छठा अध्यायः आत्मसंयम योग – श्रीमद्भगवद्गीता (संजय की नजर से)

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इस अध्याय में कार्यक्रम के एंकर डाॅ. संजय बियानी द्वारा बताया गया है कि यह अध्याय उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी है जिनकी उम्र 15 से 25 के बीच है। जिनका मन पढ़ाई में नहीं लगता और यह उनके प्रत्येक कार्य को प्रभावित करता है, इस अध्याय में अर्जुन और कृष्ण का संवाद आपके जीवन में बदलाव लाने वाला है। इसमें छः बिन्दुओं पर बात की गई है – योगी कौन है ? योगी कैसे सोचता है ?, योग क्रिया कैसे की जाती है ? मन क्या है ? और इसे नियंत्रित कैसे किया जा सकता है ? मन प्रशांत होने का क्या मतलब है ? श्रद्धा और योग का क्या सम्बन्ध है ? इन सभी बिन्दुओं को श्रीमद्भगवद्गीता के द्वारा डाॅ. संजय बियानी ने बहुत ही सरल तरीके से समझाया है। उन्होंने कहा है कि हम अक्सर डरते है, क्यूंकि हमारा ध्यान कर्म करने से ज्यादा फल पर रहता है। शरीर मन और इंद्रियों को योगी ही नियंत्रित कर सकता है और जब इंसान योगी बन जाता है तो वह बाहर की वस्तुओं से प्रभावित नहीं होता और कर्मयोगी हो जाता है। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से बतया है कि जब हम छोटी-छोटी बातो से ऊपर उठकर आगे बढ़ जाते है तब हम ऐसे फैसले लेने लगते है जो समाजोपयोगी हो और जिससे समाज में बदलाव आए। यही वह गीता है जो मुक्त कर देती है, प्रशांत बना देती है, कर्मयोगी बना देती है, ईश्वर से मिला देती है। इस अध्याय द्वारा आप अपने मन पर नियंत्रण करना जान सकते है। यह अत्यन्त हितकारी होगा।

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पाँचवाँ अध्यायः कर्मसंन्यासयोग – श्रीमद्भगवद्गीता (संजय की नजर से)

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इस एपिसोड जिसका नाम है ‘‘कर्मसंन्यासयोग‘‘ में कार्यक्रम के सूत्रधार डाॅ. संजय बियानी द्वारा बताया गया है कि हमारी ज्यादातर बीमारियाँ मानसिक है, जिसके लिए जरूरी है कि हम अपने मन और शरीर को जाने और जैसे हर बीमारी की कोई ना कोई दवा जरूर होती है वैसे ही हमारी समस्त मानसिक बीमारियों की भी दवा है, और वो है ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता‘‘। गीता का यह पाँचवा अध्याय उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी है जो शंाति की तरफ बढ़ना चाहते है। जो अंदरूनी तौर पर अशांत है और जिन्हें शंाति की तलाश है। इसमें उन्होंने श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच जो संवाद हुआ कि ज्ञान मार्ग एवं कर्म मार्ग के बीच कौनसा श्रेष्ठ मार्ग है, इसकी भी व्याख्या की है। इस अध्याय में योगी कौन है ? ब्रह्मविद् कौन है ? सुख और आनन्द में क्या अन्तर है ? अपनी एकाग्रता किस प्रकार बढ़ाए ? इन सभी की व्याख्या श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से बहुत ही सरल तरीके से की है। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से यह समझाया कि संसार में बार-बार आने का कारण सुख और इच्छाएँ ही तो है क्यों कि सुख की प्राप्ति इच्छाओं से होती है। यदि हम योगी बने तो हमें आनन्द मिलेगा और यह आनन्द ही हमें आगे ले जायेगा। इसमें डाॅ. संजय बियानी श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से हम सभी को ‘‘स्थितप्रज्ञ‘‘ होने को कहते है। जिससे हमारे जीवन में हमें परमानंद की प्राप्ति होती हैं । यदि आप कोई कार्य करना चाहते है और आपका उसमें मन नहीं लग रहा, आप एकाग्र नहीं हो पा रहे हंै तो यह एपिसोड आपकी मदद करेगा और आपको एक अद्भुत अहसास कराएगा।

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चौथा अध्यायः ज्ञानकर्मसन्यास योग – श्रीमद्भगवद्गीता (संजय की नजर से)

