जीवन में चुनौतियों का सामना कौन कर सकता है

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यदि हमारा जीवन पूर्णतः सुविधाजनक है तो भला हम क्यों चुनौतियों को स्वीकारेंगे ? कौन चुनौती स्वीकार कर सकता है ? चुनौतियों को स्वीकार कर उनका सामना करना परम आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति चुनौती का सामना नहीं कर पाता। केवल वही व्यक्ति जिसके जीवन में कोई उद्देश्य है वही चुनौती स्वीकार कर पाएंगे। यदि आपके जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है तो आपको कोई चुनौती स्वीकार करने की आवश्यकता महसूस ही नहीं होगी। जीवन को व्यावहारिक रूप से लीजिए। जीवन में कोई लक्ष्य आने दीजिए। तभी आप तुच्छ वस्तुओं में व्यस्त न होकर बड़े विचारों की ओर अग्रसर होंगे। आप स्वयं में आशावादी (optimistic) दृष्टिकोण एवं सकारात्मक प्रवृत्ति का विकास कर पाएंगे।
यदि आप जीवन का आनन्द मात्र लेना चाहते है तो चुनौतियां लेने की कोई आवश्यकता नहीं होगी। परन्तु पशु-पक्षी भी जीवन का आनन्द मात्र ही लेते है तो मनुष्यों और जन्तुओं के बीच क्या अन्तर है ?
आपके पास एक शक्तिशाली मस्तिष्क है जो संसार की सर्वशक्तिमान मशीन है। गुरूजन जो आपको प्रशिक्षण दे रहे हैं, आपको महान कार्य करने हेतु सक्षम बना रहे हैं। वे एक महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं और वह है आपके जीवन उद्देश्य निर्धारण करने में आपकी मदद। व्यक्ति का उद्देश्य निर्धारित होने पर ही उसका महत्त्व बढ़ता है। सभी महान विभूतियाँ अपने बाल्यकाल में साधारण बालक ही थे किन्तु उनके निश्चित उद्देश्य के चलते वे महान व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हुए। अतः आपको भी स्वयं अपने जीवन का उद्देश्य निर्धारित करना चाहिए। स्वयं अपना लक्ष्य सृजित कीजिए। एक ज्वलंत इच्छा रखिए और निरन्तर स्वप्न देखते हुए इस दिशा में प्रयास कीजिए। अपने स्वप्न से प्रेम कीजिए और इसे परिपूर्ण करने हेतु सक्रिय रहिए। स्वतंत्र चिन्तन कीजिए। यदि आप IAS, RAS, CA, CS या व्यवसायी बनना चाहते हैं तो आज से ही शुरूआत कीजिए।

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ईश्वर और प्रकृति पूर्ण (perfect) हैं

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मस्तिष्क अत्यंत शक्तिशाली है। आइए हम जानें कि हमारा मस्तिष्क किस प्रकार कार्य करता है- सर्वप्रथम जब हम सुनते है तो मस्तिष्क में बिम्ब बनता है। यदि मस्तिष्क एकाग्रचित होता है तो यह इच्छा शक्ति का विकास कर लेता है। यदि मस्तिष्क इच्छुक नहीं हो तो आपको कोई संदेश याद नहीं रह पाएगा। आपकों यह ज्ञात होना चाहिए कि समुचित रूप से कुछ भी कैसे याद रखा जाए और परीक्षा के समय सही उत्तर कैसे दिया जाए? हमारी क्या कमजोरियाँ है ? हमें परीक्षा में कम अंक क्यों प्राप्त होते हैं ? हम सैद्धान्तिक सामग्री क्यों नहीं याद रख पाते ? एकाग्रता की कमी के कारण हम जीवन में इच्छित उपलब्धि नहीं ले पाते।
चलिए हम मस्तिष्क को प्रशिक्षित करते है। एक प्रभावशाली मंत्र का बार-बार उच्चारण करते हैं। उच्चारण करते समय मस्तिष्क में कोई और विचार न लाएँ। इसे तीन बार उच्चारित कीजिए। पुनरावृत्ति आवश्यक है।
परन्तु पुनरावृत्ति के समय यदि आप यही सोचते रहते हैं कि मैं याद नहीं रख सकता, मैं परीक्षा के समय उत्तर भूल जाऊंगा तो ऐसा वास्तव में होगा। इन नकारात्मक विचारां के कारण हमारी संकल्प शक्ति क्षीण हो जाती है जब कि हमारे बीच अधिकांश लोग प्रतिभावान है । हम पूर्णतः सामान्य हैं। अब हम अपनी बौद्धिक शक्ति का परीक्षण करते हैं। हमस्वयं पर ध्यान केंद्रित करें और सर्वप्रथम निम्न मंत्र का अर्थ समझेंगे फिर इसकी पुनरावृत्ति इस आत्मविश्वास के साथ करेंगे कि हम इसे सही-सही रूप से बोल सकते हैं।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इसका मतलब यह है कि प्रकृति पूर्ण (perfect) है जिसे हम बाहरी दुनिया कहते हैं साथ ही साथ हमारे अन्दर की चेतना भी पूर्ण (perfect) है। जिसे हम आत्मा, परमात्मा, ईश्वर और आन्तरिक शक्ति के रूप में जानते है। इस दिव्य शक्ति से ही सब सृजन हो रहा है।  

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क्या बच्चे वो करते हैं जो उन्हें कहा जाता है या जो उनकी अपनी पुस्तकों में लिखा होता हैं ?

