श्रीमद् भगवद् गीता संजय की नज़र से प्रथम अध्याय : अर्जुन विषाद योग

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अक्सर हम सभी लोग दो सवालों के जवाब ढूंढा करते हैं। मुझे लगता है ये सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण है। पहला सवाल है- मैं कौन हूं? और दूसरा सवाल है- मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? जब इन दोनों सवालों का जवाब मिल जाता है, तो मन में शांति आती है, खुशियां आती हैं। हम सभी को जीवन में कई निर्णय लेने होते हैं और निर्णय लेना ही सबसे बड़ी ताकत है। एक सही निर्णय आपको जीवन में कहीं भी पहुंचा सकता है। निर्णय लेने की यह कला तब आती है, जब हमारे पास इन दोनों सवालों के जवाब होते हैं।

मुझे लगता है श्रीकृष्ण ऐसे हैं जिन्होंने अपने मनुष्य अवतार में सभी दु:खों को देखा। एक ऐसा इंसान, जिसका जन्म कैदखाने में होता है, एक ऐसा इंसान जो ग्वाले के रूप में अपना बचपन व्यतीत करता है, एक ऐसा इंसान जो अपने मामा से बहुत कम उम्र में ही युद्ध करना पड़ता है, एक ऐसा इंसान जो राजा बनता है और एक ऐसा इंसान जो ज्ञान की पराकाष्ठा तक पहुंचता है।

अगर आप अपने भीतर छिपी हुई प्रतिभा को सामने लाना चाहते हैं। जीवन में प्रबंधन करना चाहते हैं, एन्टरप्रेन्योर बनना चाहते हैं, एक सफल इंसान बनना चाहते हैं या अपने रिश्तों को बखूबी निभाना चाहते हैं तो श्रीमद् भगवद् गीता आपके लिये बहुत उपयोगी रहेगी।

श्रीमद् भगवद् गीता- अध्याय प्रथम (अर्जुन-विषाद योग)

अर्जुन को विषाद है, अर्जुन को दु:ख है। हमारे जीवन में भी दु:ख आता है, तभी ज्ञान आता है। वे सभी लोग कभी ज्ञानी नहीं बन पायेंगे जिनके जीवन में विषाद न हो। अर्जुन के विषाद के कारण ही उसे अद्भुत ज्ञान की प्राप्ति हुई। अगर आपके जीवन में दु:ख है, तो आपको प्रसन्न हो जाना चाहिये। क्यूंकि अब ज्ञान समझ आ जायेगा। ज्ञान है तो सबके पास लेकिन समझ कुछ ही लोगों को आता है।

शंखनाद के बीच… युद्ध का भयंकर दृश्य… हर तरफ बलशाली योद्धा… अर्जुन श्रीकृष्ण को कहते हैं, ‘कृष्ण, मुझे दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करो, ताकि मैं सभी को देख सकूं।’ क्यूंकि कृष्ण आज सारथी हैं इसलिए कृष्ण इस बात को समझ कर रथ को दोनों  सेनाओं के बीच लाकर खड़ा कर देते हैं। अर्जुन जैसे-जैसे चारों तरफ देखने लगते हैं, विषाद की तरफ बढऩे लगते हैं। भीष्म पितामह, जिनसे अर्जुन ने शिक्षा ली थी, आज वही अर्जुन के विपक्ष में उससे युद्ध करने के लिए खड़े हैं। द्रोणाचार्य, जो अर्जुन के शिक्षक रहे, आज उनके सामने तीर-कमान लेकर खड़े हैं। अर्जुन का अपना परिवार, उनके मामा, चाचा, पुत्र…उन्हें दिखाई देने लगते हैं और जैसे-जैसे वे यह दृश्य देख पाते हैं, विषाद में आते जाते हैं। यह विषाद जीवन को बहुत खराब कर देता है। अर्जुन निराशा में बढ़ते जा रहे हैं। ये सब देखकर अर्जुन फि र सवाल करते हैं,‘हे कृष्ण, इन सभी को मारने के बाद, मुझे जो राज्य मिलेगा, उसका मैं क्या करूंगा? कितना विनाश होगा…कुल का नाश हो जाने पर मेरे जीवन का महत्व ही क्या रह जाएगा?

