूप से कुछ भी कैसे याद रखा जाए और परीक्षा के समय सही उत्तर कैसे दिया जाए? हमारी क्या कमजोरियाँ है ? हमें परीक्षा में कम अंक क्यों प्राप्त होते हैं ? हम सैद्धान्तिक सामग्री क्यों नहीं याद रख पाते ? एकाग्रता की कमी के कारण हम जीवन में इच्छित उपलब्धि नहीं ले पाते।
चलिए हम मस्तिष्क को प्रशिक्षित करते है। एक प्रभावशाली मंत्र का बार-बार उच्चारण करते हैं। उच्चारण करते समय मस्तिष्क में कोई और विचार न लाएँ। इसे तीन बार उच्चारित कीजिए। पुनरावृत्ति आवश्यक है।
परन्तु पुनरावृत्ति के समय यदि आप यही सोचते रहते हैं कि मैं याद नहीं रख सकता, मैं परीक्षा के समय उत्तर भूल जाऊंगा तो ऐसा वास्तव में होगा। इन नकारात्मक विचारां के कारण हमारी संकल्प शक्ति क्षीण हो जाती है जब कि हमारे बीच अधिकांश लोग प्रतिभावान है । हम पूर्णतः सामान्य हैं। अब हम अपनी बौद्धिक शक्ति का परीक्षण करते हैं। हमस्वयं पर ध्यान केंद्रित करें और सर्वप्रथम निम्न मंत्र का अर्थ समझेंगे फिर इसकी पुनरावृत्ति इस आत्मविश्वास के साथ करेंगे कि हम इसे सही-सही रूप से बोल सकते हैं।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इसका मतलब यह है कि प्रकृति पूर्ण (perfect) है जिसे हम बाहरी दुनिया कहते हैं साथ ही साथ हमारे अन्दर की चेतना भी पूर्ण (perfect) है। जिसे हम आत्मा, परमात्मा, ईश्वर और आन्तरिक शक्ति के रूप में जानते है। इस दिव्य शक्ति से ही सब सृजन हो रहा है।  

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

Share this on :

क्या बच्चे वो करते हैं जो उन्हें कहा जाता है या जो उनकी अपनी पुस्तकों में लिखा होता हैं ?

Share this on :



