कर्म का सिद्धान्त

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‘‘फल की अभिलाषा छोड़कर कर्म करने वाला पुरूष ही अपने जीवन को सफल बनाता है। जीवन के अनुभव भी कर्मयोग का ही परिणाम है।‘‘
हमारा जीवन कर्मयोग के सिद्धान्त पर आधारित है। कर्म करो एवं फल की इच्छा न करो। इसके लिए गीता में श्रीकृष्ण का कर्म का उपदेश समझना होगा। कर्म क्या है ? कर्म कैसे करे ? कर्म से लक्ष्य कैसे प्राप्त करे ?
अगर आपको अच्छा वक्ता ;ळववक ेचमंामतद्ध बनना है तो आपको अच्छा श्रोता ;ळववक सपेजमदमतद्ध भी बनना होगा। हम ज्ञान और अनुभव से बोल सकते है। हमारे जीवन का लक्ष्य है कि हम कुछ बेहतर करें। प्रश्न उठता है कि कुछ करने के लिए हमारा मांइडसेट कैसा हो‘‘ इसके लिए जरूरी है कि हम जो भी सुने उसे गौर से सुने और उसे अच्छे से समझकर बोलने का प्रयास करें।
जीवन में सुख-दुःख का चक्र ऐसे चलता है जैसे कि धूप व छाँवं । हर दिन का, हर क्षण का हमें दिल से स्वागत करना चाहिए। हम रात-दिन अनेक कर्म करते है। जिनका लेखा पाप-पुण्य के रूप में होता रहता हैं। सम्पूर्ण सृष्टि ;न्दपअमतेमद्ध में मानव ही ऐसी योनि है जिसके अच्छे कर्म पुण्य एवं बुरे कर्म पाप के रूप में गिने जाते है। अतः यहाँ विचारणीय है कि भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म के बारे में क्या कहा है ?
‘‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
म कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽत्वकर्मणि।।‘‘
अर्थात् तेरा कर्म करने में ही अधिकार है। उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मो के फल की इच्छा मत रख तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
फल की इच्छा छोड़कर कर्म करने वाला पुरूष ही अपने जीवन को सफल बनाता है। जीवन के अनुभव भी कर्मयोग का ही परिणाम है। हमें जीवन में अच्छे कर्म करने चाहिए। हम बेहतर परिणाम की आशा कर सकते है क्योंकि आशा हमें प्रेरणा दे सकती है, हमें मोटिवेट कर सकती है। फल की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से हमें निराशा, चिन्ता और दुःख ही मिलेगा। अतः कर्म करें और अच्छी भावना से करें।

 

प्रो. संजय बियानी

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