True meaning of Yoga

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Today we will discuss true meaning of Yoga. Yoga means Focus on mind & body, gives us fitness.

We all are unique creation of god, with different DNA structure and these structures can be made fit by exercise.

“Why we are not happy like small children? smiling & dizzling like them, we all are sad that makes us a dead body who are just taking in oxygen.

This Rainy season which is fruitful for the whole universe, is a good provider of oxygen & we can gain it with exercise and Yoga.

Yoga is a sign of oneness, further Yoga is divided into 4 parts :

  1. Dhyan – i.e. making your mind stable which helps us to gain new thoughts
  2. Pranayam – Which helps us the gain oxygen.
  3. Aasan – Exercise in sitting position.
  4. Vyayam – Exercise in standing position.

By all of the above we can achieve a healthy state of minds that automatically helps us to have a fit body.

Lastly the session conclude with Vyayam where students and teachers participate with full energy and positive vibes, the session ended on high note with smile on all faces as everybody was relaxed after the mesmerizing yoga session.

“A feeble body weakens the mind & healthy body makes it strong”

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कर्म का फल एक दिन अवश्य भुगतना होता है।

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क्या आपने कभी सोचा है कि कभी-कभी जब आप कोई कार्य करना नहीं चाहते तो भी आपको कौनसी शक्ति ऐसा करने हेतु बाध्य करती है? मेरे विचारानुसार, यह कर्म का नियम है जो हमें समस्त कार्य स्वेच्छा से या कभी-कभी अनिच्छा से करने हेतु बाध्य करता है। कर्म के नियम से कोई मुक्त नहीं रह सकता। दुर्योधन ने भी कहा था, ‘‘मैं कर्म के सिद्धान्त का सार जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि क्या सही है और क्या गलत, किन्तु फिर भी मैं अज्ञात शक्तियां द्वारा कर्म करने हेतु बाध्य किया जाता हँ‘‘ कर्मयोग से बचने के लिए यहाँ संसार में कोई साधन नहीं है साथ ही हम अपने किए हुए कर्म को कही नहीं छिपा सकते है।
एक बार एक राजा ने अपने तीनों पुत्रों की परीक्षा लेने का विचार किया। इस हेतु उसने तीनों को एक-एक तोता दिया और कहा कि अपने-अपने तोते को ऐसी जगह ले जाकर मारो, जहाँ ऐसा करते हुए आपको कोई नहीं देख सके और आकर सूचित करो। कुछ समय पश्चात् दो पुत्र वापस आए और कहा कि उन्होनें तोतों को वहाँ मारा जहाँ कोई उन्हें नहीं देख रहा था। किन्तु तीसरा पुत्र अपने जीवित तोते के साथ ही लौटा।
राजा ने आश्चर्यपूर्वक पूछा कि क्या तुम्हें एक भी स्थान ऐसा नहीं मिला, जहाँ तुम स्वयं को मिली चुनौती को पूर्ण कर पाते, उसने कहा, ‘‘नहीं पिताजी, जब मैं गुफा में गया तब वहाँ कोई नहीं था, मात्र अँधेरा था, किन्तु वहाँ भी मुझे तोते की चमकती हुई आँखें दिखाई दे रही थी, जो मुझे देख रही थी।
इस कहानी से तात्पर्य है- ‘‘आप अपने कर्मफल से नहीं बच सकते। आप जहाँ भी जाते हैं, जो कुछ भी करते हैं, आपके कर्म ही आपको शांतिपूर्वक देख रहे होते हैं। किसी भी दिन आपको आपके कर्म का फल पृथ्वी पर वहन करना ही होता है।
आइए! अपने कर्मफल का आनन्द लें। आइए! अच्छे कर्म करें। समस्याओं एवं दुःख की परिस्थिति में अन्य को दोष न देकर अपने कर्म फल को स्वीकार करें।
भविष्य, हमारे भूतकालीन कार्यों का परिणाम ही है। आज हम हमारे बीते हुए कल के कर्मों का फल वहन कर रहे हैं। परन्तु हम अच्छे कार्य करके, अच्छा सोेचकर तथा मानवता की सेवा करके, बुरे कर्मो के प्रभाव को परिवर्तित कर सकते हैं।
अच्छे कार्य करते रहिए और दूसरों से शुभकामनाएँ प्राप्त करते रहिए, यही कर्म के नियम का समाधान है।

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चाणक्य के मूल्यवान सिद्धान्त