एक बालक की अच्छी परवरिश अत्यंत उपयोगी है। बच्चे अपने माता-पिता या गुरूजनों या बड़ों का ही अनुकरण करते हैं। माता-पिता या बड़ों को अपने बच्चों के जीवन में आदर्श ;तवसम उवकमसद्ध बनना चाहिए।
आजकल माता-पिता अपने बच्चों के साथ समय व्यतीत नहीं कर पाते क्योंकि वे अत्यन्त व्यस्त है। उन्होंने उनके लिए अच्छे विद्यालय, महाविद्यालय, कई आधुनिक सुविधाओं जैसे मोबाइल, ट्यूशन, कोचिंग, गाड़ी आदि की सुविधाएं तो प्रदान की है। फिर भी बच्चे अपने माता-पिता से दूर होते जा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है ? सम्बन्धों में संवादहीनता क्यों हो रही है ?
हम सभी अत्यधिक शक्तिशाली हैं। हमारे शरीर में लगभग 300 से 500 खरब कोशिकाएँ होती हैं और प्रत्येक कोशिका में लगभग 8 GB मैमोरी क्षमता होती है। किन्तु हम इस शक्ति का प्रयोग क्यों नहीं कर पाते है। केवल कॉलेज ही विद्यार्थियों को शक्तिशाली नहीं बना सकता। वास्तविक शिक्षा माता-पिता द्वारा ही दी जानी चाहिए जो बच्चे को एक वास्तविक मनुष्य बनने में सहायक होगी। माता-पिता बालक के सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षक होते है। परवरिश शक्तिशाली होनी चाहिए तभी बच्चों की वास्तविक अभिवृद्धि हो सकेगी। बालक के जीवन की पहली शिक्षक माता ही होती है। माता सदैव प्रेममयी एवं आपका ध्यान रखने वाली होती है। वह अपने बच्चे पर पूरी निष्ठा से ध्यान देती है और उसके जन्म के पहले क्षण से उसका सजग होकर पालन पोषण करती है। पहले दिन से ही एक माता अपने बालक को स्वप्रेरणा से इशारों और अशाब्दिक क्रियाओं (non verbal action) के द्वारा प्रेम की भाषा सिखाती है। बालक बचपन में माता-पिता के साथ लुकाछिपी खेल खेलते हुए आनन्दित होता है। परन्तु जैसे ही वह युवावस्था में पहुंचता है माता-पिता के साथ असहज होता चला जाता है। जब माता-पिता उनके कक्ष में पहुंचते हैं तो बच्चे वहाँ से चले जाते हैं। बच्चे अपने साथियों के साथ वाट्सएप, कम्प्यूटर, फेसबुक की अपनी ही दुनिया में व्यस्त हो जाते है। हम आपसी वार्तालाप हेतु बहुत कम समय निकाल पा रहे हैं। अब सम्बन्धों और आपसी व्यवहार में बहुत कम भावनाएँ और बहुत तर्क रह गया है।
परन्तु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्या है – आपके बच्चे का भविष्य या आपकी नौकरी या व्यवसाय ? सबसे महत्त्वपूर्ण है बच्चों के भविष्य का निर्माण करना। यदि चरित्र विलुप्त हो जाता है तो सब कुछ खो जाता है। यदि आप समग्र विश्व को जीतकर अपना चरित्र खो देंगे तो आपको क्या लाभ होगा ? आइए हम अपने बच्चों को मूल्य सिखाएँ। हमारे घर-परिवार के सम्बन्ध और नींव को सशक्त बनाएँ। अपने बच्चे को मानसिक रूप से मजबूत बनाएँ। उन्हें कृतज्ञ रहना सिखाएँ। उन्हें माता-पिता के पैर छूना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना सिखाएँ। श्रेष्ठ सकारात्मक कार्य बालक में कृतज्ञता का भाव उत्पन्न करना ही होगा। इसी प्रवृत्ति से जीवन में स्वास्थ्य, सम्पत्ति, सम्बन्ध, आजीविका और सफलता की प्राप्ति होगी। इसके लिए मैं आपको तीन सुझाव देता हूँ –
कहिए – ‘‘धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद ‘‘। न केवल बोलिए बल्कि इसे अनुभव भी कीजिए और तीन बार कारण सहित, कार्य करने से पूर्व और कार्य समापन पर धन्यवाद कहिए। अपने माता-पिता, नियोक्ता, पेड़ों, प्रकृति और अपने भोजन के प्रति कृतज्ञ रहना सीखिए।
मनुष्य स्वयं के लिए और समाज के लिए जीता है । हमें अधिकाधिक उपयोगी बनना चाहिए। हम सभी ऊर्जापुंज ही तो हैं। अभिभावक जब तक स्वयं अपने आचरण में इन सब चीजों को नही लाएंगे तब तक ऐसा सिखाना महज औपचारिकता ही होगी। बच्चे बड़ों को देखकर ही अधिक सीखते हैं। वे पुस्तकों व निर्देशित बातों से नहीं सीख पाते बल्कि व्यावहारिकता से अधिक सीखते हैं।
हम भौतिक शरीर नहीं है। क्या हम सकारात्मक हैं? सकारात्मकता अच्छी ऊर्जा प्रदान करती है। नकारात्मकता कुण्ठा को जन्म देती है। इसलिए हम क्रोधित होते हैं, दूसरो को आहत करते हैं और उग्र हो जाते है। अपनी ऊर्जा को कैसे रूपान्तरित करें। नकारात्मक ऊर्जा से कैसे मुक्त हो ? इस हेतु हमें एक सामान्य शब्द ‘‘मुझे माफ कर दीजिए‘‘ (i am sorry) का प्रयोग करना होगा।
हम सभी गलतियाँ करते हैं परन्तु हम में से कितने लोग गलती स्वीकार कर कहते है कि ‘‘मुझे क्षमा कीजिए‘‘ हम अहंकारयुक्त जीवन जीते हैं। प्रत्येक दिन के प्रारंभ पर सुबह अपने बच्चों को माता-पिता के चरण स्पर्श करना सिखाएं तभी वे अपने अहंकार से मुक्त हो सकेंगे। वे अपनी गलती पर कह पाएंगे कि ‘‘मुझे क्षमा कीजिए‘‘। उन्हें नजरें मिलाकर कारण सहित और अच्छी भावना के साथ गलती स्वीकारना सिखाए।
हममें से अधिकांश लोग एक सामान्य गलती करते हैं कि हम अपनी माँ से झूठ बोलते है या अपने माता-पिता से सत्य छिपातंे है। यह हमारे द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है। आइए आज से हम यह संकल्प ले कि यह अपराध पुनः नहीं दोहराएंगे।
हम सही रूप से कार्य करें और ‘‘कर्म के नियम‘‘ को समझे। प्रत्येक कार्य के लिए समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है। जीवन मे कुछ प्राप्त करने के लिए आपको कुछ करना होगा, कुछ त्यागना होगा। हमें एकाग्रचित होना चाहिए। जानना चाहिए कि क्यांे बच्चे एकाग्रचित नहीं हो पाते। उन्हें अपना उद्देश्य निर्धारित करना सिखाना होगा। उनकी रूचि का ध्यान रखते हुए उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सहायता करे। जीवन एक लंबी यात्रा है – सम्पूर्ण मानव और मानव बनने के बीच। अपने बच्चों को प्रतिदिन इस दूरी को तय करने में सहायता कीजिए।