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श्रीमद्भगवद्गीता
(संजय की नजर से)
चौथा अध्यायः ज्ञानकर्मसन्यास योग
सांख्य योग में ज्ञान की बात हुई तो कर्म योग में शरीर की बात हुई, शरीर से कर्म कैसे किया जाए और बुद्धि से ज्ञान मार्ग पर कैसे चला जाए इसे जाना, लेकिन अब ईश्वर को जानना जरुरी है। क्योंकि अर्जुन का सवाल था कि मैं ईश्वर को क्यों मानू। इस अध्याय में ईश्वर का परिचय, ईश्वर के आने का कारण, स्वभाव, सहित आठ बातों पर चर्चा की गई है। आइए एक बार फिर इस यात्रा पर चले और जाने चौथे अध्याय- ज्ञानकर्मसन्यास योग को।
अर्जुन अभी भी संशय में है क्योंकि वो युद्ध नहीं करना चाहता क्योंकि उसे ईश्वर का परिचय नहीं है। ये समस्या सिर्फ अर्जुन की नहीं है बल्कि हम सब लोगों की भी है। वे लोग जो व्यवसाय करना चाहते है, जो जिन्दगी में कुछ बड़ा करना चाहते है उन सबके सामने ये समस्या आती है कि वे किसी काम को क्यों और कैसे करंे। जबकि ये कितनी अच्छी बात है कि जब तक हमारें सामने समस्या नहीं आती तबतक अनुभव नहीं होता और तब तक ज्ञान नहीं बढ़ता। आइए अपने ज्ञान को और अधिक बढ़ाए।
इस अध्याय में जिस बात पर चर्चा की गई है उसमें पहला बिन्दु है ईश्वर का परिचय- श्रीकृष्ण कहते है देखो अर्जुन सबसे पहले यह ज्ञान मैनें सूर्य को दिया, सुर्य ने मनु को, मनु ने ईक्ष्वाकु को। लेकिन समय के साथ यह ज्ञान भुला दिया गया। अब एक बार फिर मैं यह ज्ञान तुमको दे रहा हूं इसे गुप्त रखना। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा ऐसा क्यों तब श्रीकृष्ण ने कहा कि यदि ज्ञान किसी समझदार व्यक्ति को दिया जाएगा तो वह उसे समाज के निर्माण में लगाएगा और यदि ज्ञान किसी अज्ञानी को दिया जाए तो वह विनाश कर सकता है। इस प्रकार जब श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना परिचय दे रहे है तो अर्जुन एक बार फिर संशय में पड़ जाते है कि आप तो मेरे भ्राता और मित्र की तरह है, फिर मैं ये कैसे मान लू कि आप ईश्वर है। इसके जवाब में श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते है कि अर्जुन तुम्हे लगता है कि ये तुम्हारा पहला जन्म है जबकि इससे पहले तुम्हारे कई जन्म हो चुके है लेकिन तुम्हे अपने जन्मों का बोध नहीं है, परंतु मुझे है। मुझे लगता है कि हिन्दू धर्म में जो आत्मा की बात की गई है वह बहुत ही तार्किक है क्योंकि यदि कर्म और फल में कोई संबंध नहीं होता तो यह चक्र कैसे चलता।
गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि हम आत्मा है और बहुत सदियों से चले आ रहे है, लेकिन अर्जुन अभी भी परेशान है और तब वह दूसरा प्रश्न पूछता है कि आपके आने का कारण क्या है? तब भगवान श्रीकृष्ण उसे जवाब देते है कि जब-जब धर्म की हानि होती है, जब-जब समाज में अराजकता बढ़ती है तब-तब मैं जन्म लेता हूं। अर्जुन फिर ईश्वर के स्वभाव के बारे में पूछते है तब भगवान जवाब देते है कि ईश्वर का स्वभाव एक बच्चे जैसा है जिसे अपने कर्म के फल से आसक्ति नहीं होती है। कर्म और सन्यास की चर्चा करते हुए श्रीकृष्ण कहते है कि कर्म श्रेष्ठ तब बनता है जब वह फल की इच्छा किए बिना किया जाए। पंडित के बारें में चर्चा करते हुए श्रीकृष्ण कहते है कि पंडित वो है जो ज्ञान की खोज कर रहे है जिससे समाज को सही ज्ञान दिया जा सके। श्रद्धा के बारें में बताते हुए श्रीकृष्ण कहते है कि जो भी कर्म श्रद्धा के साथ किया जाता है वह सफल होता है। आखिर में श्रीकृष्ण यज्ञ की बात करते हुए कहते है आप अपने अर्जित धन में से दान जरुर करे। इस अध्याय में यज्ञ को चार भागों में बांटा गया है-
1. द्रव्य यज्ञ- अर्जित धन को दान देना।
2. तप यज्ञ- व्यक्ति मेहनत करके जो दान करता है।
3. योग यज्ञ- ध्यान लगाना और अंतःरस को प्राप्त करना।
4. ज्ञान यज्ञ- ज्ञान की अग्नि से कर्म बंधन को भस्म करना।
इस अध्याय में ज्ञान के दान को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। मैं आपको उदाहरण से समझाता हूं। शिक्षक को अपने शिष्यों को ऐसा ज्ञान देना चाहिए जिससे वे श्रेष्ठ बने और समाज की प्रगति में अपना योगदान दे सके। हम फिर मिलेंगे और अगले अध्याय में कर्म सन्यास योग की चर्चा की जाएगी।
क्रमशः

