व्यक्ति समाज के लिए या समाज व्यक्ति के लिए

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स्वार्थ, स्वार्थ, स्वार्थ चारों तरफ स्वार्थपरक दुनिया बनती जा रही है। जिसको देखो येन केन प्रकारेण सबको पैसा चाहिए, प्यार चाहिए लेकिन सिर्फ अपने लिये, दूसरों को देने के लिये उनके पास न प्यार है न पैसा। स्वार्थ की धुन में कुछ लोग इतने डूब जाते हैं कि उन्हें सही-गलत का फर्क ही पता नहीं रहता। यह लोग गलत तरीकों का इस्तेमाल करके देश की जनता का पैसा लूटते हैं, जैसे कि नीरव मोदी। इनकी कंपनी ने पंजाब नेशनल बैंक के साथ धोखाधड़ी करके 11,300 करोड़ रुपए का घोटाला किया है। जिसके लिए बैंक के कर्मचारियों की मिलीभगत से गलत तरीके से लेटर ऑफ अंडरटेकिंग को दिखाकर आयात के नाम पर पैसा लिया गया। लेटर ऑफ अंडरटेकिंग एक प्रकार की गारंटी होती है जो जारी करने वाला बैंक अपने ग्राहक के लिए लेता है जिसको आधार मानकर दूसरा बैंक ग्राहक को पैसे दे सकता है।
वहीं स्वार्थपूर्ण प्रेम का एक दुखद वाकया अभी जयपुर में देखने को मिला जिसमें वेलेंटाइन डे पर निकाह नहीं करने पर एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका पर तेजाब डाल दिया। यह कैसा प्रेम है जहां सिर्फ पाने की ललक है? लगता है ये समाज किस दिशा जा रहा है?
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या ऐसे समाज में हमारी आने वाली पीढिय़ा रह पाएंगी? लोग क्यों सिर्फ अपना ही भला चाहते हैं चाहे उसके लिए उन्हें कोई गलत काम ही क्यों न करना पड़ जाए। बहुत गहराई से सोचने पर हमने जाना कि इन सारे सवालों का जवाब श्रीमद्भभगवद गीता में दिया गया है। इंसान शरीर रुपी रथ से चलता है और इस स्थूल शरीर रथ को चलाती हैं हमारी इंद्रियं जो रथ के घोड़े समान है और इन इंद्रियों को चलाता है हमारा ‘मन’ जो इन सारी समस्याओं का कारण भी है। इसलिए कहा भी गया है मन के मते न चलिये मन के मत अनेक। इंसान का मन ‘मोह’ के कारण राग द्वेष में फंसा रहता है। मन हमेशा स्वयं पर केंद्रित रहता है, यह हमेशा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए इंद्रियों को अपने प्रिय विषयों की ओर खींचता रहता है।
आज समाज में धर्म की समझ खत्म होती जा रही है, शायद क्योंकि अब धर्मपरक शिक्षा व्यवस्था नहीं रही, और परिवार के सदस्यों को छोटे बच्चों को धर्म का अर्थ समझाने का समय नहीं मिल रहा है। कारण जो भी हो लेकिन आज समाज से धर्म का हृास होता जा रहा है और यह एक स्वार्थपरक समाज बनता जा रहा है जहां लोगों को जो पसंद है बस वो चाहिए चाहे उसके लिए कुछ भी गलत रास्ता अपनाना पड़े।
इंसान को आज समझना होगा कि अपने हित से पहले हमें परिवार का हित देखना चाहिए और परिवार के हित से पहले गांव का हित देखना चाहिए और गांव के हित से पहले देश का हित। अगर हम ये जानना चाहते हैं कि हमारा कोई भी कर्म धर्म के अनुसार है या नहीं तो हमें यह देखना होगा कि वह समाज हित में है या नहीं। वेदों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सूत्र वाक्य कई हजार साल पहले दे दिया था जिसका भाव था सारी पृथ्वी को अपने परिवार की तरह मान कर चलो, हम सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
कुछ ही दिनों में होली आने वाली है हमने पहले भी कहा है कि बुराई, भ्रष्टाचार और बेईमानी की होली जलनी चाहिए, तो आइये इस बार ”स्वार्थ’ की होली जलाएं।
इसी के साथ आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ…