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महान विद्वान चाणक्य ने कुछ मूल्यवान सिद्धान्त दिए थे जो कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के अच्छे मार्गदर्शक सिद्ध होंगे। आइए! आज हम चाणक्य के कुछ बहुमूल्य सिद्धान्तों की चर्चा करते है और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करते हैं।
प्रथम सिद्धान्त- संघर्ष में विजय प्राप्ति हेतु आपके लिए आवश्यक है –
1 दृढ़ संकल्प
2 पहले से ही पूर्णतः तैयार हो जाना
3 इच्छा शक्ति जो किसी भी संघर्ष में विजयी होने के लिए अपरिहार्य एवं पर्याप्त साधन है।
दूसरा सिद्धान्त- सफलता प्राप्ति हेतु आपके लिए आवष्यक हैः-
4 चमत्कारिक शब्दों में आस्था रखना। किन्तु दूसरों के मत या बातों में बिना विचारे विष्वास मत कीजिए पवित्र ग्रंथों या गुरूओं के द्वारा ऐसा ही बोला गया है। केवल उसी पर विश्वास कीजिए जो आपने अनुभव किया है, जो तार्किक है, जो आपके द्वारा पूर्ण परीक्षित है और जो मानवता के लाभार्थ हो और जो अधिक लोगों के लिए प्रसन्नता ला सकें।
जीवन में प्रसन्नता अत्यंत आवश्यक है। यदि यह सिद्धान्त सार्वभौमिक रूप से श्रेष्ठ है तो यह अवष्य स्वीकार किया जाना चाहिए।
तीसरा सिद्धान्त- विफलता के भय से मुक्ति पाने हेतु आपके लिए आवष्यक है-
5 एक अच्छी योजना का निर्माण और अपनी योजना पर पूर्ण विष्वास रखना। यदि योजना श्रेष्ठ है तो निर्णय भी श्रेष्ठ होगा। तीव्र आस्था और समर्पण से युक्त श्रेष्ठ योजना असंभव को संभव में रूपान्तरित कर सकती है। आषावादी प्रत्येक परिस्थिति में संभावना ढ़़ँूढ़ लेता है। निराषावादी प्रत्येक परिस्थिति में विफल होता है। सफलता और विफलता व्यक्त्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। आइए! अपनी शक्ति का पूर्ण प्रयोग करें। आइए! संभावनाआंे से युक्त बनं।
श्रेष्ठ विचारों के द्वारा हम श्रेष्ठ कार्य कर सकते हैं। एक श्रेष्ठ षिक्षक कई विद्यार्थियोें में परिवर्तन ला सकता है। एक उचित शैक्षिणिक वातावरण के लिए हमें रचनात्मक बनना चाहिए। श्रेष्ठ विचार ही हमारे लिए श्रेष्ठ वातावरण का निर्माण करते हैं। हम चाणक्य के समान एक आत्मविष्वासी षिक्षक बन सकते हैं और अपने षिक्षण को प्रभावी बना सकते हैं, यदि हम निम्नलिखित बातें अपने जीवन में अपनाते हैं-
 शिक्षण की समुचित तकनीक अत्यंत महत्वपूर्ण है।
 पाठ्य सामग्री पहले से ही समुचित रूप से तैयार कर लेनी चाहिए।
 शिक्षण प्रक्रिया में परिवर्तन हेतु उचित पद्धति अत्यंत आवश्यक है।
 आपका अपने विषय पर प्रगाढ़ नियंत्रण हो।
 आप आत्मविष्वास से युक्त हो।
 आप में साहस और अधिकारपूर्वक ज्ञान वितरण करने की पूर्ण क्षमता हो।
 आपके विचार मौलिक हों जिन्हें रचनात्मक रूप से समझना संभव हो।
श्रद्धा अत्यंत शक्तिषाली है। यदि आप स्वयं को एवं अपने विद्यार्थियों को जानते हैं तो आप अपना शत प्रतिषत दे पाएंगें। विद्यार्थियों की मानसिकता को समझना अतिआवष्यक है। चाणक्य उन महान षिक्षकों में से एक है, जिन्होंने अपने षिष्यों को प्रभावी व आत्मविश्वासपूर्वक ज्ञान व निर्देषन प्रदान किया। हम उनके सिद्धांतों से सीखकर एक सफल षिक्षक बन सकते है। षिक्षक संपूर्ण समाज को रूपांतरित कर सकते है। यह संभव है यदि हमारे मस्तिष्क के प्रयोग द्वारा आत्मविष्वासपूर्वक अधिकाधिक ज्ञान का उद्भव हो। षिक्षकों में उत्साह, इच्छा शक्ति और दिए गए पाठ्यक्रम से अधिक प्रदान करने की मंषा होनी चाहिए।

