स्टीफन हॉकिंगः युवाओं के रोल मॉडल

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ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी में अहम योगदान प्राप्त, 12 मानद डिग्रियों और अमेरिका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान प्राप्त स्टीफन हॉकिंग भले आज इस दुनिया में ना रहे हो लेकिन आज के युवाओं के लिए आत्ममंथन और प्रेरणा के लिए स्पष्ट पदचिन्ह छोड़ गए। 21 वर्ष की आयु में डॉक्टर्स ने हॉकिंग को बता दिया था कि उन्हें मोटर न्यूरोन नामक लाइलाज बीमारी है और उनके पास जीने के लिए दो-तीन साल शेष बचे हैं। आज हम में से किसी के साथ ऐसा हो जाए तो सम्भवतरू सिर्फ दो वर्ष भी जीना असंभव हो जाए परन्तु स्टीफन हॉकिंग ने 55 वर्ष मोटर न्यूरोन बीमारी को ही नहीं हराया बल्कि वो सब कारनामे कर डाले जो किसी भी इंसान की सर्वोच्च उपलब्धि कही जा सकती है। आज भी हम अपने जीवन में सामान्य समस्याओं से घबरा जाते हैं। स्टीफन की लगभग सभी मांसपेशियों से उनका नियंत्रण खो चुका था और वो अपने गाल की मांसपेशियों के जरिए अपने चश्में पर लगे सेंसर को कम्प्यूटर से जोड़कर ही बातचीत कर पाते थे। हमारे सामने सवाल इस बात का नहीं होता है कि हमारे पास कौन-कौन सी शारीरिक और मानसिक दुर्बलताएं है बल्कि सवाल इस बात का है कि हम सब लोग अपनी कितनी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का उपयोग कर पाते हैं। वास्तव में हम सभी लोग अपनी इन क्षमताओं का 5 प्रतिशत भी उपयोग नहीं करते, शायद हम तो यह भी नहीं जानते कि हर कार्य कर्म नहीं होता सिर्फ वहीं कार्य कर्म होता है जो चौतन्यता यानि होश में किया जाए। हमारें ज्यादातर काम या तो दोहराव है या फिर भीड़ का अनुसरण। हमें उन सब तरीकों की खोज करनी होगी जिनके आधार पर हम जीवन के हर क्षण प्रेरित रह सके और जीवन को एक बड़े लक्ष्य से जोड़ सके। मानव जाति का विकास चुनौतियों के कारण ही तो हुआ है फिर आज हम चुनौतियों से क्यों घबरा जाते हैं। इस माह स्टूडेंटस परीक्षाओं में व्यस्त हैं मैं उन्हें ये सलाह देना चाहता हूॅ कि परीक्षाओं की तैयारी में सबसे बड़ी बाधा बार-बार उन परीक्षाओं से प्रत्याशित परीणामों को सोचने के कारण होती है। आप सभी अपना पूरा ध्यान कर्म पर लगाए ताकि आपकी अनमोल क्षमताओं का आपके लक्ष्य को प्राप्त करने में सही- सही उपयोग की जा सके। मैं आपसे यह आग्रह करता हूं कि परीक्षाओं के दिनों में प्रतिदिन सुबह १५ मिनट एकाग्रता को बढ़ाने के लिए मेडिटेशन भी करे।

आज महिला सशक्तिकरण की बात की जा रही है जबकि हम सभी जानते है कि महिलाएं मानसिक रूप से पुरूषो से अधिक शक्तिशाली होती हैं। स्टीफन हॉकिंग द्वारा भी अपनी मानसिक क्षमताओं का ही उपयोग किया गया था।

इन दिनों मैंने श्रीमद्भगवद गीता का गहनता से अध्ययन किया। मैनें पाया कि श्रीमद्भगवद गीता जो कि १८ अध्याय में विभक्त है और इसमें कुल ७०० श्लोक श्रीकृष्ण, अर्जुन, संजय और धृतराष्ट्र के द्वारा कहे गये है। यह पुस्तक हमारे जीवन में उठ रहे तनाव और अवसाद को कम कर हमारी निर्णायक क्षमता को बढ़ा देती है। जो अवसाद आज से लगभग 5150 वर्ष पूर्व अर्जुन को थे कमोवेश उसी प्रकार के तनाव और अवसाद आज हम सभी के जीवन में भी है। जब हम तनाव मुक्त होकर अपने लक्ष्य पर ध्यान लगाते है तो हमें ना सिर्फ बड़ी सफलताऐं मिलती है बल्कि हमारी निर्णय क्षमता बढने के साथ-साथ हमें प्रसन्नता की अनुभूति भी होती है।

मैं बड़े ही हर्ष के साथ लिख रहा हूं कि श्रीमद् भगवद् गीता पर 18 अध्याय का कार्यक्रम तैयार किया गया है। जिसे आज के परिप्रेक्ष्य में बड़ी आसान और सरल भाषा में शीघ्र ही टीवी पर प्रसारित और यूटयूब पर अपलोड करने जा रहा हूं।