Dr. Sanjay Biyani

 

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समाज में आर्थिक खुशहाली के लिए एन्टरप्रेन्योर्स को बढ़ावा दिया जाना बहुत ही आवश्यक है

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नरसिम्हा राव सरकार के कार्यकाल के दौरान वर्ष 1991 में एक समय आया था, जब भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह कर्ज में डूब कर दिवालियेपन की दिशा में पहुंच चुकी थी। सरकार के पास देश का सोना गिरवी रखकर ऋण लेेने के सिवाय, कोई भी रास्ता नहीं बचा था। इसका प्रमुख कारण सेवा व उद्योग जैसे क्षेत्रों में सरकारी दखलअंदाजी व लाइसेंस प्रणाली थी। उस वक्त नरसिम्हा राव सरकार द्वारा उदारीकरण की नीति अपनाकर सरकारी दखलअंदाजी व लाइसेंस प्रणाली को समाप्त किया गया था। हम सभी जानते हैं कि टेलीकम्यूनिकेशन, इंश्योरेंस व एजुकेशन के क्षेत्र में लाइसेंस राज कम करने से सेवा क्षेत्र में बहुत बड़ा सुधार व इंफ्रास्ट्रक्चर गत दशक में तैयार हो गया है। हम सभी यह भी जानते हैं कि हर जागरूक व्यक्ति अपने बच्चों को निजी स्कूल व कॉलेज में ही पढ़ाना चाहता है और इसी तरह जब स्वास्थ्य की बात आती है, तो भी हर व्यक्ति निजी क्षेत्र के अस्पतालों का ही रूख करता है। बावजूद इसके सरकारी तंत्र समय-समय पर शिक्षा, चिकित्सा और व्यापार आदि क्षेत्रों में हस्तक्षेप करके निजी क्षेत्र के लिए एक नकारात्मक वातावरण तैयार करता ही रहता है। हाल ही में इसके कई उदाहरण देखने को मिले हैं। इनमें सबसे पहला उदाहरण मैैक्स अस्पताल का लाइसेंस रद्द किया जाना रहा। किसी एक डॉक्टर की लापरवाही की सजा समस्त स्टेकहोल्डर को दिया जाना किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री को यह समझना चाहिए कि सरकार एक फे सीलिटेटर के रूप में कार्य करती है, ना कि डिक्टेटर के रूप में। इस सम्बन्ध में मैक्स अस्पताल को सुनवाई का अवसर दिए बिना यह कदम उठाना किसी भी प्रकार से उचित नहीें है। इसी प्रकार की घटना दिल्ली स्थित रेयॉन स्कूल के साथ भी देखी गई थी। रेयॉन स्कू ल की कुल १८६ शाखाएं देश में कार्यरत हैं। किसी एक शाखा में हुई दुर्घटना के लिए डायरेक्टर को दोषी मानते हुए कार्यवाही किया जाना किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीें कहा जा सकता।

हाल ही में राजस्थान सरकार के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा निजी कॉलेजों की फीस तय करने का फैसला लिया जा रहा है। सभी कॉलेजों के संसाधन व गुणवत्ता भिन्न-भिन्न है, ऐसे में एक समान फीस किस प्रकार तय की जा सकती है? वैसे भी सरकार प्रदेश के ३५००० निजी स्कूलों की फीस पर लगाम कसने में अब तक असफल साबित हुई है। इस तरह की दखलअंदाजी से ना सिर्फ एन्टरप्रेन्योर हतोत्साहित होते हैं, बल्कि सरकारी तंत्र में भी भ्रष्टाचार पनपने लगता है। आवश्यकता इस बात है कि सरकार, एन्टरप्रेन्योर्स को सुविधा व मार्गदर्शन प्रदान करने वाली संस्था के रूप में काम करे। समाज में आर्थिक खुशहाली के लिए एन्टरप्रेन्योर्स को बढ़ावा दिया जाना बहुत ही आवश्यक है। किसी एक घटना या किसी एक पक्ष को जानकर निर्णय लिया जाना उचित नहीं है। निजी शिक्षण संस्थाएं व निजी अस्पताल आज भी बेहतरीन सेवाएं देने के साथ-साथ नियामक संस्थाओं से जुझते रहते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में इन क्षेत्रों को जनता के द्वारा सहज तौर पर ही नियन्त्रित किया जाना चाहिए।

प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ…
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Dr. Sanjay Biyani

 

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आपके जीवन में आपके नाम का क्या महत्त्व है ?

