क्या बच्चे वो करते हैं जो उन्हें कहा जाता है या जो उनकी अपनी पुस्तकों में लिखा होता हैं ?

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एक बालक की अच्छी परवरिश अत्यंत उपयोगी है। बच्चे अपने माता-पिता या गुरूजनों या बड़ों का ही अनुकरण करते हैं। माता-पिता या बड़ों को अपने बच्चों के जीवन में आदर्श ;तवसम उवकमसद्ध बनना चाहिए।
आजकल माता-पिता अपने बच्चों के साथ समय व्यतीत नहीं कर पाते क्योंकि वे अत्यन्त व्यस्त है। उन्होंने उनके लिए अच्छे विद्यालय, महाविद्यालय, कई आधुनिक सुविधाओं जैसे मोबाइल, ट्यूशन, कोचिंग, गाड़ी आदि की सुविधाएं तो प्रदान की है। फिर भी बच्चे अपने माता-पिता से दूर होते जा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है ? सम्बन्धों में संवादहीनता क्यों हो रही है ?
हम सभी अत्यधिक शक्तिशाली हैं। हमारे शरीर में लगभग 300 से 500 खरब कोशिकाएँ होती हैं और प्रत्येक कोशिका में लगभग 8 GB मैमोरी क्षमता होती है। किन्तु हम इस शक्ति का प्रयोग क्यों नहीं कर पाते है। केवल कॉलेज ही विद्यार्थियों को शक्तिशाली नहीं बना सकता। वास्तविक शिक्षा माता-पिता द्वारा ही दी जानी चाहिए जो बच्चे को एक वास्तविक मनुष्य बनने में सहायक होगी। माता-पिता बालक के सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षक होते है। परवरिश शक्तिशाली होनी चाहिए तभी बच्चों की वास्तविक अभिवृद्धि हो सकेगी। बालक के जीवन की पहली शिक्षक माता ही होती है। माता सदैव प्रेममयी एवं आपका ध्यान रखने वाली होती है। वह अपने बच्चे पर पूरी निष्ठा से ध्यान देती है और उसके जन्म के पहले क्षण से उसका सजग होकर पालन पोषण करती है। पहले दिन से ही एक माता अपने बालक को स्वप्रेरणा से इशारों और अशाब्दिक क्रियाओं (non verbal action) के द्वारा प्रेम की भाषा सिखाती है। बालक बचपन में माता-पिता के साथ लुकाछिपी खेल खेलते हुए आनन्दित होता है। परन्तु जैसे ही वह युवावस्था में पहुंचता है माता-पिता के साथ असहज होता चला जाता है। जब माता-पिता उनके कक्ष में पहुंचते हैं तो बच्चे वहाँ से चले जाते हैं। बच्चे अपने साथियों के साथ वाट्सएप, कम्प्यूटर, फेसबुक की अपनी ही दुनिया में व्यस्त हो जाते है। हम आपसी वार्तालाप हेतु बहुत कम समय निकाल पा रहे हैं। अब सम्बन्धों और आपसी व्यवहार में बहुत कम भावनाएँ और बहुत तर्क रह गया है।
परन्तु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्या है – आपके बच्चे का भविष्य या आपकी नौकरी या व्यवसाय ? सबसे महत्त्वपूर्ण है बच्चों के भविष्य का निर्माण करना। यदि चरित्र विलुप्त हो जाता है तो सब कुछ खो जाता है। यदि आप समग्र विश्व को जीतकर अपना चरित्र खो देंगे तो आपको क्या लाभ होगा ? आइए हम अपने बच्चों को मूल्य सिखाएँ। हमारे घर-परिवार के सम्बन्ध और नींव को सशक्त बनाएँ। अपने बच्चे को मानसिक रूप से मजबूत बनाएँ। उन्हें कृतज्ञ रहना सिखाएँ। उन्हें माता-पिता के पैर छूना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना सिखाएँ। श्रेष्ठ सकारात्मक कार्य बालक में कृतज्ञता का भाव उत्पन्न करना ही होगा। इसी प्रवृत्ति से जीवन में स्वास्थ्य, सम्पत्ति, सम्बन्ध, आजीविका और सफलता की प्राप्ति होगी। इसके लिए मैं आपको तीन सुझाव देता हूँ –
कहिए – ‘‘धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद ‘‘। न केवल बोलिए बल्कि इसे अनुभव भी कीजिए और तीन बार कारण सहित, कार्य करने से पूर्व और कार्य समापन पर धन्यवाद कहिए। अपने माता-पिता, नियोक्ता, पेड़ों, प्रकृति और अपने भोजन के प्रति कृतज्ञ रहना सीखिए।
मनुष्य स्वयं के लिए और समाज के लिए जीता है । हमें अधिकाधिक उपयोगी बनना चाहिए। हम सभी ऊर्जापुंज ही तो हैं। अभिभावक जब तक स्वयं अपने आचरण में इन सब चीजों को नही लाएंगे तब तक ऐसा सिखाना महज औपचारिकता ही होगी। बच्चे बड़ों को देखकर ही अधिक सीखते हैं। वे पुस्तकों व निर्देशित बातों से नहीं सीख पाते बल्कि व्यावहारिकता से अधिक सीखते हैं।
हम भौतिक शरीर नहीं है। क्या हम सकारात्मक हैं? सकारात्मकता अच्छी ऊर्जा प्रदान करती है। नकारात्मकता कुण्ठा को जन्म देती है। इसलिए हम क्रोधित होते हैं, दूसरो को आहत करते हैं और उग्र हो जाते है। अपनी ऊर्जा को कैसे रूपान्तरित करें। नकारात्मक ऊर्जा से कैसे मुक्त हो ? इस हेतु हमें एक सामान्य शब्द ‘‘मुझे माफ कर दीजिए‘‘ (i am sorry) का प्रयोग करना होगा।
हम सभी गलतियाँ करते हैं परन्तु हम में से कितने लोग गलती स्वीकार कर कहते है कि ‘‘मुझे क्षमा कीजिए‘‘ हम अहंकारयुक्त जीवन जीते हैं। प्रत्येक दिन के प्रारंभ पर सुबह अपने बच्चों को माता-पिता के चरण स्पर्श करना सिखाएं तभी वे अपने अहंकार से मुक्त हो सकेंगे। वे अपनी गलती पर कह पाएंगे कि ‘‘मुझे क्षमा कीजिए‘‘। उन्हें नजरें मिलाकर कारण सहित और अच्छी भावना के साथ गलती स्वीकारना सिखाए।
हममें से अधिकांश लोग एक सामान्य गलती करते हैं कि हम अपनी माँ से झूठ बोलते है या अपने माता-पिता से सत्य छिपातंे है। यह हमारे द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है। आइए आज से हम यह संकल्प ले कि यह अपराध पुनः नहीं दोहराएंगे।
हम सही रूप से कार्य करें और ‘‘कर्म के नियम‘‘ को समझे। प्रत्येक कार्य के लिए समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है। जीवन मे कुछ प्राप्त करने के लिए आपको कुछ करना होगा, कुछ त्यागना होगा। हमें एकाग्रचित होना चाहिए। जानना चाहिए कि क्यांे बच्चे एकाग्रचित नहीं हो पाते। उन्हें अपना उद्देश्य निर्धारित करना सिखाना होगा। उनकी रूचि का ध्यान रखते हुए उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सहायता करे। जीवन एक लंबी यात्रा है – सम्पूर्ण मानव और मानव बनने के बीच। अपने बच्चों को प्रतिदिन इस दूरी को तय करने में सहायता कीजिए।

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

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