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व्यक्ति समाज के लिए या समाज व्यक्ति के लिए

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स्वार्थ, स्वार्थ, स्वार्थ चारों तरफ स्वार्थपरक दुनिया बनती जा रही है। जिसको देखो येन केन प्रकारेण सबको पैसा चाहिए, प्यार चाहिए लेकिन सिर्फ अपने लिये, दूसरों को देने के लिये उनके पास न प्यार है न पैसा। स्वार्थ की धुन में कुछ लोग इतने डूब जाते हैं कि उन्हें सही-गलत का फर्क ही पता नहीं रहता। यह लोग गलत तरीकों का इस्तेमाल करके देश की जनता का पैसा लूटते हैं, जैसे कि नीरव मोदी। इनकी कंपनी ने पंजाब नेशनल बैंक के साथ धोखाधड़ी करके 11,300 करोड़ रुपए का घोटाला किया है। जिसके लिए बैंक के कर्मचारियों की मिलीभगत से गलत तरीके से लेटर ऑफ अंडरटेकिंग को दिखाकर आयात के नाम पर पैसा लिया गया। लेटर ऑफ अंडरटेकिंग एक प्रकार की गारंटी होती है जो जारी करने वाला बैंक अपने ग्राहक के लिए लेता है जिसको आधार मानकर दूसरा बैंक ग्राहक को पैसे दे सकता है।
वहीं स्वार्थपूर्ण प्रेम का एक दुखद वाकया अभी जयपुर में देखने को मिला जिसमें वेलेंटाइन डे पर निकाह नहीं करने पर एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका पर तेजाब डाल दिया। यह कैसा प्रेम है जहां सिर्फ पाने की ललक है? लगता है ये समाज किस दिशा जा रहा है?
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या ऐसे समाज में हमारी आने वाली पीढिय़ा रह पाएंगी? लोग क्यों सिर्फ अपना ही भला चाहते हैं चाहे उसके लिए उन्हें कोई गलत काम ही क्यों न करना पड़ जाए। बहुत गहराई से सोचने पर हमने जाना कि इन सारे सवालों का जवाब श्रीमद्भभगवद गीता में दिया गया है। इंसान शरीर रुपी रथ से चलता है और इस स्थूल शरीर रथ को चलाती हैं हमारी इंद्रियं जो रथ के घोड़े समान है और इन इंद्रियों को चलाता है हमारा ‘मन’ जो इन सारी समस्याओं का कारण भी है। इसलिए कहा भी गया है मन के मते न चलिये मन के मत अनेक। इंसान का मन ‘मोह’ के कारण राग द्वेष में फंसा रहता है। मन हमेशा स्वयं पर केंद्रित रहता है, यह हमेशा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए इंद्रियों को अपने प्रिय विषयों की ओर खींचता रहता है।
आज समाज में धर्म की समझ खत्म होती जा रही है, शायद क्योंकि अब धर्मपरक शिक्षा व्यवस्था नहीं रही, और परिवार के सदस्यों को छोटे बच्चों को धर्म का अर्थ समझाने का समय नहीं मिल रहा है। कारण जो भी हो लेकिन आज समाज से धर्म का हृास होता जा रहा है और यह एक स्वार्थपरक समाज बनता जा रहा है जहां लोगों को जो पसंद है बस वो चाहिए चाहे उसके लिए कुछ भी गलत रास्ता अपनाना पड़े।
इंसान को आज समझना होगा कि अपने हित से पहले हमें परिवार का हित देखना चाहिए और परिवार के हित से पहले गांव का हित देखना चाहिए और गांव के हित से पहले देश का हित। अगर हम ये जानना चाहते हैं कि हमारा कोई भी कर्म धर्म के अनुसार है या नहीं तो हमें यह देखना होगा कि वह समाज हित में है या नहीं। वेदों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सूत्र वाक्य कई हजार साल पहले दे दिया था जिसका भाव था सारी पृथ्वी को अपने परिवार की तरह मान कर चलो, हम सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
कुछ ही दिनों में होली आने वाली है हमने पहले भी कहा है कि बुराई, भ्रष्टाचार और बेईमानी की होली जलनी चाहिए, तो आइये इस बार ”स्वार्थ’ की होली जलाएं।
इसी के साथ आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ…

Dr. Sanjay Biyani

 

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समाज में आर्थिक खुशहाली के लिए एन्टरप्रेन्योर्स को बढ़ावा दिया जाना बहुत ही आवश्यक है