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बहुत समय से मैं इस विषय पर रिसर्च करता आ रहा हूँ कि आदमी के जीवन में उसके नाम का क्या महत्त्व है और उनके नाम के अनुसार उनका व्यक्तित्व कैसा है ? मैंने पाया कि जिसका जो नाम है लगभग -लगभग उसका व्यक्तित्व एक लंबे समय बाद वैसा ही बन जाता है। जरा सोचे कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण क्या है ? इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है कि ‘शब्द शक्ति है‘, ‘शब्द ऊर्जा है‘ और यह शक्ति और ऊर्जा जब किसी के लिए बार-बार दोहराई जाती है तो वह एक वाइब्रेशन लेकर आती है। वह वाईब्रेशन एक एनर्जी को जन्म देती है और वह एनर्जी जब किसी के पास आती है तो वह शब्द एक शेप लेकर संरचित हो जाते है और धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व में वह रूपान्तरण होने लगता है इसलिए लोग दुःशासन नाम नहीं रखना चाहते, दुर्योधन नाम नहीं रखना चाहते। सभी लोग सकारात्मक और बेहतरीन नाम रखना चाहते है, क्यांकि एक लम्बे समय बाद पूरे समाज को यह बात समझ आई कि नामकरण संस्कार एक बहुत बड़ा संस्कार है और नाम का जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है। नाम के अनुसार ही हमारा व्यक्तित्व बन जाता है। जब भी हम किसी को पुकारते है, आवाज देते है या बुलाते है तो उसका अपना नाम उसके ऊपर थ्रो किया जाता है और नाम के प्रभाव से वो बच नहीं सकता है क्योंकि वह एनर्जी एक दिशा में प्रसारित कर दी गई है और उस एनर्जी के अनुसार सामने वाले का व्यक्तित्व एक शेप लेता है । इसलिए जो भी शब्द बोले, सोच समझकर बोले क्योंकि शब्द ही तो ब्रह्म है, शब्द ही तो चेतना है, शब्द ही तो शक्ति है। इसलिए अगर गाली भी बोले तो जरा सोच-समझकर बोले क्योंकि उसकी एनर्जी के प्रभाव से ना आप बच पाएंेगे ना सामने वाला। नाम का प्रभाव आपके व्यक्तित्व पर कितना हुआ है यह आपकी उम्र पर भी निर्भर करता है आपकी उम्र बढ़ने के साथ-साथ आपके नाम को पुकारने की संख्या भी बढ़ती रहती है और जैसे-जैसे यह आवृति बढ़ती है उस नाम से सम्बन्धित एनर्जी आपमें उतरने लगती है और आपका व्यक्तित्व बहुत हद तक आपके नाम के अनुसार हो जाता है।

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क्या प्रेम करना अपराध है ?