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एक बालक की अच्छी परवरिश अत्यंत उपयोगी है। बच्चे अपने माता-पिता या गुरूजनों या बड़ों का ही अनुकरण करते हैं। माता-पिता या बड़ों को अपने बच्चों के जीवन में आदर्श ;तवसम उवकमसद्ध बनना चाहिए।
आजकल माता-पिता अपने बच्चों के साथ समय व्यतीत नहीं कर पाते क्योंकि वे अत्यन्त व्यस्त है। उन्होंने उनके लिए अच्छे विद्यालय, महाविद्यालय, कई आधुनिक सुविधाओं जैसे मोबाइल, ट्यूशन, कोचिंग, गाड़ी आदि की सुविधाएं तो प्रदान की है। फिर भी बच्चे अपने माता-पिता से दूर होते जा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है ? सम्बन्धों में संवादहीनता क्यों हो रही है ?
हम सभी अत्यधिक शक्तिशाली हैं। हमारे शरीर में लगभग 300 से 500 खरब कोशिकाएँ होती हैं और प्रत्येक कोशिका में लगभग 8 GB मैमोरी क्षमता होती है। किन्तु हम इस शक्ति का प्रयोग क्यों नहीं कर पाते है। केवल कॉलेज ही विद्यार्थियों को शक्तिशाली नहीं बना सकता। वास्तविक शिक्षा माता-पिता द्वारा ही दी जानी चाहिए जो बच्चे को एक वास्तविक मनुष्य बनने में सहायक होगी। माता-पिता बालक के सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षक होते है। परवरिश शक्तिशाली होनी चाहिए तभी बच्चों की वास्तविक अभिवृद्धि हो सकेगी। बालक के जीवन की पहली शिक्षक माता ही होती है। माता सदैव प्रेममयी एवं आपका ध्यान रखने वाली होती है। वह अपने बच्चे पर पूरी निष्ठा से ध्यान देती है और उसके जन्म के पहले क्षण से उसका सजग होकर पालन पोषण करती है। पहले दिन से ही एक माता अपने बालक को स्वप्रेरणा से इशारों और अशाब्दिक क्रियाओं (non verbal action) के द्वारा प्रेम की भाषा सिखाती है। बालक बचपन में माता-पिता के साथ लुकाछिपी खेल खेलते हुए आनन्दित होता है। परन्तु जैसे ही वह युवावस्था में पहुंचता है माता-पिता के साथ असहज होता चला जाता है। जब माता-पिता उनके कक्ष में पहुंचते हैं तो बच्चे वहाँ से चले जाते हैं। बच्चे अपने साथियों के साथ वाट्सएप, कम्प्यूटर, फेसबुक की अपनी ही दुनिया में व्यस्त हो जाते है। हम आपसी वार्तालाप हेतु बहुत कम समय निकाल पा रहे हैं। अब सम्बन्धों और आपसी व्यवहार में बहुत कम भावनाएँ और बहुत तर्क रह गया है।
परन्तु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्या है – आपके बच्चे का भविष्य या आपकी नौकरी या व्यवसाय ? सबसे महत्त्वपूर्ण है बच्चों के भविष्य का निर्माण करना। यदि चरित्र विलुप्त हो जाता है तो सब कुछ खो जाता है। यदि आप समग्र विश्व को जीतकर अपना चरित्र खो देंगे तो आपको क्या लाभ होगा ? आइए हम अपने बच्चों को मूल्य सिखाएँ। हमारे घर-परिवार के सम्बन्ध और नींव को सशक्त बनाएँ। अपने बच्चे को मानसिक रूप से मजबूत बनाएँ। उन्हें कृतज्ञ रहना सिखाएँ। उन्हें माता-पिता के पैर छूना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना सिखाएँ। श्रेष्ठ सकारात्मक कार्य बालक में कृतज्ञता का भाव उत्पन्न करना ही होगा। इसी प्रवृत्ति से जीवन में स्वास्थ्य, सम्पत्ति, सम्बन्ध, आजीविका और सफलता की प्राप्ति होगी। इसके लिए मैं आपको तीन सुझाव देता हूँ –
कहिए – ‘‘धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद ‘‘। न केवल बोलिए बल्कि इसे अनुभव भी कीजिए और तीन बार कारण सहित, कार्य करने से पूर्व और कार्य समापन पर धन्यवाद कहिए। अपने माता-पिता, नियोक्ता, पेड़ों, प्रकृति और अपने भोजन के प्रति कृतज्ञ रहना सीखिए।
मनुष्य स्वयं के लिए और समाज के लिए जीता है । हमें अधिकाधिक उपयोगी बनना चाहिए। हम सभी ऊर्जापुंज ही तो हैं। अभिभावक जब तक स्वयं अपने आचरण में इन सब चीजों को नही लाएंगे तब तक ऐसा सिखाना महज औपचारिकता ही होगी। बच्चे बड़ों को देखकर ही अधिक सीखते हैं। वे पुस्तकों व निर्देशित बातों से नहीं सीख पाते बल्कि व्यावहारिकता से अधिक सीखते हैं।
हम भौतिक शरीर नहीं है। क्या हम सकारात्मक हैं? सकारात्मकता अच्छी ऊर्जा प्रदान करती है। नकारात्मकता कुण्ठा को जन्म देती है। इसलिए हम क्रोधित होते हैं, दूसरो को आहत करते हैं और उग्र हो जाते है। अपनी ऊर्जा को कैसे रूपान्तरित करें। नकारात्मक ऊर्जा से कैसे मुक्त हो ? इस हेतु हमें एक सामान्य शब्द ‘‘मुझे माफ कर दीजिए‘‘ (i am sorry) का प्रयोग करना होगा।
हम सभी गलतियाँ करते हैं परन्तु हम में से कितने लोग गलती स्वीकार कर कहते है कि ‘‘मुझे क्षमा कीजिए‘‘ हम अहंकारयुक्त जीवन जीते हैं। प्रत्येक दिन के प्रारंभ पर सुबह अपने बच्चों को माता-पिता के चरण स्पर्श करना सिखाएं तभी वे अपने अहंकार से मुक्त हो सकेंगे। वे अपनी गलती पर कह पाएंगे कि ‘‘मुझे क्षमा कीजिए‘‘। उन्हें नजरें मिलाकर कारण सहित और अच्छी भावना के साथ गलती स्वीकारना सिखाए।
हममें से अधिकांश लोग एक सामान्य गलती करते हैं कि हम अपनी माँ से झूठ बोलते है या अपने माता-पिता से सत्य छिपातंे है। यह हमारे द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है। आइए आज से हम यह संकल्प ले कि यह अपराध पुनः नहीं दोहराएंगे।
हम सही रूप से कार्य करें और ‘‘कर्म के नियम‘‘ को समझे। प्रत्येक कार्य के लिए समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है। जीवन मे कुछ प्राप्त करने के लिए आपको कुछ करना होगा, कुछ त्यागना होगा। हमें एकाग्रचित होना चाहिए। जानना चाहिए कि क्यांे बच्चे एकाग्रचित नहीं हो पाते। उन्हें अपना उद्देश्य निर्धारित करना सिखाना होगा। उनकी रूचि का ध्यान रखते हुए उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सहायता करे। जीवन एक लंबी यात्रा है – सम्पूर्ण मानव और मानव बनने के बीच। अपने बच्चों को प्रतिदिन इस दूरी को तय करने में सहायता कीजिए।