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नरसिम्हा राव सरकार के कार्यकाल के दौरान वर्ष 1991 में एक समय आया था, जब भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह कर्ज में डूब कर दिवालियेपन की दिशा में पहुंच चुकी थी। सरकार के पास देश का सोना गिरवी रखकर ऋण लेेने के सिवाय, कोई भी रास्ता नहीं बचा था। इसका प्रमुख कारण सेवा व उद्योग जैसे क्षेत्रों में सरकारी दखलअंदाजी व लाइसेंस प्रणाली थी। उस वक्त नरसिम्हा राव सरकार द्वारा उदारीकरण की नीति अपनाकर सरकारी दखलअंदाजी व लाइसेंस प्रणाली को समाप्त किया गया था। हम सभी जानते हैं कि टेलीकम्यूनिकेशन, इंश्योरेंस व एजुकेशन के क्षेत्र में लाइसेंस राज कम करने से सेवा क्षेत्र में बहुत बड़ा सुधार व इंफ्रास्ट्रक्चर गत दशक में तैयार हो गया है। हम सभी यह भी जानते हैं कि हर जागरूक व्यक्ति अपने बच्चों को निजी स्कूल व कॉलेज में ही पढ़ाना चाहता है और इसी तरह जब स्वास्थ्य की बात आती है, तो भी हर व्यक्ति निजी क्षेत्र के अस्पतालों का ही रूख करता है। बावजूद इसके सरकारी तंत्र समय-समय पर शिक्षा, चिकित्सा और व्यापार आदि क्षेत्रों में हस्तक्षेप करके निजी क्षेत्र के लिए एक नकारात्मक वातावरण तैयार करता ही रहता है। हाल ही में इसके कई उदाहरण देखने को मिले हैं। इनमें सबसे पहला उदाहरण मैैक्स अस्पताल का लाइसेंस रद्द किया जाना रहा। किसी एक डॉक्टर की लापरवाही की सजा समस्त स्टेकहोल्डर को दिया जाना किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री को यह समझना चाहिए कि सरकार एक फे सीलिटेटर के रूप में कार्य करती है, ना कि डिक्टेटर के रूप में। इस सम्बन्ध में मैक्स अस्पताल को सुनवाई का अवसर दिए बिना यह कदम उठाना किसी भी प्रकार से उचित नहीें है। इसी प्रकार की घटना दिल्ली स्थित रेयॉन स्कूल के साथ भी देखी गई थी। रेयॉन स्कू ल की कुल १८६ शाखाएं देश में कार्यरत हैं। किसी एक शाखा में हुई दुर्घटना के लिए डायरेक्टर को दोषी मानते हुए कार्यवाही किया जाना किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीें कहा जा सकता।

हाल ही में राजस्थान सरकार के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा निजी कॉलेजों की फीस तय करने का फैसला लिया जा रहा है। सभी कॉलेजों के संसाधन व गुणवत्ता भिन्न-भिन्न है, ऐसे में एक समान फीस किस प्रकार तय की जा सकती है? वैसे भी सरकार प्रदेश के ३५००० निजी स्कूलों की फीस पर लगाम कसने में अब तक असफल साबित हुई है। इस तरह की दखलअंदाजी से ना सिर्फ एन्टरप्रेन्योर हतोत्साहित होते हैं, बल्कि सरकारी तंत्र में भी भ्रष्टाचार पनपने लगता है। आवश्यकता इस बात है कि सरकार, एन्टरप्रेन्योर्स को सुविधा व मार्गदर्शन प्रदान करने वाली संस्था के रूप में काम करे। समाज में आर्थिक खुशहाली के लिए एन्टरप्रेन्योर्स को बढ़ावा दिया जाना बहुत ही आवश्यक है। किसी एक घटना या किसी एक पक्ष को जानकर निर्णय लिया जाना उचित नहीं है। निजी शिक्षण संस्थाएं व निजी अस्पताल आज भी बेहतरीन सेवाएं देने के साथ-साथ नियामक संस्थाओं से जुझते रहते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में इन क्षेत्रों को जनता के द्वारा सहज तौर पर ही नियन्त्रित किया जाना चाहिए।

प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ…
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आपके जीवन में आपके नाम का क्या महत्त्व है ?