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योग चैतन्य अवस्था में जीने का मार्ग है।

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योग जीवन को सरल और खुशहाल बनाने का महत्त्वपूर्ण साधन है। हम दैनिक जीवन में योगक्रिया अपनाकर मानसिक रूप से प्रसन्न और शारीरिक रूप से स्वस्थ रह सकते हैं। आइए! आज योग दिवस पर स्वयं के लिए तीन वचन लेते हैं-
1. हम प्रातःकाल कम से कम 2 ग्लास पानी पिएंगें।
2. हम प्रतिदिन सुबह 3 से 5 मिनट व्यायाम करके प्राणायाम करेंगें।
3. हम कुछ समय प्राकृतिक वातावरण में छत पर, पार्क में अवष्य व्यतीत करेंगे और ईष्वर को इस शुभ दिन के लिए धन्यवाद देंगे।
मेरे अनुभव के अनुसार, मैं आपको आष्वस्त करता हूँ कि यह सब करने के बाद आपका एक भी दिन नकारात्मक नहीं जाएगा। योग का तात्पर्य है ‘जुड़ना’- अपनी आत्मा का परम आत्मा से जुड़ना, पूर्ण चेतना के साथ कार्य करना। सदैव चैतन्य अवस्था में रहने के कारण एक योगी किसी के साथ कभी बुरा व्यवहार नहीं कर सकता। अतः चैतन्य प्राप्ति हेतु स्वयं के लिए समय निकालिए। योगी बनिए, स्वयं से प्रेम कीजिए। यदि आप स्वयं से प्रेम करेंगे तो आप दूसरों से प्रेम कर पाएंगें। आप दूसरों की निःस्वार्थ सेवा कर पाएगें। अतः सादा जीवन अपनाइये जिससे आपके विचार स्वतः ही उच्च हो जाएंगे और दूसरों की निःस्वार्थ सेवा कर पाएंगे। याद रखिए, योग हमें सिखाता है- ‘‘सादा जीवन उच्च विचार’’। आइए! योग को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएँ।

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Devotion is the source of Completeness

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Devotion is essential for every human being. This is the most important part of an individual’s life because it makes him free from all his guilt, frustration, sorrows and irritation. Devotion is the only thing that helps an individual to meet his own self. Devotion makes our thoughts unite with others as well as with the supreme energy. Unity is the most important part of human life. We can be united and be complete in our lives only through this pious act. There is a lot of input of information in our lives but hardly, it is used because the information gets stuck at a certain level of our thoughts. For the best use of knowledge, there is the need of continuous flow of knowledge, where input and output should be balanced to keep the life smooth. Women are more devoted living beings on the earth. They are grateful towards God and they possess a pure heart. Meera from Merta city was the greatest devotee of Lord Krishna who in every negative situation came closer to God. We can learn a lot from this great devotion of Meera. Let’s show our gratitude towards nature and the ultimate power through this pious Mantra:
Mukund Madhava Govind Bol,
Keshav Madhava Hari Hari Bol
Let’s unite ourselves with the universe and chant this Mantra to make our hearts pure. It is very important to understand and imbibe the meaning of this Mantra.

Regards,
Dr. Sanjay Biyani

 

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अध्यापन एक सरल कार्य नहीं है।