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तीसरा अध्याय- कर्म योग – श्रीमदभगवदगीता (संजय की नजर से)

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श्रीमदभगवदगीता
(संजय की नजर से)
तीसरा अध्याय- कर्म योग
श्रीमद्भगवद्गीता का तीसरे अध्याय हमें अपने जीवन की कई समस्याओं का हल जानने में मदद करता है।
किसी काम को करने में हम सफल क्यों नहीं होते।
हमें उसे करने का तरीका मालूम नहीं होता। ये ऐसे प्रश्न है जो हमारे सामने आते हैं।
ऐसे ही प्रश्न आज से लगभग 5000 साल पूर्व अर्जुन को परेशान करते थे, जिसका उत्तर उन्हें श्रीकृष्ण से मिला। अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते है कि मेरा कर्म क्या है मुझे युद्ध क्यों करना चाहिए। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उनका कर्म बताते हुए कहा कि जब हम किसी काम को आरंभ करते है तो हमें यह नहीं पता होता कि उस काम को करने का सही तरीका क्या है। किसी लक्ष्य को पाने के लिए उसका सही रास्ता मालूम होना आवश्यक है और सही रास्ते का चयन तभी किया जा सकता है जब हमारा स्वयं से परिचय होगा, यानि हमें अपनी शक्ति का अहसास होगा। श्रीकृष्ण कहते है कि कर्म करो किन्तु अनासक्ति के साथ अर्थात फल की इच्छा किए बगैर किया गया कर्म सदेव सफल होता है।
किसी काम करते समय हमारा मन विषय में फंस जाता है जिस कारण राग और द्वेष पैदा होता है। राग यानि लगाव और द्वेष यानि ईर्ष्या। और इन दोनों ही परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है, जिसका सीधा असर हमारें लक्ष्य पर पड़ता है। अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते है कि राग और द्वेष से कैसे बचा जा सकता है। तब श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि जो काम अनास्क्त होकर किया जाए वहीं श्रेष्ठ है।
आज के परिप्रेक्ष्य में बात की जाए तो इस समय समाज की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार इसलिए है क्योंकि हमारें जनप्रतिनिधि स्वयं को समाज से बड़ा मान लेते है और अपना हित साधने के लिए जनता का नुकसान करते है। वहीं अगर हर जनप्रतिनिधि अपना कर्म अनासक्त भाव से करे तो स्वस्थ समाज का निर्माण किया जा सकता है।

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श्रीमद् भगवद् गीता संजय की नज़र से प्रथम अध्याय : अर्जुन विषाद योग

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अक्सर हम सभी लोग दो सवालों के जवाब ढूंढा करते हैं। मुझे लगता है ये सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण है। पहला सवाल है- मैं कौन हूं? और दूसरा सवाल है- मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? जब इन दोनों सवालों का जवाब मिल जाता है, तो मन में शांति आती है, खुशियां आती हैं। हम सभी को जीवन में कई निर्णय लेने होते हैं और निर्णय लेना ही सबसे बड़ी ताकत है। एक सही निर्णय आपको जीवन में कहीं भी पहुंचा सकता है। निर्णय लेने की यह कला तब आती है, जब हमारे पास इन दोनों सवालों के जवाब होते हैं।

मुझे लगता है श्रीकृष्ण ऐसे हैं जिन्होंने अपने मनुष्य अवतार में सभी दु:खों को देखा। एक ऐसा इंसान, जिसका जन्म कैदखाने में होता है, एक ऐसा इंसान जो ग्वाले के रूप में अपना बचपन व्यतीत करता है, एक ऐसा इंसान जो अपने मामा से बहुत कम उम्र में ही युद्ध करना पड़ता है, एक ऐसा इंसान जो राजा बनता है और एक ऐसा इंसान जो ज्ञान की पराकाष्ठा तक पहुंचता है।