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बहुत समय से मैं इस विषय पर रिसर्च करता आ रहा हूँ कि आदमी के जीवन में उसके नाम का क्या महत्त्व है और उनके नाम के अनुसार उनका व्यक्तित्व कैसा है ? मैंने पाया कि जिसका जो नाम है लगभग -लगभग उसका व्यक्तित्व एक लंबे समय बाद वैसा ही बन जाता है। जरा सोचे कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण क्या है ? इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है कि ‘शब्द शक्ति है‘, ‘शब्द ऊर्जा है‘ और यह शक्ति और ऊर्जा जब किसी के लिए बार-बार दोहराई जाती है तो वह एक वाइब्रेशन लेकर आती है। वह वाईब्रेशन एक एनर्जी को जन्म देती है और वह एनर्जी जब किसी के पास आती है तो वह शब्द एक शेप लेकर संरचित हो जाते है और धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व में वह रूपान्तरण होने लगता है इसलिए लोग दुःशासन नाम नहीं रखना चाहते, दुर्योधन नाम नहीं रखना चाहते। सभी लोग सकारात्मक और बेहतरीन नाम रखना चाहते है, क्यांकि एक लम्बे समय बाद पूरे समाज को यह बात समझ आई कि नामकरण संस्कार एक बहुत बड़ा संस्कार है और नाम का जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है। नाम के अनुसार ही हमारा व्यक्तित्व बन जाता है। जब भी हम किसी को पुकारते है, आवाज देते है या बुलाते है तो उसका अपना नाम उसके ऊपर थ्रो किया जाता है और नाम के प्रभाव से वो बच नहीं सकता है क्योंकि वह एनर्जी एक दिशा में प्रसारित कर दी गई है और उस एनर्जी के अनुसार सामने वाले का व्यक्तित्व एक शेप लेता है । इसलिए जो भी शब्द बोले, सोच समझकर बोले क्योंकि शब्द ही तो ब्रह्म है, शब्द ही तो चेतना है, शब्द ही तो शक्ति है। इसलिए अगर गाली भी बोले तो जरा सोच-समझकर बोले क्योंकि उसकी एनर्जी के प्रभाव से ना आप बच पाएंेगे ना सामने वाला। नाम का प्रभाव आपके व्यक्तित्व पर कितना हुआ है यह आपकी उम्र पर भी निर्भर करता है आपकी उम्र बढ़ने के साथ-साथ आपके नाम को पुकारने की संख्या भी बढ़ती रहती है और जैसे-जैसे यह आवृति बढ़ती है उस नाम से सम्बन्धित एनर्जी आपमें उतरने लगती है और आपका व्यक्तित्व बहुत हद तक आपके नाम के अनुसार हो जाता है।

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क्या प्रेम करना अपराध है ?

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आज के हजारों साल पहले चन्द्रगुप्त ने अपने गुरू चाणक्य से एक सवाल किया था मुझे धनानन की पुत्री से प्रेम हो गया है, क्या प्रेम करना गुनाह है ? तब से लेकर आज तक यह सवाल हर किसी के जेहन में बार-बार आता है। आधुनिक युग के बायॅफ्रेंड/गर्लफ्रेंड कल्चर में यह सवाल लगभग हर युवा के मन में रहता है। इन दिनों कई युवाओं ने मुझसे भी यह सवाल किया। उनका पूछना था कि क्यों हमारे घरवाले हमें प्रेम करने से रोकते है ? क्या प्रेम ताकत नहीं है ? क्या प्रेम एनर्जी नहीं है ? क्या प्रेम जीवन नहीं है ? प्रेम करना चाहिए या नहीं करना चाहिए ?
उस समय चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को जवाब दिया -चन्द्रगुप्त, तुम्हारे जीवन में अखण्ड भारत का महान लक्ष्य रख दिया गया है। इसलिए प्रेम में समय गंवाना कदाचित उचित नहीं है। इस जवाब की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है। अर्थात् अगर आपके जीवन में कोई महान लक्ष्य है, तो फिर उस लक्ष्य से प्रेम कीजिए फिर आपको सब छोटे लगने लगेगे। अभी जीवन में लक्ष्य का छोटा होना या लक्ष्य का ना होना इस तरह के उन्माद पैदा करता है। अगर वास्तव में आप बिना लक्ष्य के जीवन बिताना चाहते है तो मैं कहूंगा कि प्रेम कीजिए, बाॅयफ्रेंड बनाइए, गर्लफ्रेंड बनाइए। लेकिन हर चीज की एक उम्र होती है। जब हम युवावस्था में हो अर्थात 25 वर्ष की उम्र में हो तो उस समय तो सबसे महत्त्वपूर्ण यही है कि हम अपने लक्ष्य से प्रेम करें। प्रेम किसी व्यक्ति से ही हो यह जरूरी नहीं है। प्रेम तो सजीव या निर्जीव किसी वस्तु से भी किया जा सकता है प्रेम ही तो दुनिया की ताकत है।
प्रेम करना अपराध नहीं है लेकिन गलत वक्त पर गलत फैसला लेकर उसे प्रेम का नाम देना अपराध है।
अगर आपके जीवन में आपने कोई लक्ष्य तय कर लिया है, अगर आप आई.ए.एस, आर.ए.एस, सी.ए या डाॅक्टर बनना चाहते हे तो सबसे पहले अपने लक्ष्य से प्रेम करें। यही आपको शक्तिशाली बनाएगा, यही आपको महान् बनाएगा। ये फैसला आपके हाथ में है कि जीवन लक्ष्य से जीना है या बिना लक्ष्य के । अगर जीवन लक्ष्य के साथ जीना है तो निश्चित रूप से अपने लक्ष्य से प्रेम करें।