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

Share this on :

आत्मविश्वास बढ़ता है जब आप दूसरों को प्रोत्साहित करते है।

Share this on :



एक बच्चे के समान ताली बजाकर स्वयं को ऊर्जावान कीजिए। अपने आसपास के लोगों पर ध्यान दीजिए। यदि वे मुस्कुरा रहे है तो वे सभी ऊर्जावान है और यदि वे दुखी है उनमें ऊर्जा निम्नतम स्तर पर है। जब आप दुखी होते है तो आप सर्वाधिक ऊर्जा खर्च कर रहे होते हैं यह ऐसा है जैसे कि आपने मोबाइल का गूगल मैप सर्च करना शुरू कर दिया हो जिसके कारण आपको कोई दूसरी महत्त्वपूर्ण सूचना प्राप्त नहीं हो रही है तथा मोबाइल की बैट्री तेजी से खर्च होने लग गई हो।
यदि आप उच्च ऊर्जा स्तर पर जीना चाहते हैं तो एक शिशु के समान मुस्कराइए और ताली बजाइए जो एक अच्छी ध्वनि उत्पन्न करती है। ध्वनि हमारे जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ध्वनि मस्तिष्क को संदेश भेजती है और मस्तिष्क की तंत्रिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं तथा स्पंदन उत्पन्न करती हैं। इस स्पंदन से ऊर्जा उत्पन्न होती है। यदि ध्वनि प्रभावशाली नहीं है तो यह नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा जिसके कारण हमारे कार्य समुचित रूप से नहीं होंगे और यदि ध्वनि सौम्य, शक्तिशाली और सकारात्मक होगी तो यह सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगी और हमारे कार्य समुचित रूप से होंगे। हमारे आस-पास जो भी अच्छा कार्य हो रहा हो उसे प्रोत्साहन देने के लिए ताली बजाना ना भूलें।
आइए! हम प्रतिदिन अपना मूल्यंाकन स्वयं करंे तभी हम महान् कार्य कर सकंेगे। स्वयं का आकलन स्वयं कीजिए और अपने जीवन में ईमानदारी को स्थान दीजिए। स्वप्न लीजिए और स्वप्न पूर्ण करने हेतु कठिन परिश्रम कीजिए। आइए हम समय व्यर्थ न करें। कार्य के समय कार्य करें और खेल के समय खेले। आलोचना बंद करे और परिस्थितियों को बिना दूसरों को दोष दिए स्वीकार करें। स्वयं, अपने माता-पिता और अपने गुरूजनों पर विश्वास करें और उन्हे लगातार धन्यवाद देने का भाव बनाएं।

 

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

Share this on :

भय से मुक्ति कैसे पाएँ ?