अगर आप अपने भीतर छिपी हुई प्रतिभा को सामने लाना चाहते हैं। जीवन में प्रबंधन करना चाहते हैं, एन्टरप्रेन्योर बनना चाहते हैं, एक सफल इंसान बनना चाहते हैं या अपने रिश्तों को बखूबी निभाना चाहते हैं तो श्रीमद् भगवद् गीता आपके लिये बहुत उपयोगी रहेगी।

श्रीमद् भगवद् गीता- अध्याय प्रथम (अर्जुन-विषाद योग)

अर्जुन को विषाद है, अर्जुन को दु:ख है। हमारे जीवन में भी दु:ख आता है, तभी ज्ञान आता है। वे सभी लोग कभी ज्ञानी नहीं बन पायेंगे जिनके जीवन में विषाद न हो। अर्जुन के विषाद के कारण ही उसे अद्भुत ज्ञान की प्राप्ति हुई। अगर आपके जीवन में दु:ख है, तो आपको प्रसन्न हो जाना चाहिये। क्यूंकि अब ज्ञान समझ आ जायेगा। ज्ञान है तो सबके पास लेकिन समझ कुछ ही लोगों को आता है।

शंखनाद के बीच… युद्ध का भयंकर दृश्य… हर तरफ बलशाली योद्धा… अर्जुन श्रीकृष्ण को कहते हैं, ‘कृष्ण, मुझे दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करो, ताकि मैं सभी को देख सकूं।’ क्यूंकि कृष्ण आज सारथी हैं इसलिए कृष्ण इस बात को समझ कर रथ को दोनों  सेनाओं के बीच लाकर खड़ा कर देते हैं। अर्जुन जैसे-जैसे चारों तरफ देखने लगते हैं, विषाद की तरफ बढऩे लगते हैं। भीष्म पितामह, जिनसे अर्जुन ने शिक्षा ली थी, आज वही अर्जुन के विपक्ष में उससे युद्ध करने के लिए खड़े हैं। द्रोणाचार्य, जो अर्जुन के शिक्षक रहे, आज उनके सामने तीर-कमान लेकर खड़े हैं। अर्जुन का अपना परिवार, उनके मामा, चाचा, पुत्र…उन्हें दिखाई देने लगते हैं और जैसे-जैसे वे यह दृश्य देख पाते हैं, विषाद में आते जाते हैं। यह विषाद जीवन को बहुत खराब कर देता है। अर्जुन निराशा में बढ़ते जा रहे हैं। ये सब देखकर अर्जुन फि र सवाल करते हैं,‘हे कृष्ण, इन सभी को मारने के बाद, मुझे जो राज्य मिलेगा, उसका मैं क्या करूंगा? कितना विनाश होगा…कुल का नाश हो जाने पर मेरे जीवन का महत्व ही क्या रह जाएगा?

मुझे लगता है, ऐसी परिस्थितियां मेरे जीवन में भी आती हैं, हम भी सम्बन्धों के जाल में फं स जाते हैं। हम एक परिवार तक सीमित हो जाते हैं, जबकि जीवन का उद्देश्य तो अलग ही है। अर्जुन भी इसी उधेड़बुन के चलते श्रीकृष्ण से कहते हैं,‘इस युद्ध में विजय के बदले मुझे तीनों लोकों का राज भी मिल जाए, तो भी अपने परिवार को कष्ट पहुंचाने वाले इस युद्ध को मैंं नहीं करना चाहूंगा।’ ये कहकर वे तीर-कमान नीचे रख देता है। अर्जुन पूरी तरह से निराश हो चुका है। हम भी जीवन में अक्सर निराश हो जाते हैं, इसलिए हम सभी के लिए अध्याय दो से लेकर आगे की यात्रा बहुत महत्वपूर्ण होगी।

क्रमश:

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स्टीफन हॉकिंगः युवाओं के रोल मॉडल