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भारतीय राजनीति में योगी विचारधारा की आवश्यकता

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योगी कौन होता है ? योगी उसे कहा जाता है जो सांसारिक प्रपंचों को छोड़ कर अपना जीवन किसी एक विचार के लिए समर्पित कर देता है चाहे वो ईश्वर प्राप्ति का विचार हो, आत्म साक्षात्कार करने का विचार हो या ब्रह्म को जान लेने का विचार हो। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि योगी के जीवन का एक निश्चित लक्ष्य होता है जिसे प्राप्त करने के लिए वो कठोर स्व-अनुशासन का पालन करता है और घर परिवार का भी त्याग करने को तैयार हो जाता है।
अब बात आती है कि आखिर राजनीति में योगी विचारधारा की क्या आवश्यकता है ? सही मायनों में राजनीति एक बहुत बड़ा समाज सेवा का कार्य है जिसमे नेता को समाज के विकास और सामाजिक समस्याओं के निवारण के उद्देश्य से कार्य करना होता है । भारतीय समाज अनेकता में एकता वाला समाज है जहां तरह-तरह की सामाजिक समस्याएं भी रोज सामने आती रहती हैं । इन समस्याओं का समाधान करने के लिए भारत की जनता द्वारा 545 लोकसभा सांसद, 245 राज्य सभा सदस्य और लगभग 4120 विधानसभा सदस्यों को चुना जाता है । इन 4,910 व्यक्तियों के हाथों में सवा सौ करोड़ देशवासियों वाले इस अति विशाल परिवार को सही दिशा में ले जाने का जिम्मा होता है।
अब यह समझना जरूरी हो जाता है कि एक सामान्य इंसान जो 5-7 सदस्यों वाले अपने छोटे से परिवार को संभालने में इतना उलझा रहता है कि उसको परिवार के अलावा कुछ सोचने का समय ही नहीं मिल पाता है तो ये 4,910 व्यक्ति अपने निजी परिवार और व्यापार के साथ इतने विशाल देश को संभालने का समय कहां से निकाल पाते होंगे ?
पार्ट टाइम राजनीति की वजह से देश के विकास कार्यों की गति धीमी रह जाती है । क्यूंकि राजनेता का पूरा ध्यान उसके असली कार्य समाजसेवा में न होकर भिन्न-भिन्न कार्यों में बंटा रहता है इसलिए परिवारवाद और भाई-भतीजावाद भी राजनीति पर हावी रहता है, जिसके चलते राजनेता सिर्फ अपना, अपने परिवार का और अपने प्रिय लोगों का ही भला करने की सोचते रहते हैं। उनको यह सोचने का समय ही नहीं मिलता कि उनको पूरे देश को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।
ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि क्या इतने विशाल देश में ऐसे 5,000 काबिल आदमी भी नहीं हैं जो एक योगी की तरह, सिर्फ और सिर्फ इस देश को चलाने के लिए अपना तन-मन और धन सब अर्पण कर सकें? एक योगी कि तरह अपने परिवार, व्यापार, रिश्तेदार का त्याग कर के 24 घंटे सिर्फ और सिर्फ देश के विकास के लिए जुट जाए। इतिहास गवाह रहा है कि वही राजनेता देश को आगे ले जाते हैं जो समाज को अपने देवता की तरह पूजते हैं, समाज के दर्द को अपना दर्द समझ कर उसे दूर करने में जुटे रहते हैं। चाहे कलाम साहब का उदाहरण ले लीजिये या अटल बिहारी बाजपेयी जी की बात करिये और वर्तमान में योगी आदित्यनाथ हों या मोदी जी इन सबके जीवन में एक समानता मिलेगी और वो है ‘योगी विचारधारा’। इनके जीवन में समाजसेवा के अलावा और कोई कार्य ही नहीं और शायद इसीलिए अपने कार्यों के बल पर इन्होने लोकप्रियता के उस ऊंचे मुकाम को प्राप्त किया जो अद्भुत है। एक लक्ष्य, एक विचार और उसके प्रति जीवन को समर्पित कर देना यही आज राजनीति की आवश्यकता है। आज राजनीति को ऐसे लोग चाहिये जिनके पास 24 घंटे सिर्फ एक ही काम हो और कोई काम ही न हो जो उनका ध्यान भटका सके। जब तक पार्ट टाइम राजनेता का समय परिवार और व्यापार में उलझा रहता है तब तक भ्रष्टाचार की भी संभावना बनी रहती है, जैसे ही राजनेता परिवार और व्यापार के झंझट से निकल जाता है तब उसे सिर्फ अपना असली काम दिखता है। हमें पूरा विश्वास है कि इस राजनीति के कीचड़ को अगर साफ किया जा सकता है तो वो योगी विचारधारा के व्यक्तियों को राजनीति में आगे बढ़ा कर ही किया जा सकता है क्यूंकि सिर्फ एक सच्चा योगी ही ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ की विचारधारा पर चलकर सारे समाज को अपना परिवार मानता हुआ, अपने जीवन को समाज कार्य में अर्पित कर सकता है। प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ….