मुझे लगता है, ऐसी परिस्थितियां मेरे जीवन में भी आती हैं, हम भी सम्बन्धों के जाल में फं स जाते हैं। हम एक परिवार तक सीमित हो जाते हैं, जबकि जीवन का उद्देश्य तो अलग ही है। अर्जुन भी इसी उधेड़बुन के चलते श्रीकृष्ण से कहते हैं,‘इस युद्ध में विजय के बदले मुझे तीनों लोकों का राज भी मिल जाए, तो भी अपने परिवार को कष्ट पहुंचाने वाले इस युद्ध को मैंं नहीं करना चाहूंगा।’ ये कहकर वे तीर-कमान नीचे रख देता है। अर्जुन पूरी तरह से निराश हो चुका है। हम भी जीवन में अक्सर निराश हो जाते हैं, इसलिए हम सभी के लिए अध्याय दो से लेकर आगे की यात्रा बहुत महत्वपूर्ण होगी।

क्रमश:

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Shreemad Bhagwad Geeta Sanjay Ki Nazar Se – Adhyay One

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Adhyay One – ARJUNA VISHAD YOGA

Bhagavad Gita  is one of the most beautiful and soul enriching spiritual texts ever written, the protagonist or the central figure Arjuna, the great warrior is a true devotee and inquires to   Lord Krishna about several issues as compelling today as they were ions of years ago.

In the“ Shrimad Bhagavad Gita Sanjay Ki Nazar Se ,I,  Dr Sanjay Biyani have used contemporary, simplified language to bring this inspiring work to life.

In this enlightening text it is explained that when a person goes through misery, it awakens him, and then leads him to experience knowledge. During this periods of darkness and misfortune a person should feel humble and realize that this is the time when he would experience true enlightenment. This is why the very first chapter is referred as Arjuna Vishad Yog. Just like Arjuna faces the dilemma in the battle field so do we all mortal beings in our day to day lives encounter such predicaments.

When in a depression or Vishad, one keeps on seeing everything as not right, It is like a negative zone that engulfs a person, it rattles and jolts them up. These negative thoughts can come at home or at the work place. To move out of this negative space, you need some supporting foundation and a firm base. And that comes to you from knowledge, which is so amply provided by the Bhagwad Geeta ,the beautiful discourse between the Lord and his devotee.

Facing the duty as a warrior to fight the Dharma or righteous war between Pandavas and Kauravas, Arjuna is directed and adviced by Lord Krishna to consummate  his duty as a warrior .

Here Lord Krishna  also perorates the most important questions relevant to our existence which are Who is the real me? What is the purpose of my Life? How can I attain eternal Bliss??

Shri Krishna also explains that the  soul is imperishable and indestructible to the seeker of knowledge who is Arjuna. He explains that the individual soul is unbreakable and infrangible, and can be neither burned nor destroyed.

The soul is immutable, abiding, deathless and eternally the same. This knowledge is of paramount importance for us also as  knowing this, we would not lament and grieve for the temporary body. He compares it to the simple process of a mortal being simply changing clothes. So, the body dwindles and finally dies but the soul does not die: it simply changes bodies.

Through the knowledge of the  Bhagwad Geeta it is expressed tha that those who have purified their awareness, becoming absorbed in sacred acquaintance and exonerating any impurities in the mind, are released from karma that frees them from any future births. They are for ever freed from any more births in the material world and are delivered to the spiritual atmosphere.

In this way we enter into this spiritual journey of “Shrimad Bhagwad Gita” with me Sanjay in this spell bounding series “Shrimad Bhagwad Geeta Sanjay Ki nazar se”

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