Share this on :



भौतिक शरीर अत्यन्त शक्तिशाली है किन्तु आपके अनुसार कौन अधिक शक्तिशाली है-हमारा मस्तिष्क या शरीर ?
जब आपके समक्ष कोई प्रश्न रखा जाता है तब आपको उसका ज्ञान होता है। इसलिए परीक्षा के समय आप अधिक सचेत हो जाते हैं और इस दौरान पूरे वर्ष की अपेक्षा अधिकाधिक सीखते हैं और परीक्षाकाल के अतिरिक्त अन्य समय में पढ़ी गई अध्ययन सामग्री की अपेक्षा अधिक याद कर पाते हैं।
इस दौरान हम 60.70 % सीखा गया ज्ञान प्रभावी रूप से कंठस्थ (memorise) रख पाते हैं क्योंकि हमारा मस्तिष्क अत्यधिक शक्तिशाली है और आप उस दौरान एकाग्रचित होते हैं।
मस्तिष्क अत्यन्त शक्तिशाली उपकरण है किन्तु हम अपने मस्तिष्क को बहुत ही आरामदायक स्थिति में रखते हैं । यदि हम अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित करे तो यह कई चमत्कार कर सकता है। यह सम्पूर्ण शरीर को निर्देशित करता है। आप अपने मस्तिष्क की सहायता से अद्भुत चमत्कार कर सकते हैं। अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने हेतु आपको सही दिशा में सोचना होगा। जैसे ही आप अपने मस्तिष्क में एक विचार प्राप्त करते हैं आप सोचना शुरू कर देते हैं जैसे ही आप सोचते है आपमें भावनाएँ उत्पन्न होती हैं और यह भावना स्पन्दन उत्पन्न करती है जो ऊर्जा उत्पन्न करता है। यदि मस्तिष्क सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करता है तो अंततः आप सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करेंगे और इसके फलस्वरूप आप सकारात्मक रूप से आवेशित होंगे और यह आपके कार्यो में भी प्रतिबिम्बित होगा। आपके विचार, क्रिया (action) उत्पन्न करते हैं और बार-बार होने वाली क्रियाएँ हमारी आदतों का निर्माण करती है। अपनी आदतों को देखिए जो आपके स्वभाव (attitude) का निर्माण करती हैं। इस स्वभाव के कारण भाग्य का निर्माण होता हैं। इस तरह हम ही अपने भाग्य के निर्माता हैं।
अपने विचारों को महत्त्व दीजिए और प्रतिदिन एक सकारात्मक विचार लिखिए। उस विचार का अनुभव कीजिए। प्रत्येक सुबह तथा रात को सोने से पूर्व उसे जोर से पढ़िए तभी आपको बुरे स्वप्न से मुक्ति प्राप्त होगी और एक आनन्ददायक सुबह के साथ दिन का आविर्भाव होगा। इससे एक अच्छी मनःस्थिति का निर्माण होगा।
हममें से प्रत्येक के पास एक मस्तिष्क है किन्तु सबकी विभिन्न मनोस्थितियाँ है। मस्तिष्क एक hardware है और मनःस्थिति एक software है जो अधिक महत्त्वपूर्ण है। साॅफ्टवेयर को श्रेष्ठ बनाने हेतु आपको एक समुचित विचार रखना होगा। शरीर के लिए भोजन आवश्यक है और सकारात्मक ऊर्जा ही मस्तिष्क का भोजन होती है।
प्रतिदिन अच्छे विचार न केवल लिखें अपितु दूसरों के साथ बाँटे भी । जितना आप बाँटेंगे यह आपके ऊपर उतना बेहतर प्रभाव डालेंगे। इस प्रकार यह आपके साॅफ्टवेयर अर्थात् मनोस्थिति पर स्थायी प्रभाव डालेगा।
यह विचार प्रबंधन (management) हमारे जीवन का श्रेष्ठ उपकरण है। जो हम देखते है वह हमारे मस्तिष्क में जाता है और कार्यो में कुछ समय बाद प्रतिबिम्बित होता है। अतः कुछ क्षण के लिए आइए कुछ अच्छा सोचे और गायत्री मंत्र का समुचित अर्थ समझते हुए उच्चारित करें। आपके प्रत्येक कर्मो के पीछे एक सही कारण या तर्क होना चाहिए। जब आप अपने तर्क का प्रयोग करते है तो आप एक अच्छा भाव एवं अच्छी ऊर्जा उत्पन्न कर पाते हैं।
ॐ भू र्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमही
धियो योनः प्रचोदयात्।

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

Share this on :

एक आध्यात्मिक व्यक्ति कैसे बना जाएं ?