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कर्म का फल एक दिन अवश्य भुगतना होता है।

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क्या आपने कभी सोचा है कि कभी-कभी जब आप कोई कार्य करना नहीं चाहते तो भी आपको कौनसी शक्ति ऐसा करने हेतु बाध्य करती है? मेरे विचारानुसार, यह कर्म का नियम है जो हमें समस्त कार्य स्वेच्छा से या कभी-कभी अनिच्छा से करने हेतु बाध्य करता है। कर्म के नियम से कोई मुक्त नहीं रह सकता। दुर्योधन ने भी कहा था, ‘‘मैं कर्म के सिद्धान्त का सार जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि क्या सही है और क्या गलत, किन्तु फिर भी मैं अज्ञात शक्तियां द्वारा कर्म करने हेतु बाध्य किया जाता हँ‘‘ कर्मयोग से बचने के लिए यहाँ संसार में कोई साधन नहीं है साथ ही हम अपने किए हुए कर्म को कही नहीं छिपा सकते है।
एक बार एक राजा ने अपने तीनों पुत्रों की परीक्षा लेने का विचार किया। इस हेतु उसने तीनों को एक-एक तोता दिया और कहा कि अपने-अपने तोते को ऐसी जगह ले जाकर मारो, जहाँ ऐसा करते हुए आपको कोई नहीं देख सके और आकर सूचित करो। कुछ समय पश्चात् दो पुत्र वापस आए और कहा कि उन्होनें तोतों को वहाँ मारा जहाँ कोई उन्हें नहीं देख रहा था। किन्तु तीसरा पुत्र अपने जीवित तोते के साथ ही लौटा।
राजा ने आश्चर्यपूर्वक पूछा कि क्या तुम्हें एक भी स्थान ऐसा नहीं मिला, जहाँ तुम स्वयं को मिली चुनौती को पूर्ण कर पाते, उसने कहा, ‘‘नहीं पिताजी, जब मैं गुफा में गया तब वहाँ कोई नहीं था, मात्र अँधेरा था, किन्तु वहाँ भी मुझे तोते की चमकती हुई आँखें दिखाई दे रही थी, जो मुझे देख रही थी।
इस कहानी से तात्पर्य है- ‘‘आप अपने कर्मफल से नहीं बच सकते। आप जहाँ भी जाते हैं, जो कुछ भी करते हैं, आपके कर्म ही आपको शांतिपूर्वक देख रहे होते हैं। किसी भी दिन आपको आपके कर्म का फल पृथ्वी पर वहन करना ही होता है।
आइए! अपने कर्मफल का आनन्द लें। आइए! अच्छे कर्म करें। समस्याओं एवं दुःख की परिस्थिति में अन्य को दोष न देकर अपने कर्म फल को स्वीकार करें।
भविष्य, हमारे भूतकालीन कार्यों का परिणाम ही है। आज हम हमारे बीते हुए कल के कर्मों का फल वहन कर रहे हैं। परन्तु हम अच्छे कार्य करके, अच्छा सोेचकर तथा मानवता की सेवा करके, बुरे कर्मो के प्रभाव को परिवर्तित कर सकते हैं।
अच्छे कार्य करते रहिए और दूसरों से शुभकामनाएँ प्राप्त करते रहिए, यही कर्म के नियम का समाधान है।

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चाणक्य के मूल्यवान सिद्धान्त