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आज के हजारों साल पहले चन्द्रगुप्त ने अपने गुरू चाणक्य से एक सवाल किया था मुझे धनानन की पुत्री से प्रेम हो गया है, क्या प्रेम करना गुनाह है ? तब से लेकर आज तक यह सवाल हर किसी के जेहन में बार-बार आता है। आधुनिक युग के बायॅफ्रेंड/गर्लफ्रेंड कल्चर में यह सवाल लगभग हर युवा के मन में रहता है। इन दिनों कई युवाओं ने मुझसे भी यह सवाल किया। उनका पूछना था कि क्यों हमारे घरवाले हमें प्रेम करने से रोकते है ? क्या प्रेम ताकत नहीं है ? क्या प्रेम एनर्जी नहीं है ? क्या प्रेम जीवन नहीं है ? प्रेम करना चाहिए या नहीं करना चाहिए ?
उस समय चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को जवाब दिया -चन्द्रगुप्त, तुम्हारे जीवन में अखण्ड भारत का महान लक्ष्य रख दिया गया है। इसलिए प्रेम में समय गंवाना कदाचित उचित नहीं है। इस जवाब की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है। अर्थात् अगर आपके जीवन में कोई महान लक्ष्य है, तो फिर उस लक्ष्य से प्रेम कीजिए फिर आपको सब छोटे लगने लगेगे। अभी जीवन में लक्ष्य का छोटा होना या लक्ष्य का ना होना इस तरह के उन्माद पैदा करता है। अगर वास्तव में आप बिना लक्ष्य के जीवन बिताना चाहते है तो मैं कहूंगा कि प्रेम कीजिए, बाॅयफ्रेंड बनाइए, गर्लफ्रेंड बनाइए। लेकिन हर चीज की एक उम्र होती है। जब हम युवावस्था में हो अर्थात 25 वर्ष की उम्र में हो तो उस समय तो सबसे महत्त्वपूर्ण यही है कि हम अपने लक्ष्य से प्रेम करें। प्रेम किसी व्यक्ति से ही हो यह जरूरी नहीं है। प्रेम तो सजीव या निर्जीव किसी वस्तु से भी किया जा सकता है प्रेम ही तो दुनिया की ताकत है।
प्रेम करना अपराध नहीं है लेकिन गलत वक्त पर गलत फैसला लेकर उसे प्रेम का नाम देना अपराध है।
अगर आपके जीवन में आपने कोई लक्ष्य तय कर लिया है, अगर आप आई.ए.एस, आर.ए.एस, सी.ए या डाॅक्टर बनना चाहते हे तो सबसे पहले अपने लक्ष्य से प्रेम करें। यही आपको शक्तिशाली बनाएगा, यही आपको महान् बनाएगा। ये फैसला आपके हाथ में है कि जीवन लक्ष्य से जीना है या बिना लक्ष्य के । अगर जीवन लक्ष्य के साथ जीना है तो निश्चित रूप से अपने लक्ष्य से प्रेम करें।

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भारतीय राजनीति में योगी विचारधारा की आवश्यकता