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आत्मविश्वास बढ़ता है जब आप दूसरों को प्रोत्साहित करते है।

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एक बच्चे के समान ताली बजाकर स्वयं को ऊर्जावान कीजिए। अपने आसपास के लोगों पर ध्यान दीजिए। यदि वे मुस्कुरा रहे है तो वे सभी ऊर्जावान है और यदि वे दुखी है उनमें ऊर्जा निम्नतम स्तर पर है। जब आप दुखी होते है तो आप सर्वाधिक ऊर्जा खर्च कर रहे होते हैं यह ऐसा है जैसे कि आपने मोबाइल का गूगल मैप सर्च करना शुरू कर दिया हो जिसके कारण आपको कोई दूसरी महत्त्वपूर्ण सूचना प्राप्त नहीं हो रही है तथा मोबाइल की बैट्री तेजी से खर्च होने लग गई हो।
यदि आप उच्च ऊर्जा स्तर पर जीना चाहते हैं तो एक शिशु के समान मुस्कराइए और ताली बजाइए जो एक अच्छी ध्वनि उत्पन्न करती है। ध्वनि हमारे जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ध्वनि मस्तिष्क को संदेश भेजती है और मस्तिष्क की तंत्रिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं तथा स्पंदन उत्पन्न करती हैं। इस स्पंदन से ऊर्जा उत्पन्न होती है। यदि ध्वनि प्रभावशाली नहीं है तो यह नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा जिसके कारण हमारे कार्य समुचित रूप से नहीं होंगे और यदि ध्वनि सौम्य, शक्तिशाली और सकारात्मक होगी तो यह सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगी और हमारे कार्य समुचित रूप से होंगे। हमारे आस-पास जो भी अच्छा कार्य हो रहा हो उसे प्रोत्साहन देने के लिए ताली बजाना ना भूलें।
आइए! हम प्रतिदिन अपना मूल्यंाकन स्वयं करंे तभी हम महान् कार्य कर सकंेगे। स्वयं का आकलन स्वयं कीजिए और अपने जीवन में ईमानदारी को स्थान दीजिए। स्वप्न लीजिए और स्वप्न पूर्ण करने हेतु कठिन परिश्रम कीजिए। आइए हम समय व्यर्थ न करें। कार्य के समय कार्य करें और खेल के समय खेले। आलोचना बंद करे और परिस्थितियों को बिना दूसरों को दोष दिए स्वीकार करें। स्वयं, अपने माता-पिता और अपने गुरूजनों पर विश्वास करें और उन्हे लगातार धन्यवाद देने का भाव बनाएं।