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महान विद्वान चाणक्य ने कुछ मूल्यवान सिद्धान्त दिए थे जो कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के अच्छे मार्गदर्शक सिद्ध होंगे। आइए! आज हम चाणक्य के कुछ बहुमूल्य सिद्धान्तों की चर्चा करते है और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करते हैं।
प्रथम सिद्धान्त- संघर्ष में विजय प्राप्ति हेतु आपके लिए आवश्यक है –
1 दृढ़ संकल्प
2 पहले से ही पूर्णतः तैयार हो जाना
3 इच्छा शक्ति जो किसी भी संघर्ष में विजयी होने के लिए अपरिहार्य एवं पर्याप्त साधन है।
दूसरा सिद्धान्त- सफलता प्राप्ति हेतु आपके लिए आवष्यक हैः-
4 चमत्कारिक शब्दों में आस्था रखना। किन्तु दूसरों के मत या बातों में बिना विचारे विष्वास मत कीजिए पवित्र ग्रंथों या गुरूओं के द्वारा ऐसा ही बोला गया है। केवल उसी पर विश्वास कीजिए जो आपने अनुभव किया है, जो तार्किक है, जो आपके द्वारा पूर्ण परीक्षित है और जो मानवता के लाभार्थ हो और जो अधिक लोगों के लिए प्रसन्नता ला सकें।
जीवन में प्रसन्नता अत्यंत आवश्यक है। यदि यह सिद्धान्त सार्वभौमिक रूप से श्रेष्ठ है तो यह अवष्य स्वीकार किया जाना चाहिए।
तीसरा सिद्धान्त- विफलता के भय से मुक्ति पाने हेतु आपके लिए आवष्यक है-
5 एक अच्छी योजना का निर्माण और अपनी योजना पर पूर्ण विष्वास रखना। यदि योजना श्रेष्ठ है तो निर्णय भी श्रेष्ठ होगा। तीव्र आस्था और समर्पण से युक्त श्रेष्ठ योजना असंभव को संभव में रूपान्तरित कर सकती है। आषावादी प्रत्येक परिस्थिति में संभावना ढ़़ँूढ़ लेता है। निराषावादी प्रत्येक परिस्थिति में विफल होता है। सफलता और विफलता व्यक्त्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। आइए! अपनी शक्ति का पूर्ण प्रयोग करें। आइए! संभावनाआंे से युक्त बनं।
श्रेष्ठ विचारों के द्वारा हम श्रेष्ठ कार्य कर सकते हैं। एक श्रेष्ठ षिक्षक कई विद्यार्थियोें में परिवर्तन ला सकता है। एक उचित शैक्षिणिक वातावरण के लिए हमें रचनात्मक बनना चाहिए। श्रेष्ठ विचार ही हमारे लिए श्रेष्ठ वातावरण का निर्माण करते हैं। हम चाणक्य के समान एक आत्मविष्वासी षिक्षक बन सकते हैं और अपने षिक्षण को प्रभावी बना सकते हैं, यदि हम निम्नलिखित बातें अपने जीवन में अपनाते हैं-
 शिक्षण की समुचित तकनीक अत्यंत महत्वपूर्ण है।
 पाठ्य सामग्री पहले से ही समुचित रूप से तैयार कर लेनी चाहिए।
 शिक्षण प्रक्रिया में परिवर्तन हेतु उचित पद्धति अत्यंत आवश्यक है।
 आपका अपने विषय पर प्रगाढ़ नियंत्रण हो।
 आप आत्मविष्वास से युक्त हो।
 आप में साहस और अधिकारपूर्वक ज्ञान वितरण करने की पूर्ण क्षमता हो।
 आपके विचार मौलिक हों जिन्हें रचनात्मक रूप से समझना संभव हो।
श्रद्धा अत्यंत शक्तिषाली है। यदि आप स्वयं को एवं अपने विद्यार्थियों को जानते हैं तो आप अपना शत प्रतिषत दे पाएंगें। विद्यार्थियों की मानसिकता को समझना अतिआवष्यक है। चाणक्य उन महान षिक्षकों में से एक है, जिन्होंने अपने षिष्यों को प्रभावी व आत्मविश्वासपूर्वक ज्ञान व निर्देषन प्रदान किया। हम उनके सिद्धांतों से सीखकर एक सफल षिक्षक बन सकते है। षिक्षक संपूर्ण समाज को रूपांतरित कर सकते है। यह संभव है यदि हमारे मस्तिष्क के प्रयोग द्वारा आत्मविष्वासपूर्वक अधिकाधिक ज्ञान का उद्भव हो। षिक्षकों में उत्साह, इच्छा शक्ति और दिए गए पाठ्यक्रम से अधिक प्रदान करने की मंषा होनी चाहिए।

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योग चैतन्य अवस्था में जीने का मार्ग है।

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योग जीवन को सरल और खुशहाल बनाने का महत्त्वपूर्ण साधन है। हम दैनिक जीवन में योगक्रिया अपनाकर मानसिक रूप से प्रसन्न और शारीरिक रूप से स्वस्थ रह सकते हैं। आइए! आज योग दिवस पर स्वयं के लिए तीन वचन लेते हैं-
1. हम प्रातःकाल कम से कम 2 ग्लास पानी पिएंगें।
2. हम प्रतिदिन सुबह 3 से 5 मिनट व्यायाम करके प्राणायाम करेंगें।
3. हम कुछ समय प्राकृतिक वातावरण में छत पर, पार्क में अवष्य व्यतीत करेंगे और ईष्वर को इस शुभ दिन के लिए धन्यवाद देंगे।
मेरे अनुभव के अनुसार, मैं आपको आष्वस्त करता हूँ कि यह सब करने के बाद आपका एक भी दिन नकारात्मक नहीं जाएगा। योग का तात्पर्य है ‘जुड़ना’- अपनी आत्मा का परम आत्मा से जुड़ना, पूर्ण चेतना के साथ कार्य करना। सदैव चैतन्य अवस्था में रहने के कारण एक योगी किसी के साथ कभी बुरा व्यवहार नहीं कर सकता। अतः चैतन्य प्राप्ति हेतु स्वयं के लिए समय निकालिए। योगी बनिए, स्वयं से प्रेम कीजिए। यदि आप स्वयं से प्रेम करेंगे तो आप दूसरों से प्रेम कर पाएंगें। आप दूसरों की निःस्वार्थ सेवा कर पाएगें। अतः सादा जीवन अपनाइये जिससे आपके विचार स्वतः ही उच्च हो जाएंगे और दूसरों की निःस्वार्थ सेवा कर पाएंगे। याद रखिए, योग हमें सिखाता है- ‘‘सादा जीवन उच्च विचार’’। आइए! योग को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएँ।