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योगी कौन होता है ? योगी उसे कहा जाता है जो सांसारिक प्रपंचों को छोड़ कर अपना जीवन किसी एक विचार के लिए समर्पित कर देता है चाहे वो ईश्वर प्राप्ति का विचार हो, आत्म साक्षात्कार करने का विचार हो या ब्रह्म को जान लेने का विचार हो। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि योगी के जीवन का एक निश्चित लक्ष्य होता है जिसे प्राप्त करने के लिए वो कठोर स्व-अनुशासन का पालन करता है और घर परिवार का भी त्याग करने को तैयार हो जाता है।
अब बात आती है कि आखिर राजनीति में योगी विचारधारा की क्या आवश्यकता है ? सही मायनों में राजनीति एक बहुत बड़ा समाज सेवा का कार्य है जिसमे नेता को समाज के विकास और सामाजिक समस्याओं के निवारण के उद्देश्य से कार्य करना होता है । भारतीय समाज अनेकता में एकता वाला समाज है जहां तरह-तरह की सामाजिक समस्याएं भी रोज सामने आती रहती हैं । इन समस्याओं का समाधान करने के लिए भारत की जनता द्वारा 545 लोकसभा सांसद, 245 राज्य सभा सदस्य और लगभग 4120 विधानसभा सदस्यों को चुना जाता है । इन 4,910 व्यक्तियों के हाथों में सवा सौ करोड़ देशवासियों वाले इस अति विशाल परिवार को सही दिशा में ले जाने का जिम्मा होता है।
अब यह समझना जरूरी हो जाता है कि एक सामान्य इंसान जो 5-7 सदस्यों वाले अपने छोटे से परिवार को संभालने में इतना उलझा रहता है कि उसको परिवार के अलावा कुछ सोचने का समय ही नहीं मिल पाता है तो ये 4,910 व्यक्ति अपने निजी परिवार और व्यापार के साथ इतने विशाल देश को संभालने का समय कहां से निकाल पाते होंगे ?
पार्ट टाइम राजनीति की वजह से देश के विकास कार्यों की गति धीमी रह जाती है । क्यूंकि राजनेता का पूरा ध्यान उसके असली कार्य समाजसेवा में न होकर भिन्न-भिन्न कार्यों में बंटा रहता है इसलिए परिवारवाद और भाई-भतीजावाद भी राजनीति पर हावी रहता है, जिसके चलते राजनेता सिर्फ अपना, अपने परिवार का और अपने प्रिय लोगों का ही भला करने की सोचते रहते हैं। उनको यह सोचने का समय ही नहीं मिलता कि उनको पूरे देश को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।
ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि क्या इतने विशाल देश में ऐसे 5,000 काबिल आदमी भी नहीं हैं जो एक योगी की तरह, सिर्फ और सिर्फ इस देश को चलाने के लिए अपना तन-मन और धन सब अर्पण कर सकें? एक योगी कि तरह अपने परिवार, व्यापार, रिश्तेदार का त्याग कर के 24 घंटे सिर्फ और सिर्फ देश के विकास के लिए जुट जाए। इतिहास गवाह रहा है कि वही राजनेता देश को आगे ले जाते हैं जो समाज को अपने देवता की तरह पूजते हैं, समाज के दर्द को अपना दर्द समझ कर उसे दूर करने में जुटे रहते हैं। चाहे कलाम साहब का उदाहरण ले लीजिये या अटल बिहारी बाजपेयी जी की बात करिये और वर्तमान में योगी आदित्यनाथ हों या मोदी जी इन सबके जीवन में एक समानता मिलेगी और वो है ‘योगी विचारधारा’। इनके जीवन में समाजसेवा के अलावा और कोई कार्य ही नहीं और शायद इसीलिए अपने कार्यों के बल पर इन्होने लोकप्रियता के उस ऊंचे मुकाम को प्राप्त किया जो अद्भुत है। एक लक्ष्य, एक विचार और उसके प्रति जीवन को समर्पित कर देना यही आज राजनीति की आवश्यकता है। आज राजनीति को ऐसे लोग चाहिये जिनके पास 24 घंटे सिर्फ एक ही काम हो और कोई काम ही न हो जो उनका ध्यान भटका सके। जब तक पार्ट टाइम राजनेता का समय परिवार और व्यापार में उलझा रहता है तब तक भ्रष्टाचार की भी संभावना बनी रहती है, जैसे ही राजनेता परिवार और व्यापार के झंझट से निकल जाता है तब उसे सिर्फ अपना असली काम दिखता है। हमें पूरा विश्वास है कि इस राजनीति के कीचड़ को अगर साफ किया जा सकता है तो वो योगी विचारधारा के व्यक्तियों को राजनीति में आगे बढ़ा कर ही किया जा सकता है क्यूंकि सिर्फ एक सच्चा योगी ही ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ की विचारधारा पर चलकर सारे समाज को अपना परिवार मानता हुआ, अपने जीवन को समाज कार्य में अर्पित कर सकता है। प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ….

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How to take a sound sleep

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Today I want to talk about a word, this word is really very powerful…… people named there daughter as “Nisha”, Nisha is a negative word, I thought today is a good day to understand this word and it will help us to know the meaning of freshness, and power.

Look at the small children, if you really have a zeal to learn, learn from them, they are the good teachers, we can even learn from them when they are smiling, when they are sleeping… we can count when they sleep but we can’t on elders.
The person who can sleep well can wake up well… The person who can smile like shinning stars can gain the energy like star too.

So why we can’t sleep? ….. Tomorrow I met some teachers they complain that they can’t sleep but in morning they write poems, how the restless people can explain the beauty in poems, I wonder? Sleeping at night is very important, so let’s discover why small children sleep well and why elders can’t.