 

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भय से मुक्ति कैसे पाएँ ?

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भौतिक शरीर अत्यन्त शक्तिशाली है किन्तु आपके अनुसार कौन अधिक शक्तिशाली है-हमारा मस्तिष्क या शरीर ?
जब आपके समक्ष कोई प्रश्न रखा जाता है तब आपको उसका ज्ञान होता है। इसलिए परीक्षा के समय आप अधिक सचेत हो जाते हैं और इस दौरान पूरे वर्ष की अपेक्षा अधिकाधिक सीखते हैं और परीक्षाकाल के अतिरिक्त अन्य समय में पढ़ी गई अध्ययन सामग्री की अपेक्षा अधिक याद कर पाते हैं।
इस दौरान हम 60.70 % सीखा गया ज्ञान प्रभावी रूप से कंठस्थ (memorise) रख पाते हैं क्योंकि हमारा मस्तिष्क अत्यधिक शक्तिशाली है और आप उस दौरान एकाग्रचित होते हैं।
मस्तिष्क अत्यन्त शक्तिशाली उपकरण है किन्तु हम अपने मस्तिष्क को बहुत ही आरामदायक स्थिति में रखते हैं । यदि हम अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित करे तो यह कई चमत्कार कर सकता है। यह सम्पूर्ण शरीर को निर्देशित करता है। आप अपने मस्तिष्क की सहायता से अद्भुत चमत्कार कर सकते हैं। अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने हेतु आपको सही दिशा में सोचना होगा। जैसे ही आप अपने मस्तिष्क में एक विचार प्राप्त करते हैं आप सोचना शुरू कर देते हैं जैसे ही आप सोचते है आपमें भावनाएँ उत्पन्न होती हैं और यह भावना स्पन्दन उत्पन्न करती है जो ऊर्जा उत्पन्न करता है। यदि मस्तिष्क सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करता है तो अंततः आप सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करेंगे और इसके फलस्वरूप आप सकारात्मक रूप से आवेशित होंगे और यह आपके कार्यो में भी प्रतिबिम्बित होगा। आपके विचार, क्रिया (action) उत्पन्न करते हैं और बार-बार होने वाली क्रियाएँ हमारी आदतों का निर्माण करती है। अपनी आदतों को देखिए जो आपके स्वभाव (attitude) का निर्माण करती हैं। इस स्वभाव के कारण भाग्य का निर्माण होता हैं। इस तरह हम ही अपने भाग्य के निर्माता हैं।
अपने विचारों को महत्त्व दीजिए और प्रतिदिन एक सकारात्मक विचार लिखिए। उस विचार का अनुभव कीजिए। प्रत्येक सुबह तथा रात को सोने से पूर्व उसे जोर से पढ़िए तभी आपको बुरे स्वप्न से मुक्ति प्राप्त होगी और एक आनन्ददायक सुबह के साथ दिन का आविर्भाव होगा। इससे एक अच्छी मनःस्थिति का निर्माण होगा।
हममें से प्रत्येक के पास एक मस्तिष्क है किन्तु सबकी विभिन्न मनोस्थितियाँ है। मस्तिष्क एक hardware है और मनःस्थिति एक software है जो अधिक महत्त्वपूर्ण है। साॅफ्टवेयर को श्रेष्ठ बनाने हेतु आपको एक समुचित विचार रखना होगा। शरीर के लिए भोजन आवश्यक है और सकारात्मक ऊर्जा ही मस्तिष्क का भोजन होती है।
प्रतिदिन अच्छे विचार न केवल लिखें अपितु दूसरों के साथ बाँटे भी । जितना आप बाँटेंगे यह आपके ऊपर उतना बेहतर प्रभाव डालेंगे। इस प्रकार यह आपके साॅफ्टवेयर अर्थात् मनोस्थिति पर स्थायी प्रभाव डालेगा।
यह विचार प्रबंधन (management) हमारे जीवन का श्रेष्ठ उपकरण है। जो हम देखते है वह हमारे मस्तिष्क में जाता है और कार्यो में कुछ समय बाद प्रतिबिम्बित होता है। अतः कुछ क्षण के लिए आइए कुछ अच्छा सोचे और गायत्री मंत्र का समुचित अर्थ समझते हुए उच्चारित करें। आपके प्रत्येक कर्मो के पीछे एक सही कारण या तर्क होना चाहिए। जब आप अपने तर्क का प्रयोग करते है तो आप एक अच्छा भाव एवं अच्छी ऊर्जा उत्पन्न कर पाते हैं।
ॐ भू र्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमही
धियो योनः प्रचोदयात्।

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एक आध्यात्मिक व्यक्ति कैसे बना जाएं ?