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ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी में अहम योगदान प्राप्त, 12 मानद डिग्रियों और अमेरिका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान प्राप्त स्टीफन हॉकिंग भले आज इस दुनिया में ना रहे हो लेकिन आज के युवाओं के लिए आत्ममंथन और प्रेरणा के लिए स्पष्ट पदचिन्ह छोड़ गए। 21 वर्ष की आयु में डॉक्टर्स ने हॉकिंग को बता दिया था कि उन्हें मोटर न्यूरोन नामक लाइलाज बीमारी है और उनके पास जीने के लिए दो-तीन साल शेष बचे हैं। आज हम में से किसी के साथ ऐसा हो जाए तो सम्भवतरू सिर्फ दो वर्ष भी जीना असंभव हो जाए परन्तु स्टीफन हॉकिंग ने 55 वर्ष मोटर न्यूरोन बीमारी को ही नहीं हराया बल्कि वो सब कारनामे कर डाले जो किसी भी इंसान की सर्वोच्च उपलब्धि कही जा सकती है। आज भी हम अपने जीवन में सामान्य समस्याओं से घबरा जाते हैं। स्टीफन की लगभग सभी मांसपेशियों से उनका नियंत्रण खो चुका था और वो अपने गाल की मांसपेशियों के जरिए अपने चश्में पर लगे सेंसर को कम्प्यूटर से जोड़कर ही बातचीत कर पाते थे। हमारे सामने सवाल इस बात का नहीं होता है कि हमारे पास कौन-कौन सी शारीरिक और मानसिक दुर्बलताएं है बल्कि सवाल इस बात का है कि हम सब लोग अपनी कितनी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का उपयोग कर पाते हैं। वास्तव में हम सभी लोग अपनी इन क्षमताओं का 5 प्रतिशत भी उपयोग नहीं करते, शायद हम तो यह भी नहीं जानते कि हर कार्य कर्म नहीं होता सिर्फ वहीं कार्य कर्म होता है जो चौतन्यता यानि होश में किया जाए। हमारें ज्यादातर काम या तो दोहराव है या फिर भीड़ का अनुसरण। हमें उन सब तरीकों की खोज करनी होगी जिनके आधार पर हम जीवन के हर क्षण प्रेरित रह सके और जीवन को एक बड़े लक्ष्य से जोड़ सके। मानव जाति का विकास चुनौतियों के कारण ही तो हुआ है फिर आज हम चुनौतियों से क्यों घबरा जाते हैं। इस माह स्टूडेंटस परीक्षाओं में व्यस्त हैं मैं उन्हें ये सलाह देना चाहता हूॅ कि परीक्षाओं की तैयारी में सबसे बड़ी बाधा बार-बार उन परीक्षाओं से प्रत्याशित परीणामों को सोचने के कारण होती है। आप सभी अपना पूरा ध्यान कर्म पर लगाए ताकि आपकी अनमोल क्षमताओं का आपके लक्ष्य को प्राप्त करने में सही- सही उपयोग की जा सके। मैं आपसे यह आग्रह करता हूं कि परीक्षाओं के दिनों में प्रतिदिन सुबह १५ मिनट एकाग्रता को बढ़ाने के लिए मेडिटेशन भी करे।

आज महिला सशक्तिकरण की बात की जा रही है जबकि हम सभी जानते है कि महिलाएं मानसिक रूप से पुरूषो से अधिक शक्तिशाली होती हैं। स्टीफन हॉकिंग द्वारा भी अपनी मानसिक क्षमताओं का ही उपयोग किया गया था।

इन दिनों मैंने श्रीमद्भगवद गीता का गहनता से अध्ययन किया। मैनें पाया कि श्रीमद्भगवद गीता जो कि १८ अध्याय में विभक्त है और इसमें कुल ७०० श्लोक श्रीकृष्ण, अर्जुन, संजय और धृतराष्ट्र के द्वारा कहे गये है। यह पुस्तक हमारे जीवन में उठ रहे तनाव और अवसाद को कम कर हमारी निर्णायक क्षमता को बढ़ा देती है। जो अवसाद आज से लगभग 5150 वर्ष पूर्व अर्जुन को थे कमोवेश उसी प्रकार के तनाव और अवसाद आज हम सभी के जीवन में भी है। जब हम तनाव मुक्त होकर अपने लक्ष्य पर ध्यान लगाते है तो हमें ना सिर्फ बड़ी सफलताऐं मिलती है बल्कि हमारी निर्णय क्षमता बढने के साथ-साथ हमें प्रसन्नता की अनुभूति भी होती है।

मैं बड़े ही हर्ष के साथ लिख रहा हूं कि श्रीमद् भगवद् गीता पर 18 अध्याय का कार्यक्रम तैयार किया गया है। जिसे आज के परिप्रेक्ष्य में बड़ी आसान और सरल भाषा में शीघ्र ही टीवी पर प्रसारित और यूटयूब पर अपलोड करने जा रहा हूं।

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व्यक्ति समाज के लिए या समाज व्यक्ति के लिए

