छठा अध्यायः आत्मसंयम योग – श्रीमद्भगवद्गीता (संजय की नजर से)

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इस अध्याय में कार्यक्रम के एंकर डाॅ. संजय बियानी द्वारा बताया गया है कि यह अध्याय उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी है जिनकी उम्र 15 से 25 के बीच है। जिनका मन पढ़ाई में नहीं लगता और यह उनके प्रत्येक कार्य को प्रभावित करता है, इस अध्याय में अर्जुन और कृष्ण का संवाद आपके जीवन में बदलाव लाने वाला है। इसमें छः बिन्दुओं पर बात की गई है – योगी कौन है ? योगी कैसे सोचता है ?, योग क्रिया कैसे की जाती है ? मन क्या है ? और इसे नियंत्रित कैसे किया जा सकता है ? मन प्रशांत होने का क्या मतलब है ? श्रद्धा और योग का क्या सम्बन्ध है ? इन सभी बिन्दुओं को श्रीमद्भगवद्गीता के द्वारा डाॅ. संजय बियानी ने बहुत ही सरल तरीके से समझाया है। उन्होंने कहा है कि हम अक्सर डरते है, क्यूंकि हमारा ध्यान कर्म करने से ज्यादा फल पर रहता है। शरीर मन और इंद्रियों को योगी ही नियंत्रित कर सकता है और जब इंसान योगी बन जाता है तो वह बाहर की वस्तुओं से प्रभावित नहीं होता और कर्मयोगी हो जाता है। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से बतया है कि जब हम छोटी-छोटी बातो से ऊपर उठकर आगे बढ़ जाते है तब हम ऐसे फैसले लेने लगते है जो समाजोपयोगी हो और जिससे समाज में बदलाव आए। यही वह गीता है जो मुक्त कर देती है, प्रशांत बना देती है, कर्मयोगी बना देती है, ईश्वर से मिला देती है। इस अध्याय द्वारा आप अपने मन पर नियंत्रण करना जान सकते है। यह अत्यन्त हितकारी होगा।

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