A small child is full of happiness because they don’t have ego and this thing should be learn from them. When we grow we become egoistic and this ego gives birth to frustration, irritation and anger. This ego has widened its roots in the whole society. So let’s focus on the remedy…. Why ego? Because when we grow older we continuously use the words “Me & my”, why me? Why not me? This is mine etc.

We should learn from the nature they are providing equal things to us, rain from clouds, oxygen from trees, all oceans, soil, mountains are there for us..
Their aim is to give and give and give.

We should not focus on ourselves only, when we think about others we travel the journey of me to us … and this helps us to get relief, to get sleep at night.
If we really want to know the magic of sleeping we should make ourselves ego free, and to be ego free we have to think about others more.

“May I help you please?”… Is the ultimate solution of all the problems?

The above words increase the level of happiness and freshness.

So in this season ask tress ” may I help you” ,ask birds may I help you please, these words helps to polish the society, these words helps to have you a beautiful sleep.

 

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Oneness “Ekta”

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Oneness of God, Oneness of religion, Oneness of humanity…..

Tomorrow, I went to a palce, people over there are happy, laughing and positive vibes are coming from them….. Leaving that place I went to the next one where people are screaming , crying and cursing god for a sudden death in the family.
Wholeness is not just a word we should understand its deep meaning which helps us in accepting all the things in a better way.

We became happy and welcome the new born but we are sad and unhappy on death, why?

Rather we should surrender to the decision of God. We should understand that both are the decision of god , we need to accept it and try to overcome the problem.

Both joy & sorrow, birth & death are one, they are just different sides of the same coin.

Harmony brings joy to our life, smiles on our lovely faces which ends up all the negativity within us.

People face stages on mishaps-
1. They don’t accept what happens.
2. Why me? Why not other?
3. Crying & curse their destiny.
4. Accepting the things & try to solve it.

If on the first step we accept things and take them as one, we can find more solution to a problem.

Accepting things brings peace & ultimate happiness the our lives.
The morning session in Biyani Group of Colleges ends with ” OM MANI PADME HUM” where om stands for god, mani stands for money , padme stands stands for lotus and hum stands for soul.

All the faculty members & students bow down, fold their hands and depicting oneness of mind and soul.

 

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कर्म का फल एक दिन अवश्य भुगतना होता है।

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क्या आपने कभी सोचा है कि कभी-कभी जब आप कोई कार्य करना नहीं चाहते तो भी आपको कौनसी शक्ति ऐसा करने हेतु बाध्य करती है? मेरे विचारानुसार, यह कर्म का नियम है जो हमें समस्त कार्य स्वेच्छा से या कभी-कभी अनिच्छा से करने हेतु बाध्य करता है। कर्म के नियम से कोई मुक्त नहीं रह सकता। दुर्योधन ने भी कहा था, ‘‘मैं कर्म के सिद्धान्त का सार जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि क्या सही है और क्या गलत, किन्तु फिर भी मैं अज्ञात शक्तियां द्वारा कर्म करने हेतु बाध्य किया जाता हँ‘‘ कर्मयोग से बचने के लिए यहाँ संसार में कोई साधन नहीं है साथ ही हम अपने किए हुए कर्म को कही नहीं छिपा सकते है।
एक बार एक राजा ने अपने तीनों पुत्रों की परीक्षा लेने का विचार किया। इस हेतु उसने तीनों को एक-एक तोता दिया और कहा कि अपने-अपने तोते को ऐसी जगह ले जाकर मारो, जहाँ ऐसा करते हुए आपको कोई नहीं देख सके और आकर सूचित करो। कुछ समय पश्चात् दो पुत्र वापस आए और कहा कि उन्होनें तोतों को वहाँ मारा जहाँ कोई उन्हें नहीं देख रहा था। किन्तु तीसरा पुत्र अपने जीवित तोते के साथ ही लौटा।
राजा ने आश्चर्यपूर्वक पूछा कि क्या तुम्हें एक भी स्थान ऐसा नहीं मिला, जहाँ तुम स्वयं को मिली चुनौती को पूर्ण कर पाते, उसने कहा, ‘‘नहीं पिताजी, जब मैं गुफा में गया तब वहाँ कोई नहीं था, मात्र अँधेरा था, किन्तु वहाँ भी मुझे तोते की चमकती हुई आँखें दिखाई दे रही थी, जो मुझे देख रही थी।
इस कहानी से तात्पर्य है- ‘‘आप अपने कर्मफल से नहीं बच सकते। आप जहाँ भी जाते हैं, जो कुछ भी करते हैं, आपके कर्म ही आपको शांतिपूर्वक देख रहे होते हैं। किसी भी दिन आपको आपके कर्म का फल पृथ्वी पर वहन करना ही होता है।
आइए! अपने कर्मफल का आनन्द लें। आइए! अच्छे कर्म करें। समस्याओं एवं दुःख की परिस्थिति में अन्य को दोष न देकर अपने कर्म फल को स्वीकार करें।
भविष्य, हमारे भूतकालीन कार्यों का परिणाम ही है। आज हम हमारे बीते हुए कल के कर्मों का फल वहन कर रहे हैं। परन्तु हम अच्छे कार्य करके, अच्छा सोेचकर तथा मानवता की सेवा करके, बुरे कर्मो के प्रभाव को परिवर्तित कर सकते हैं।
अच्छे कार्य करते रहिए और दूसरों से शुभकामनाएँ प्राप्त करते रहिए, यही कर्म के नियम का समाधान है।