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प्रत्येक दिन और प्रत्येक पल एक उत्सव है। यदि आप वर्तमान का आनन्द ले रहे हैं तो यही जीवन जीने का उचित तरीका है। हम इस प्रवृत्त्ति को अपने जीवन में कैसे विकसित कर सकते हैं। एक आध्यात्मिक व्यक्ति कैसे बना जाए जो कि शांति का अनुभव कर सके और सुख की प्राप्ति कर सके। प्रत्येक मनुष्य को एक दिन जाना होगा। कोई भी अमर नहीं है। यह जीवन का सबसे बड़ा सत्य है कि एक दिन हमें यह संसार त्यागना होगा फिर भी हम पूरे समय अनेक कार्यो में लिप्त रहते हैं।
यहां कई लोग हैं जो अपने जीवन का मूल्य कम आंकते हैं और जीवन का आनन्द नहीं ले पाते हैं। कई लोग ऐसे हैं जिन्हें प्रार्थना करना और अच्छी बाते सुनना व्यर्थ कार्य लगता है।
यदि मैं यह कल्पना करूं कि आज यह मेरे जीवन का अन्तिम दिन है तो मैं अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ बेहतर करने का प्रयास करूंगा। यह दृष्टिकोण आपको आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करेगा।
आप प्रातः काल धन्यवाद दे सकते हैं क्यों कि आज आप जीवित एवं स्वस्थ है। आप कह सकते है ‘‘हे परमात्मा – कोटि-कोटि धन्यवाद क्योंकि आज मैं इस दिन का आनन्द ले सकता हूँ। मैं सम्पूर्ण जगत को देख सकता हूँ। आज मैं अपने भाग्य (destiny) को बदल सकता हूँ‘‘। आप ईश्वर को इसलिए भी धन्यवाद दे सकते है क्यों कि आपके प्रिय लोग आज आपके समक्ष जीवित हैं। ऐसा हो सकता है, एक दिन आपके परमप्रिय आपके साथ न रहे। उस दिन आपको समझौता करना होगा और उस हानि को स्वीकार करना होगा। अतः आज आपके पास ईश्वर के समक्ष कृतज्ञ होने का पर्याप्त कारण है क्योंकि आपके प्रिय लोग सुरक्षित हैं और स्वस्थ हैं।
आप कितनी बार सोचते हैं कि आपके समक्ष कुछ अच्छा होगा या आप कोई अच्छा समाचार या नई वस्तुएँ प्राप्त करेंगे तो आप प्रसन्न होंगे किन्तु यह पूर्णतः गलत है। आपकी प्रसन्नता किसी बाह्य परिस्थिति पर निर्भर नहीं करती। प्रसन्नता आपके भीतर निवास करती है। यह आपकी प्रवृत्ति पर निर्भर करती है कि आप जीवन को किस प्रकार स्वीकार करते हैं।
सही समय पर उचित कार्य कीजिए। ‘‘कार्य के समय कार्य कीजिए और खेल के समय खेलिए। सुनने के समय मात्र सुनिए। एक समय में एक ही कार्य कीजिए। वे लोग मूर्ख होते है जो सुनने के समय समय बोलते है जब कि उस समय उन्हें सुनना ही चाहिए। सुनने की क्रिया आपको तर्कशक्ति (reasoning) प्रदान करती है।
बुद्धिमान व्यक्ति ही दूसरों को सुनते हैं। जब कि मूर्ख व्यक्ति सोचते हंै कि उन्हे किसी परामर्श की आवश्यकता नहीं है। हम ध्यान क्रिया (meditation) द्वारा एक शांतिपूर्ण जीवन प्राप्त कर सकते है। चलिए आंखे बंद कर उचित लय में ‘‘ú‘‘ का उच्चारण (chant) करते हैं। आज यह महसूस करते हंै कि ऊर्जा हमारे पैर के अंगूठे से शीर्ष की ओर बह रही है, हमारे संपूर्ण शरीर को सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण कर रही है।
इस प्रकार जीवन अद्भुत हो जाता है और आप प्रसन्नता का अनुभव करते है। आप अपने चारों ओर प्रसन्नता का संचार कर सकते है।

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प्रत्येक दिन को उत्सवपूर्ण कैसे बनाएं ?