Share this on :



प्रत्येक दिन और प्रत्येक पल एक उत्सव है। यदि आप वर्तमान का आनन्द ले रहे हैं तो यही जीवन जीने का उचित तरीका है। हम इस प्रवृत्त्ति को अपने जीवन में कैसे विकसित कर सकते हैं। एक आध्यात्मिक व्यक्ति कैसे बना जाए जो कि शांति का अनुभव कर सके और सुख की प्राप्ति कर सके। प्रत्येक मनुष्य को एक दिन जाना होगा। कोई भी अमर नहीं है। यह जीवन का सबसे बड़ा सत्य है कि एक दिन हमें यह संसार त्यागना होगा फिर भी हम पूरे समय अनेक कार्यो में लिप्त रहते हैं।
यहां कई लोग हैं जो अपने जीवन का मूल्य कम आंकते हैं और जीवन का आनन्द नहीं ले पाते हैं। कई लोग ऐसे हैं जिन्हें प्रार्थना करना और अच्छी बाते सुनना व्यर्थ कार्य लगता है।
यदि मैं यह कल्पना करूं कि आज यह मेरे जीवन का अन्तिम दिन है तो मैं अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ बेहतर करने का प्रयास करूंगा। यह दृष्टिकोण आपको आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करेगा।
आप प्रातः काल धन्यवाद दे सकते हैं क्यों कि आज आप जीवित एवं स्वस्थ है। आप कह सकते है ‘‘हे परमात्मा – कोटि-कोटि धन्यवाद क्योंकि आज मैं इस दिन का आनन्द ले सकता हूँ। मैं सम्पूर्ण जगत को देख सकता हूँ। आज मैं अपने भाग्य (destiny) को बदल सकता हूँ‘‘। आप ईश्वर को इसलिए भी धन्यवाद दे सकते है क्यों कि आपके प्रिय लोग आज आपके समक्ष जीवित हैं। ऐसा हो सकता है, एक दिन आपके परमप्रिय आपके साथ न रहे। उस दिन आपको समझौता करना होगा और उस हानि को स्वीकार करना होगा। अतः आज आपके पास ईश्वर के समक्ष कृतज्ञ होने का पर्याप्त कारण है क्योंकि आपके प्रिय लोग सुरक्षित हैं और स्वस्थ हैं।
आप कितनी बार सोचते हैं कि आपके समक्ष कुछ अच्छा होगा या आप कोई अच्छा समाचार या नई वस्तुएँ प्राप्त करेंगे तो आप प्रसन्न होंगे किन्तु यह पूर्णतः गलत है। आपकी प्रसन्नता किसी बाह्य परिस्थिति पर निर्भर नहीं करती। प्रसन्नता आपके भीतर निवास करती है। यह आपकी प्रवृत्ति पर निर्भर करती है कि आप जीवन को किस प्रकार स्वीकार करते हैं।
सही समय पर उचित कार्य कीजिए। ‘‘कार्य के समय कार्य कीजिए और खेल के समय खेलिए। सुनने के समय मात्र सुनिए। एक समय में एक ही कार्य कीजिए। वे लोग मूर्ख होते है जो सुनने के समय समय बोलते है जब कि उस समय उन्हें सुनना ही चाहिए। सुनने की क्रिया आपको तर्कशक्ति (reasoning) प्रदान करती है।
बुद्धिमान व्यक्ति ही दूसरों को सुनते हैं। जब कि मूर्ख व्यक्ति सोचते हंै कि उन्हे किसी परामर्श की आवश्यकता नहीं है। हम ध्यान क्रिया (meditation) द्वारा एक शांतिपूर्ण जीवन प्राप्त कर सकते है। चलिए आंखे बंद कर उचित लय में ‘‘ú‘‘ का उच्चारण (chant) करते हैं। आज यह महसूस करते हंै कि ऊर्जा हमारे पैर के अंगूठे से शीर्ष की ओर बह रही है, हमारे संपूर्ण शरीर को सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण कर रही है।
इस प्रकार जीवन अद्भुत हो जाता है और आप प्रसन्नता का अनुभव करते है। आप अपने चारों ओर प्रसन्नता का संचार कर सकते है।

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

 

Share this on :