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आइए! हम कुरूक्षेत्र के दृष्य को याद करते हैं, जहाँ संसार के परम गुरू श्री कृष्ण एक अनुभवी व्यक्त्ति दुर्योधन को समझाने और सिखाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास करते हैं, परंतु पूर्णतः सफल नहीं हो पाते। श्री कृष्ण कुंती, गांधारी और धृतराष्ट्र को भी समझाने में सफल नहीं हो पाए।
यही वर्तमान में हमारे साथ भी हो रहा है, जब हम दूसरों को समझाने का प्रयास करते हैं, किन्तु सफल नहीं हो पाते हैं। न तो हम उन्हें समझा पाते हैं, न हम इस असफलता का कारण समझ पाते हैं।
अतः प्रष्न यह उठता है कि हम हमारे समक्ष उपस्थित व्यक्त्ति को क्यों नहीं समझा पाते हैं और वह व्यक्त्ति समझने में क्यों सक्षम नहीं होता। यह समझना अति आवष्यक है और दूसरों को समझाना भी। किन्तु दोनों ही अत्यंत कठिन कार्य हैं। आप देखेंगें कि एक बीज को उगने के लिए उपयुक्त वातावरण आवष्यक होता है। एक बीज को बोने का एक उचित समय होता है। जब बीज को विषेष तापमान, प्रभावषाली वातावरण, समुचित जल की उपलब्धि होती है तभी वह अंकुरित होंगा और एक वृक्ष के रूप में अभिवृद्ध होगा। बीज बोने के बाद यदि अत्यंत भारी वर्षा हो जाती है तो यह संपूर्ण बीज को नष्ट कर देगी। इस स्थिति में क्या करना चाहिए? हमें उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए और तब तक प्रयास करते रहना चाहिए जब तक हम उचित वातावरण प्राप्त नहीं कर लेते।
अध्यापन एक सरल कार्य नहीं है। यह अत्यंत चुनौतीपूर्ण और कठिन कार्य है। अध्यापकों को न केवल पुस्तक से बल्कि स्वयं एक उदाहरण बनकर पढ़ाने एवं सिखाने के लिए निरन्तर प्रयास करना चाहिए। अध्यापकों से विद्यार्थी प्रेेम ओर स्नेह की अपेक्षा करते हैं। वे अध्यापक के मात्र आंतरिक सौन्दर्य की प्रषंसा करते है और उसी से सीखते भी हैं।
एक षिक्षक अपने स्नेहपूर्ण एवं संरक्षणपूर्ण व्यवहार से आकर्षक बनता है न कि बाह्य रूप से। सौंदर्य आंतरिक होता है, यदि आप आंतरिक रूप से अच्छे हैं तो यह आपकी अच्छी प्रवृति को दर्षाता है। इसीलिए 70 वर्ष की आयु में भी आपके दादा-दादी का व्यक्तित्व आपको बहुत आकर्षक लगता है।
इसी कारण पूर्व राष्ट्रपति प्रो. अब्दुल कलाम आजाद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मदर टेरेसा जैसे महान व्यक्तित्व भी हमारी दृष्टि में सुंदर हैं क्योंकि ये सभी विनम्रता से परिपूर्ण हैं। किसी महान व्यक्ति का आंतरिक सौंदर्य हमें अत्यधिक ऊर्जावान एवं सकारात्मक बना देता है। इस आंतरिक सौंदर्य को कैसे विकसित किया जाए? इसका एक ही तरीका है -‘धन्यवाद‘ कहना । जितनी बार जितने अधिक लोगोें को आप धन्यवाद कह सके, कहिये और अपने मन को सुंदर बनाइये। जब कभी आप महसूस करें कि आपकी गलती है तुरन्त ‘क्षमा मांगिए। कभी-कभी तब भी क्षमा मांगिए जब आपने कुछ भी गलत नहीं किया। आपका ‘क्षमा’ शब्द (Sorry) जीवन की कई समस्याएं सुलझा सकता है। यह आपको अधिक विनम्र बनाएगा। यह आपके व्यक्तित्व को अधिक गरिमामय बनाएगा और आपके मन को सौंदर्य प्रदान करेगा।
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प्रेम एक चमत्कारिक एवं सार्वभौमिक शब्द है।

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अपनी प्रत्येक सुबह को आनन्दमय बनाइए। प्रतिदिन इसका स्वागत जोषपूर्ण होना चाहिए। हमें जीवन के प्रत्येक पल का आनन्द लेना चाहिए। जीवन का महत्वपूर्ण तत्त्व आपसी ’संबंध’ है। जो कि व्यक्ति में उत्साह एवं ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाते है, ऐसा तभी होता है जब पारस्परिक संबंध प्रेमपूर्ण एवं निःस्वार्थ हों। षिक्षक-विद्यार्थी संबंध एक सम्मानीय और प्रेमपूर्ण संबंध है। अध्यापन कार्य विद्यार्थी केन्द्रित होना अत्यन्त आवश्यक है, जो शिक्षक का विद्यार्थी के प्रति अगाध प्रेम दर्षाता है।
प्रेम सार्वभौमिक शब्द है। प्रेम चमत्कारी है। प्रकृत्ति हमें बिना किसी शर्त के प्रेम करती है। वर्षा हमें बिना किसी शर्त के प्रेम करना सिखाती है। यह प्रत्येक जीव को समान रूप से जल प्रदान करती है, प्रत्येक खेत में समान रूप से जल-वर्षा करती है। पृथ्वी हमें समान रूप से अन्न प्रदान करती है । पवन सभी स्थानों पर समान रूप से बहती है। ये सभी किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करतेे। सम्पूर्ण ब्रम्ह्ाण्ड प्रत्येक जीव को सार्वभौमिक रूप से बिना किसी जाति, वर्ग और धर्म संबंधी भेदभाव के प्रेम करता है।
दूसरों के प्रति दयाभाव रखिए। एक अच्छा सामाजिक संगठन बनाने का प्रयास कीजिए। जितना अधिक आप दूसरों को महत्व देंगे उतने ही अधिक मूल्यवान संबंध आप प्राप्त करेंगे। आप दूसरों को नहीं बदल सकते, आप स्वयं को ही बदल सकते हैं। लोगों की खुलकर प्रषंसा कीजिए। कृतज्ञ बनिए। प्रतिदिन नई बातें सीखिए। स्वयं में तथा ईष्वर में विष्वास रखिए।
संसार का एक सार्वभौमिक नियम है। जितना अधिक आप देते हैं, उतना अधिक आप प्राप्त करते हैं। किन्तु देने के पीछे मात्र षर्तहीन प्रेम का उद्देष्य होना चाहिए। इसके लिए आपको किसी भी प्रकार के लाभ की प्राप्ति के बारे में सोचे बिना निरन्तर देते रहने का भाव रखना होगा। मात्र इसी आधार पर आप मूल्यवान संबंध विकसित कर सकते है, जो लंबे समय तक चल पाएंगे और आपको कभी पछताना नही पड़ेगा।
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स्व-अनुभूति ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है।