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धन्यवाद कहने का प्रयास करे, दृढ़तापूर्वक तीन बार धन्यवाद कहें, कारण के साथ धन्यवाद कहें, कार्य आरम्भ करने से पूर्व धन्यवाद कहें, कार्य के समापन पर धन्यवाद कहें। इस तरह आप धन्यवादी बने।
रविवार अर्थात सूर्य का दिवस। सूर्य अथाह ऊर्जा का स्रोत है। जब सूर्य चमकता है तो अंधकार विलुप्त हो जाता है, समस्त बादलों का लोप हो जाता है। सोमवार चन्द्रमा का दिन है। चन्द्रमा सौम्यता का परिचायक (symbol) है। चन्द्रोदय के साथ ही भीषण गर्मी शीतलता में रूपान्तरित (transform) हो जाती है। यदि आपको इस कला का भान है तो आप अपने प्रत्येक क्षण को, प्रत्येक दिवस को स्वयं उत्सवपूर्ण बना सकते हैं। बस आप प्रतिपल व प्रतिदिन धन्यवाद देते जाएँ।
ताली बजाकर स्वयं को ऊर्जावान बनाएँ। रविवार अर्थात सकारात्मकता (positivity) और सकारात्मकता तभी बढ़ती है जब आप प्रतिपल कृतज्ञ (thankful) हों।
धन्यवाद कहने का प्रयास करंे ? दृढ़तापूर्वक तीन बार धन्यवाद कहें, सकारण कार्यारम्भ से पूर्व तथा कार्य के समापन पर धन्यवाद कहें। निष्चित रूप से यह धन्यवाद देने का सही तरीका है क्योंकि इससे आपको बेहतर अनुभव होगा।
यदि आप इस कला को स्वीकार कर लेते है तो प्रतिदिन रविवार होगा। आप प्रत्येक दिन का आनन्द लेंगे और प्रतिपल प्रत्येक कार्य में आनन्द का अनुभव करेंगे। इसी प्रकार कृतज्ञता (gratitude) की प्रवृत्ति विकसित कीजिए।
यदि नौकरी करने वाले सभी व्यक्ति अपने नियोक्ता को धन्यवाद दे तो वह अधिक उल्लास एवं दक्षता के साथ सकारात्मक कार्य करेगा। सभी सम्बन्ध इसी प्रवृत्ति से मधुर और सुदृढ़ होगें। आपकी कृतज्ञता से ही आपको अच्छे और दृढ़ सम्बन्ध प्राप्त होंगे। यदि आप अपने जीवन में इन छोटी छोटी बातों को महत्त्व देंगे तो बड़े मूल्यों व खुशियों की प्राप्ति होगी।

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इगो फ्री कैसे रहें ?

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मनुष्य में आत्मसम्मान का भाव कभी-कभी स्वयं को आदर देने की अपेक्षा अंहकार (ego) को उत्पन्न कर देता है। सबसे बड़ा रोग ‘अभिमान‘ ही है। इस रोग की न कोई चिकित्सकीय जांच (medical test) संभव है न ही चिकित्सा विज्ञान (medical science) के पास कोई उपचार। अन्य सभी रोगों जैसे -टाइफाइड, बुखार, मलेरिया आदि की चिकित्सकीय जांच एवं औषधीय उपचार संभव है परन्तु जो अहंकार नामक रोग से ग्रसित है उन्हें अपनी इस समस्या का आभास ही नहीं है। यही समस्या है जो आपको ज्ञान के समीप नहीं आने देती । वास्तव में यदि समस्या स्पष्ट होती है तो समाधान भी संभव है परन्तु इस अहंकार की समस्या का निवारण बहुत ही मुश्किल है। तो फिर समाधान कैसे प्राप्त हो ? इस समस्या के चलते आप कई बार क्रोध, अवसाद (depression) या चिड़चिड़ेपन (irritation) से ग्रसित हो जाते है।
यदि आप वास्तव में इस समस्या की पहचान करना चाहते है तो यह देखो कि आपके निकटतम संबंधी जो आपको सबसे प्रिय हो, वह आपमें कोई गलती या कमी इंगित करे तो क्या आप क्रोधित और चिड़चिड़े हो जाएंगे इससे आपको पता चल सकता है कि आप अहंकार की समस्या से ग्रसित है।
आपका अहंकार आपको किसी की नहीं सुनने देगा। यदि आपको यह आभास हो जाए कि कौन बोल रहा है ? किस उद्देश्य (intention) से बोल रहा है और वह क्यों आपकी कमी को इंगित कर रहा है तो आप इसे सहज एवं धैर्यवान होकर सुनेंगे और अहंकार से मुक्त हो सकेंगे।
यदि आप एक अच्छे श्रोता नहीं है तो आप ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। यदि आप अपने नियोक्ता (employer) को ठीक से नहीं सुनते तो आप कोई अच्छी नौकरी नहीं कर पाएंगे। वास्तव में अपने स्वयं के विचारों को सम्मान देना ही अहंकार है और दूसरों के विचारों को भी सम्मान देना स्वाभिमान है।
अभिमान का तात्पर्य खुद को मान देना
स्वाभिमान का तात्पर्य दूसरों को मान देना।
जब आप दूसरों की सुनते हैं और दूसरों के विचारों को सम्मान देते हैं तो आपको सही मायने में ज्ञान की प्राप्ति होती है। दुर्भाग्यवश जो दूसरों की नहीं सुनते वे ट्रायल एंड एरर (trial & error) पद्धति से ही सीख पाते हैं।
उचित होगा कि हम अपने शिक्षकों से सीखेँ, शिक्षकों को धन्यवाद दे ताकि उनसे सदैव सीखा जा सके। अन्यथा शिक्षक आते रहेंगे और जाते रहेंगे परन्तु आप ज्ञान की प्राप्ति कभी नहीं कर पाएंगे। जब आप शिक्षकों के प्रति कृतज्ञ होते है तभी आप सुनने की योग्यता धारण करते हैं।
यदि आप सोचते हैं कि आप हमेशा सही हैं तो आप ‘अहम्‘ की समस्या से ग्रसित है और किसी से कुछ नहीं सीख सकते। उचित होगा कि आप अपनी अहंकार की प्रवृत्ति की समस्या को पहचाने तभी इस समस्या का समाधान प्राप्त होगा। अहंकार मुक्त जीवन जीने का प्रयास करें साथ ही अच्छे श्रोता बनने का प्रयास करें