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चाणक्य के मूल्यवान सिद्धान्त

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महान विद्वान चाणक्य ने कुछ मूल्यवान सिद्धान्त दिए थे जो कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के अच्छे मार्गदर्शक सिद्ध होंगे। आइए! आज हम चाणक्य के कुछ बहुमूल्य सिद्धान्तों की चर्चा करते है और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करते हैं।
प्रथम सिद्धान्त- संघर्ष में विजय प्राप्ति हेतु आपके लिए आवश्यक है –
1 दृढ़ संकल्प
2 पहले से ही पूर्णतः तैयार हो जाना
3 इच्छा शक्ति जो किसी भी संघर्ष में विजयी होने के लिए अपरिहार्य एवं पर्याप्त साधन है।
दूसरा सिद्धान्त- सफलता प्राप्ति हेतु आपके लिए आवष्यक हैः-
4 चमत्कारिक शब्दों में आस्था रखना। किन्तु दूसरों के मत या बातों में बिना विचारे विष्वास मत कीजिए पवित्र ग्रंथों या गुरूओं के द्वारा ऐसा ही बोला गया है। केवल उसी पर विश्वास कीजिए जो आपने अनुभव किया है, जो तार्किक है, जो आपके द्वारा पूर्ण परीक्षित है और जो मानवता के लाभार्थ हो और जो अधिक लोगों के लिए प्रसन्नता ला सकें।
जीवन में प्रसन्नता अत्यंत आवश्यक है। यदि यह सिद्धान्त सार्वभौमिक रूप से श्रेष्ठ है तो यह अवष्य स्वीकार किया जाना चाहिए।
तीसरा सिद्धान्त- विफलता के भय से मुक्ति पाने हेतु आपके लिए आवष्यक है-
5 एक अच्छी योजना का निर्माण और अपनी योजना पर पूर्ण विष्वास रखना। यदि योजना श्रेष्ठ है तो निर्णय भी श्रेष्ठ होगा। तीव्र आस्था और समर्पण से युक्त श्रेष्ठ योजना असंभव को संभव में रूपान्तरित कर सकती है। आषावादी प्रत्येक परिस्थिति में संभावना ढ़़ँूढ़ लेता है। निराषावादी प्रत्येक परिस्थिति में विफल होता है। सफलता और विफलता व्यक्त्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। आइए! अपनी शक्ति का पूर्ण प्रयोग करें। आइए! संभावनाआंे से युक्त बनं।
श्रेष्ठ विचारों के द्वारा हम श्रेष्ठ कार्य कर सकते हैं। एक श्रेष्ठ षिक्षक कई विद्यार्थियोें में परिवर्तन ला सकता है। एक उचित शैक्षिणिक वातावरण के लिए हमें रचनात्मक बनना चाहिए। श्रेष्ठ विचार ही हमारे लिए श्रेष्ठ वातावरण का निर्माण करते हैं। हम चाणक्य के समान एक आत्मविष्वासी षिक्षक बन सकते हैं और अपने षिक्षण को प्रभावी बना सकते हैं, यदि हम निम्नलिखित बातें अपने जीवन में अपनाते हैं-
 शिक्षण की समुचित तकनीक अत्यंत महत्वपूर्ण है।
 पाठ्य सामग्री पहले से ही समुचित रूप से तैयार कर लेनी चाहिए।
 शिक्षण प्रक्रिया में परिवर्तन हेतु उचित पद्धति अत्यंत आवश्यक है।
 आपका अपने विषय पर प्रगाढ़ नियंत्रण हो।
 आप आत्मविष्वास से युक्त हो।
 आप में साहस और अधिकारपूर्वक ज्ञान वितरण करने की पूर्ण क्षमता हो।
 आपके विचार मौलिक हों जिन्हें रचनात्मक रूप से समझना संभव हो।
श्रद्धा अत्यंत शक्तिषाली है। यदि आप स्वयं को एवं अपने विद्यार्थियों को जानते हैं तो आप अपना शत प्रतिषत दे पाएंगें। विद्यार्थियों की मानसिकता को समझना अतिआवष्यक है। चाणक्य उन महान षिक्षकों में से एक है, जिन्होंने अपने षिष्यों को प्रभावी व आत्मविश्वासपूर्वक ज्ञान व निर्देषन प्रदान किया। हम उनके सिद्धांतों से सीखकर एक सफल षिक्षक बन सकते है। षिक्षक संपूर्ण समाज को रूपांतरित कर सकते है। यह संभव है यदि हमारे मस्तिष्क के प्रयोग द्वारा आत्मविष्वासपूर्वक अधिकाधिक ज्ञान का उद्भव हो। षिक्षकों में उत्साह, इच्छा शक्ति और दिए गए पाठ्यक्रम से अधिक प्रदान करने की मंषा होनी चाहिए।