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अध्यापन एक सरल कार्य नहीं है।

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आइए! हम कुरूक्षेत्र के दृष्य को याद करते हैं, जहाँ संसार के परम गुरू श्री कृष्ण एक अनुभवी व्यक्त्ति दुर्योधन को समझाने और सिखाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास करते हैं, परंतु पूर्णतः सफल नहीं हो पाते। श्री कृष्ण कुंती, गांधारी और धृतराष्ट्र को भी समझाने में सफल नहीं हो पाए।
यही वर्तमान में हमारे साथ भी हो रहा है, जब हम दूसरों को समझाने का प्रयास करते हैं, किन्तु सफल नहीं हो पाते हैं। न तो हम उन्हें समझा पाते हैं, न हम इस असफलता का कारण समझ पाते हैं।
अतः प्रष्न यह उठता है कि हम हमारे समक्ष उपस्थित व्यक्त्ति को क्यों नहीं समझा पाते हैं और वह व्यक्त्ति समझने में क्यों सक्षम नहीं होता। यह समझना अति आवष्यक है और दूसरों को समझाना भी। किन्तु दोनों ही अत्यंत कठिन कार्य हैं। आप देखेंगें कि एक बीज को उगने के लिए उपयुक्त वातावरण आवष्यक होता है। एक बीज को बोने का एक उचित समय होता है। जब बीज को विषेष तापमान, प्रभावषाली वातावरण, समुचित जल की उपलब्धि होती है तभी वह अंकुरित होंगा और एक वृक्ष के रूप में अभिवृद्ध होगा। बीज बोने के बाद यदि अत्यंत भारी वर्षा हो जाती है तो यह संपूर्ण बीज को नष्ट कर देगी। इस स्थिति में क्या करना चाहिए? हमें उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए और तब तक प्रयास करते रहना चाहिए जब तक हम उचित वातावरण प्राप्त नहीं कर लेते।
अध्यापन एक सरल कार्य नहीं है। यह अत्यंत चुनौतीपूर्ण और कठिन कार्य है। अध्यापकों को न केवल पुस्तक से बल्कि स्वयं एक उदाहरण बनकर पढ़ाने एवं सिखाने के लिए निरन्तर प्रयास करना चाहिए। अध्यापकों से विद्यार्थी प्रेेम ओर स्नेह की अपेक्षा करते हैं। वे अध्यापक के मात्र आंतरिक सौन्दर्य की प्रषंसा करते है और उसी से सीखते भी हैं।
एक षिक्षक अपने स्नेहपूर्ण एवं संरक्षणपूर्ण व्यवहार से आकर्षक बनता है न कि बाह्य रूप से। सौंदर्य आंतरिक होता है, यदि आप आंतरिक रूप से अच्छे हैं तो यह आपकी अच्छी प्रवृति को दर्षाता है। इसीलिए 70 वर्ष की आयु में भी आपके दादा-दादी का व्यक्तित्व आपको बहुत आकर्षक लगता है।
इसी कारण पूर्व राष्ट्रपति प्रो. अब्दुल कलाम आजाद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मदर टेरेसा जैसे महान व्यक्तित्व भी हमारी दृष्टि में सुंदर हैं क्योंकि ये सभी विनम्रता से परिपूर्ण हैं। किसी महान व्यक्ति का आंतरिक सौंदर्य हमें अत्यधिक ऊर्जावान एवं सकारात्मक बना देता है। इस आंतरिक सौंदर्य को कैसे विकसित किया जाए? इसका एक ही तरीका है -‘धन्यवाद‘ कहना । जितनी बार जितने अधिक लोगोें को आप धन्यवाद कह सके, कहिये और अपने मन को सुंदर बनाइये। जब कभी आप महसूस करें कि आपकी गलती है तुरन्त ‘क्षमा मांगिए। कभी-कभी तब भी क्षमा मांगिए जब आपने कुछ भी गलत नहीं किया। आपका ‘क्षमा’ शब्द (Sorry) जीवन की कई समस्याएं सुलझा सकता है। यह आपको अधिक विनम्र बनाएगा। यह आपके व्यक्तित्व को अधिक गरिमामय बनाएगा और आपके मन को सौंदर्य प्रदान करेगा।
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