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स्वार्थ, स्वार्थ, स्वार्थ चारों तरफ स्वार्थपरक दुनिया बनती जा रही है। जिसको देखो येन केन प्रकारेण सबको पैसा चाहिए, प्यार चाहिए लेकिन सिर्फ अपने लिये, दूसरों को देने के लिये उनके पास न प्यार है न पैसा। स्वार्थ की धुन में कुछ लोग इतने डूब जाते हैं कि उन्हें सही-गलत का फर्क ही पता नहीं रहता। यह लोग गलत तरीकों का इस्तेमाल करके देश की जनता का पैसा लूटते हैं, जैसे कि नीरव मोदी। इनकी कंपनी ने पंजाब नेशनल बैंक के साथ धोखाधड़ी करके 11,300 करोड़ रुपए का घोटाला किया है। जिसके लिए बैंक के कर्मचारियों की मिलीभगत से गलत तरीके से लेटर ऑफ अंडरटेकिंग को दिखाकर आयात के नाम पर पैसा लिया गया। लेटर ऑफ अंडरटेकिंग एक प्रकार की गारंटी होती है जो जारी करने वाला बैंक अपने ग्राहक के लिए लेता है जिसको आधार मानकर दूसरा बैंक ग्राहक को पैसे दे सकता है।
वहीं स्वार्थपूर्ण प्रेम का एक दुखद वाकया अभी जयपुर में देखने को मिला जिसमें वेलेंटाइन डे पर निकाह नहीं करने पर एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका पर तेजाब डाल दिया। यह कैसा प्रेम है जहां सिर्फ पाने की ललक है? लगता है ये समाज किस दिशा जा रहा है?
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या ऐसे समाज में हमारी आने वाली पीढिय़ा रह पाएंगी? लोग क्यों सिर्फ अपना ही भला चाहते हैं चाहे उसके लिए उन्हें कोई गलत काम ही क्यों न करना पड़ जाए। बहुत गहराई से सोचने पर हमने जाना कि इन सारे सवालों का जवाब श्रीमद्भभगवद गीता में दिया गया है। इंसान शरीर रुपी रथ से चलता है और इस स्थूल शरीर रथ को चलाती हैं हमारी इंद्रियं जो रथ के घोड़े समान है और इन इंद्रियों को चलाता है हमारा ‘मन’ जो इन सारी समस्याओं का कारण भी है। इसलिए कहा भी गया है मन के मते न चलिये मन के मत अनेक। इंसान का मन ‘मोह’ के कारण राग द्वेष में फंसा रहता है। मन हमेशा स्वयं पर केंद्रित रहता है, यह हमेशा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए इंद्रियों को अपने प्रिय विषयों की ओर खींचता रहता है।
आज समाज में धर्म की समझ खत्म होती जा रही है, शायद क्योंकि अब धर्मपरक शिक्षा व्यवस्था नहीं रही, और परिवार के सदस्यों को छोटे बच्चों को धर्म का अर्थ समझाने का समय नहीं मिल रहा है। कारण जो भी हो लेकिन आज समाज से धर्म का हृास होता जा रहा है और यह एक स्वार्थपरक समाज बनता जा रहा है जहां लोगों को जो पसंद है बस वो चाहिए चाहे उसके लिए कुछ भी गलत रास्ता अपनाना पड़े।
इंसान को आज समझना होगा कि अपने हित से पहले हमें परिवार का हित देखना चाहिए और परिवार के हित से पहले गांव का हित देखना चाहिए और गांव के हित से पहले देश का हित। अगर हम ये जानना चाहते हैं कि हमारा कोई भी कर्म धर्म के अनुसार है या नहीं तो हमें यह देखना होगा कि वह समाज हित में है या नहीं। वेदों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सूत्र वाक्य कई हजार साल पहले दे दिया था जिसका भाव था सारी पृथ्वी को अपने परिवार की तरह मान कर चलो, हम सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
कुछ ही दिनों में होली आने वाली है हमने पहले भी कहा है कि बुराई, भ्रष्टाचार और बेईमानी की होली जलनी चाहिए, तो आइये इस बार ”स्वार्थ’ की होली जलाएं।
इसी के साथ आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ…

Dr. Sanjay Biyani

 

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समाज में आर्थिक खुशहाली के लिए एन्टरप्रेन्योर्स को बढ़ावा दिया जाना बहुत ही आवश्यक है