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अपने अवचेतन मन(subconscious mind)को पहचानिए

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maan

हमें प्रातःकाल अपने माता-पिता एवं गुरूजनों का अभिवादन करना चाहिए परन्तु इसके लिए जरूरी है कि हमारा अभिवादन करने का तरीका सर्वोतम हो। हमारे चेहरे पर एक सुन्दर मुस्कान हो और हम उसी मुस्कान के साथ उन्हें विशिष्ट तरीके से “Good Morning” बोले। हम सभी उस परमपिता परमेश्वर की संताने है जिनके जीवन में उस ऊर्जा का संचार हो रहा है जिसका केन्द्र वह ईश्वर ही हैं। परन्तु क्या हम उस ऊर्जा का सही प्रयोग कर पा रहे है या नहीं ? वास्तविक रूप से हमें इस ऊर्जा का इस्तेमाल सही दिशा में करना होगा। इसके लिए हमें अपने अवचेतन मन (subconscious mind) को अधिक पॉवरफुल बनाना होगा। यह हमारे मस्तिष्क का लगभग 90% है। हम प्रतिदिन केवल अपने चेतन मन (conscious mind) के 10% मस्तिष्क को ही काम में लेते है।
हमारा अवचेतन मन सभी प्रकार की चुनौतियों को साहसपूर्वक स्वीकार करता है और पहले ही उसके परिणाम हमारे मस्तिष्क पटल पर दर्शा देता है। गलत कार्यो के लिए यह मन मस्तिष्क को कभी भी स्वीकृति नहीं देता। अतः आवश्यक है कि हम इस 90% मस्तिष्क का बेहतर उपयोग करना सीखे।
जीवन जीना भी एक कला है। जीवन में ऊर्जा के साथ-साथ उत्साह व उमंग होनी चाहिए। कई बार हमारे सामने ऐसे मुकाम आते है जब हमें कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे पड़ाव में हम दो राह पर आ जाते है। हमारे पास दो ही रास्ते होते है, या तो हम चुनौतियों का स्वीकार करते हुए उनका निडरतापूर्वक सामना करे और या फिर भयभीत होकर या पीठ दिखाकार वहाँ से भाग जाए। जीवन में अगर हम समृद्धि चाहते है तो सबसे पहले जरूरी है कि हम अपने भीतर सच्ची लगन (Burning desire) को उत्पन्न करें। कार्य करने का जज्बा लाए और कुछ बड़ा सोचे क्यों कि बड़ी सोच से ही व्यक्ति बड़ा बनता है। इसके लिए शुरूआत करे छोटे कदमों से क्यों कि मंजिल बहुत दूर है। अपने लक्ष्य को पाने के लिए सही रणनीति (strategy) अपनाए। बड़ी सोच रखे और पूरी तन्मयता के साथ अपने कार्य को सम्पन्न करें। सच्चा विश्वास ही आपको आपके लक्ष्य तक ले जाएगा। आप ही बनेंगे इस समाज के आदर्श जो कि इस समाज में कुछ नया बदलाव ला सकेंगे। जरूरत है एकाग्रचितता की और परिवर्तनोन्मुखी बनने की।
दूसरी ओर हमेशा देने की भावना रखे लेने की नहीं। हम जितना दूसरों को देंगे उतना ही हमारे पास वापस लौटकर आएगा। स्वार्थ की भावना से दूर होकर हम दूसरों का और अपना भला कर सकते है। आइए हम अपनी पहचान स्वंय करे कि हम कितने सही है और हमारी ताकत क्या है और कमजोरियाँ क्या है? इनको परखें। हमारी यही ताकत हमारे परिवार, समाज, प्रदेश व राष्ट्र में जरूर कुछ क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगी। तो लक्ष्य ज्यादा दूर नहीं है। जरूरत है कि हम अपने अवचेतन मन (subconscious mind) का कुशलता से इस्तेमाल करना सीखे।