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योग चैतन्य अवस्था में जीने का मार्ग है।

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योग जीवन को सरल और खुशहाल बनाने का महत्त्वपूर्ण साधन है। हम दैनिक जीवन में योगक्रिया अपनाकर मानसिक रूप से प्रसन्न और शारीरिक रूप से स्वस्थ रह सकते हैं। आइए! आज योग दिवस पर स्वयं के लिए तीन वचन लेते हैं-
1. हम प्रातःकाल कम से कम 2 ग्लास पानी पिएंगें।
2. हम प्रतिदिन सुबह 3 से 5 मिनट व्यायाम करके प्राणायाम करेंगें।
3. हम कुछ समय प्राकृतिक वातावरण में छत पर, पार्क में अवष्य व्यतीत करेंगे और ईष्वर को इस शुभ दिन के लिए धन्यवाद देंगे।
मेरे अनुभव के अनुसार, मैं आपको आष्वस्त करता हूँ कि यह सब करने के बाद आपका एक भी दिन नकारात्मक नहीं जाएगा। योग का तात्पर्य है ‘जुड़ना’- अपनी आत्मा का परम आत्मा से जुड़ना, पूर्ण चेतना के साथ कार्य करना। सदैव चैतन्य अवस्था में रहने के कारण एक योगी किसी के साथ कभी बुरा व्यवहार नहीं कर सकता। अतः चैतन्य प्राप्ति हेतु स्वयं के लिए समय निकालिए। योगी बनिए, स्वयं से प्रेम कीजिए। यदि आप स्वयं से प्रेम करेंगे तो आप दूसरों से प्रेम कर पाएंगें। आप दूसरों की निःस्वार्थ सेवा कर पाएगें। अतः सादा जीवन अपनाइये जिससे आपके विचार स्वतः ही उच्च हो जाएंगे और दूसरों की निःस्वार्थ सेवा कर पाएंगे। याद रखिए, योग हमें सिखाता है- ‘‘सादा जीवन उच्च विचार’’। आइए! योग को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएँ।

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