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नरसिम्हा राव सरकार के कार्यकाल के दौरान वर्ष 1991 में एक समय आया था, जब भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह कर्ज में डूब कर दिवालियेपन की दिशा में पहुंच चुकी थी। सरकार के पास देश का सोना गिरवी रखकर ऋण लेेने के सिवाय, कोई भी रास्ता नहीं बचा था। इसका प्रमुख कारण सेवा व उद्योग जैसे क्षेत्रों में सरकारी दखलअंदाजी व लाइसेंस प्रणाली थी। उस वक्त नरसिम्हा राव सरकार द्वारा उदारीकरण की नीति अपनाकर सरकारी दखलअंदाजी व लाइसेंस प्रणाली को समाप्त किया गया था। हम सभी जानते हैं कि टेलीकम्यूनिकेशन, इंश्योरेंस व एजुकेशन के क्षेत्र में लाइसेंस राज कम करने से सेवा क्षेत्र में बहुत बड़ा सुधार व इंफ्रास्ट्रक्चर गत दशक में तैयार हो गया है। हम सभी यह भी जानते हैं कि हर जागरूक व्यक्ति अपने बच्चों को निजी स्कूल व कॉलेज में ही पढ़ाना चाहता है और इसी तरह जब स्वास्थ्य की बात आती है, तो भी हर व्यक्ति निजी क्षेत्र के अस्पतालों का ही रूख करता है। बावजूद इसके सरकारी तंत्र समय-समय पर शिक्षा, चिकित्सा और व्यापार आदि क्षेत्रों में हस्तक्षेप करके निजी क्षेत्र के लिए एक नकारात्मक वातावरण तैयार करता ही रहता है। हाल ही में इसके कई उदाहरण देखने को मिले हैं। इनमें सबसे पहला उदाहरण मैैक्स अस्पताल का लाइसेंस रद्द किया जाना रहा। किसी एक डॉक्टर की लापरवाही की सजा समस्त स्टेकहोल्डर को दिया जाना किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री को यह समझना चाहिए कि सरकार एक फे सीलिटेटर के रूप में कार्य करती है, ना कि डिक्टेटर के रूप में। इस सम्बन्ध में मैक्स अस्पताल को सुनवाई का अवसर दिए बिना यह कदम उठाना किसी भी प्रकार से उचित नहीें है। इसी प्रकार की घटना दिल्ली स्थित रेयॉन स्कूल के साथ भी देखी गई थी। रेयॉन स्कू ल की कुल १८६ शाखाएं देश में कार्यरत हैं। किसी एक शाखा में हुई दुर्घटना के लिए डायरेक्टर को दोषी मानते हुए कार्यवाही किया जाना किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीें कहा जा सकता।

हाल ही में राजस्थान सरकार के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा निजी कॉलेजों की फीस तय करने का फैसला लिया जा रहा है। सभी कॉलेजों के संसाधन व गुणवत्ता भिन्न-भिन्न है, ऐसे में एक समान फीस किस प्रकार तय की जा सकती है? वैसे भी सरकार प्रदेश के ३५००० निजी स्कूलों की फीस पर लगाम कसने में अब तक असफल साबित हुई है। इस तरह की दखलअंदाजी से ना सिर्फ एन्टरप्रेन्योर हतोत्साहित होते हैं, बल्कि सरकारी तंत्र में भी भ्रष्टाचार पनपने लगता है। आवश्यकता इस बात है कि सरकार, एन्टरप्रेन्योर्स को सुविधा व मार्गदर्शन प्रदान करने वाली संस्था के रूप में काम करे। समाज में आर्थिक खुशहाली के लिए एन्टरप्रेन्योर्स को बढ़ावा दिया जाना बहुत ही आवश्यक है। किसी एक घटना या किसी एक पक्ष को जानकर निर्णय लिया जाना उचित नहीं है। निजी शिक्षण संस्थाएं व निजी अस्पताल आज भी बेहतरीन सेवाएं देने के साथ-साथ नियामक संस्थाओं से जुझते रहते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में इन क्षेत्रों को जनता के द्वारा सहज तौर पर ही नियन्त्रित किया जाना चाहिए।

प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ…
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Dr. Sanjay Biyani

 

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आपके जीवन में आपके नाम का क्या महत्त्व है ?