 

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गणेशजी सफलता की प्रतिमूर्ति है।

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safalata

किसी भी कार्य को करने से पूर्व हम गणेश जी की पूजा-अर्चना करते हैं। इसके पीछे उद्देश्य होता है कि वह कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न हो सके। हमारा बिजनेस, जॉब, कैरियर, रिलेशनशिप एवं हेल्थ सभी को हम उचित प्रकार से प्रगतिशील बना सके। हम चाहते है कि हम प्रतिदिन तरक्की करते रहे।
गणेशजी सफलता की प्रतिमूर्ति (symbol) है। उनके शरीर का प्रत्येक अंग हमें एक प्रेरणात्मक संदेश देता है जैसे-
1 विशाल कर्ण (Large Ears) – विशाल कर्ण हमें सिखाते है कि हम किसी भी बात को अधिक ध्यान से सुने और उसके सारांश को ग्रहण करें जिससे कि हम सही निर्णय ले सके और संतुलित जीवन का निर्वहन करें।
2 विशाल मस्तक (Big forehead) – गणेश जी बड़ा मस्तक हमें विशाल सोच रखने के लिए संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि हम हमेशा बड़ी सोच रखे। संकुचित सोच से हमारे विचार भी संकुचित हो जाते है। अत‘ हमारी विस्तृत सोच ही हमें ऊँचाइयों के मुकाम तक पहुँचा सकती है।
3 हाथ (Hands)- गणेश जी दायाँ हाथ कर्मनिष्ठ बनने के लिए अभिप्रेरित करता है। इसके साथ हमें आशीर्वाद भी देता है कि हम जो भी कर्म करें या जो भी उद्यम करें उसमें सफल अवश्य होवे। गणेशजी का बायाँ हाथ जिसमें लड्डू हैं वह कर्म के प्रतिफल को दर्शाता है अर्थात् हमें कर्म का प्रतिफल जो भी मिले उसे हम सहृदय ग्रहण करें।
4 सूंड (Trunk)- सूंड हमें सजग रहने का ज्ञान देती है आस-पास जो भी कुछ हो रहा है, उसके प्रति हम हमेशा जागृत रहे यानि पूरी सजगता (awareness) के साथ जिए।
5 विशाल उदर (Large Stomach) – गणेश जी का विशाल उदर सहनशीलता को दर्शाता है। हम हर अच्छी व बुरी बात को ग्रहण करना सीखे। बुरी बातों को स्वंय के भीतर ही डाइजेस्ट करें। हम सहनशील बने। दूसरों की बुराई न करके उनसे अच्छा लेने के लिए तत्पर रहें। सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश है कि हम विपत्तियों से घबराएं नही और अच्छी व बुरी दोनों ही प्रकार की परिस्थितियों में संतुलित बने रहे।
6 एक दंत (One tusk)& – गणेश जी का एक दंत यह सिखाता है कि हम बाहरी सुन्दरता को महत्त्व न दे बल्कि आंतरिक सुन्दरता यानि मन की सुन्दरता को पहचाने। अगर मन सुन्दर होगा तो हमारे विचार भी पॉवरफुल बनेंगे और विचारों के प्रभाव से हमारे भीतर जो ऊर्जा उत्पन्न होगी वही हमारे चेहरे को अधिक ऊर्जावान व सुन्दर बनाएगी।
7 सुक्ष्म नेत्र (Small eyes) – सुक्ष्म नेत्र प्रतीक है एकाग्रता का अर्थात हम एकाग्रचित होना सीखे। अपने कार्य को करते समय दूरदर्शी भी बने।
8 सवारी चूहा (Mouse) – गणेश जी का वाहन चूहा भी प्रतीक है सक्रियता का । हम सदैव जीवन के हर क्षेत्र में सक्रिय एवं फुर्तीले बने रहें।
तो आइए हम भी सफलता के प्रतीक एवं आदर्श स्रोत के रूप में आराध्य देव गणपतिजी के संदेश को अपनाए और सकुशलता इसका पालन करे। हम सभी एक इस मंत्र का उच्चारण करें।
‘‘वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभः
निर्वघ्नं कुरू मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।
गणेशजी सफलता की प्रतिमूर्ति है।

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