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बहुत समय से मैं इस विषय पर रिसर्च करता आ रहा हूँ कि आदमी के जीवन में उसके नाम का क्या महत्त्व है और उनके नाम के अनुसार उनका व्यक्तित्व कैसा है ? मैंने पाया कि जिसका जो नाम है लगभग -लगभग उसका व्यक्तित्व एक लंबे समय बाद वैसा ही बन जाता है। जरा सोचे कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण क्या है ? इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है कि ‘शब्द शक्ति है‘, ‘शब्द ऊर्जा है‘ और यह शक्ति और ऊर्जा जब किसी के लिए बार-बार दोहराई जाती है तो वह एक वाइब्रेशन लेकर आती है। वह वाईब्रेशन एक एनर्जी को जन्म देती है और वह एनर्जी जब किसी के पास आती है तो वह शब्द एक शेप लेकर संरचित हो जाते है और धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व में वह रूपान्तरण होने लगता है इसलिए लोग दुःशासन नाम नहीं रखना चाहते, दुर्योधन नाम नहीं रखना चाहते। सभी लोग सकारात्मक और बेहतरीन नाम रखना चाहते है, क्यांकि एक लम्बे समय बाद पूरे समाज को यह बात समझ आई कि नामकरण संस्कार एक बहुत बड़ा संस्कार है और नाम का जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है। नाम के अनुसार ही हमारा व्यक्तित्व बन जाता है। जब भी हम किसी को पुकारते है, आवाज देते है या बुलाते है तो उसका अपना नाम उसके ऊपर थ्रो किया जाता है और नाम के प्रभाव से वो बच नहीं सकता है क्योंकि वह एनर्जी एक दिशा में प्रसारित कर दी गई है और उस एनर्जी के अनुसार सामने वाले का व्यक्तित्व एक शेप लेता है । इसलिए जो भी शब्द बोले, सोच समझकर बोले क्योंकि शब्द ही तो ब्रह्म है, शब्द ही तो चेतना है, शब्द ही तो शक्ति है। इसलिए अगर गाली भी बोले तो जरा सोच-समझकर बोले क्योंकि उसकी एनर्जी के प्रभाव से ना आप बच पाएंेगे ना सामने वाला। नाम का प्रभाव आपके व्यक्तित्व पर कितना हुआ है यह आपकी उम्र पर भी निर्भर करता है आपकी उम्र बढ़ने के साथ-साथ आपके नाम को पुकारने की संख्या भी बढ़ती रहती है और जैसे-जैसे यह आवृति बढ़ती है उस नाम से सम्बन्धित एनर्जी आपमें उतरने लगती है और आपका व्यक्तित्व बहुत हद तक आपके नाम के अनुसार हो जाता है।

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Dr. Sanjay Biyani
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क्या प्रेम करना अपराध है ?

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आज के हजारों साल पहले चन्द्रगुप्त ने अपने गुरू चाणक्य से एक सवाल किया था मुझे धनानन की पुत्री से प्रेम हो गया है, क्या प्रेम करना गुनाह है ? तब से लेकर आज तक यह सवाल हर किसी के जेहन में बार-बार आता है। आधुनिक युग के बायॅफ्रेंड/गर्लफ्रेंड कल्चर में यह सवाल लगभग हर युवा के मन में रहता है। इन दिनों कई युवाओं ने मुझसे भी यह सवाल किया। उनका पूछना था कि क्यों हमारे घरवाले हमें प्रेम करने से रोकते है ? क्या प्रेम ताकत नहीं है ? क्या प्रेम एनर्जी नहीं है ? क्या प्रेम जीवन नहीं है ? प्रेम करना चाहिए या नहीं करना चाहिए ?
उस समय चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को जवाब दिया -चन्द्रगुप्त, तुम्हारे जीवन में अखण्ड भारत का महान लक्ष्य रख दिया गया है। इसलिए प्रेम में समय गंवाना कदाचित उचित नहीं है। इस जवाब की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है। अर्थात् अगर आपके जीवन में कोई महान लक्ष्य है, तो फिर उस लक्ष्य से प्रेम कीजिए फिर आपको सब छोटे लगने लगेगे। अभी जीवन में लक्ष्य का छोटा होना या लक्ष्य का ना होना इस तरह के उन्माद पैदा करता है। अगर वास्तव में आप बिना लक्ष्य के जीवन बिताना चाहते है तो मैं कहूंगा कि प्रेम कीजिए, बाॅयफ्रेंड बनाइए, गर्लफ्रेंड बनाइए। लेकिन हर चीज की एक उम्र होती है। जब हम युवावस्था में हो अर्थात 25 वर्ष की उम्र में हो तो उस समय तो सबसे महत्त्वपूर्ण यही है कि हम अपने लक्ष्य से प्रेम करें। प्रेम किसी व्यक्ति से ही हो यह जरूरी नहीं है। प्रेम तो सजीव या निर्जीव किसी वस्तु से भी किया जा सकता है प्रेम ही तो दुनिया की ताकत है।
प्रेम करना अपराध नहीं है लेकिन गलत वक्त पर गलत फैसला लेकर उसे प्रेम का नाम देना अपराध है।
अगर आपके जीवन में आपने कोई लक्ष्य तय कर लिया है, अगर आप आई.ए.एस, आर.ए.एस, सी.ए या डाॅक्टर बनना चाहते हे तो सबसे पहले अपने लक्ष्य से प्रेम करें। यही आपको शक्तिशाली बनाएगा, यही आपको महान् बनाएगा। ये फैसला आपके हाथ में है कि जीवन लक्ष्य से जीना है या बिना लक्ष्य के । अगर जीवन लक्ष्य के साथ जीना है तो निश्चित रूप से अपने लक्ष्य से प्रेम करें।

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Dr. Sanjay Biyani
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