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ज्ञान का सर्वोच्च स्तर क्या है? प्रत्येक व्यक्ति को संसार का थोड़ा बहुत ज्ञान तो है परन्तु कोई भी जीवन की समस्याओं से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाता क्योंकि सर्वश्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति अभी शेष है। ऐसा ज्ञान जो व्यक्ति को श्रेष्ठ व्यवसाय, रोजगार, और संतुष्टि प्रदान करता है, जो मानसिक चिड़चिड़ेपन (irritation) और ईर्ष्या (jealousy) को समाप्त करता है और जिससे भय, कमजोरी, लालच और लगाव समाप्त हो जाते हैं, यही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। यह ज्ञान सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य है, पूर्णतः सरल है और अत्यधिक प्रासंगिक है।
स्वयं की एक शरीर के रूप में नहीं, बल्कि एक आत्मा के रूप में पहचान करना ही सर्वाेच्च ज्ञान है। हम शरीर नहीं, बल्कि शरीर और आत्मा का संयोजन हैं। शरीर मस्तिष्क की पाँच संवेदनाओं द्वारा संचालित किया जाता है, जो बुद्धि द्वारा नियंत्रित की जाती हैं और हमारी बुद्धि हमारी आत्मा (चेतना) द्वारा नियंत्रित की जाती है।
मैं एक शक्तिषाली आत्मा हूँ। मैं एक ऊर्जा हूँ। यही ज्ञान का सर्वोच्च स्तर है। सर्वोच्च आत्मा ईष्वर है और मैं उसका एक भाग हूँ। यह ज्ञान यदि समझा जाए तो सभी समस्याओं का सरलता से समाधान हो पाएगा। ऊर्जा न तो कभी उत्पन्न की जा सकती है न कभी नष्ट की जा सकती है। ब्रह्माण्ड में सभी कुछ ऊर्जा ही है। हम सभी सर्वश्रेष्ठ ऊर्जा के अंश है। जिसे ‘ईष्वर‘ नाम दिया गया है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड इसी सर्वश्रेष्ठ ऊर्जा द्वारा संचालित किया जाता है।
जिस क्षण आप समझ पाते हैं कि ‘‘आप एक शक्तिषाली आत्मा हैं’’, आप कभी भयग्रस्त नहीं होंगें, लालच का अनुभव नहीं करेंगें तथा ईर्ष्या कभी नहीं करेंगें। आप संसार की प्रत्येक वस्तु को एक शक्तिषाली आत्मा के रूप में देखते हुए कोई भेदभाव और ईर्ष्या का भाव नहीं रखेंगे। अपना धैर्य सरलता से नहीं खोएंगे। यदि आप यह ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तो आप अपने मस्तिष्क, संवेदनाओं और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख पाएंगे, आप प्रतिक्रिया देने की अपेक्षा बुद्धिमानी के साथ कार्य कर पाएंगें। सभी ईष्वर की संतान है। आप अनुभव करेंगें कि सभी आपसे कहीं न कहीं और किसी न किसी रूप में संबधित हैं और हम सभी एक बड़े परिवार का अंग है।
‘‘मैं ईष्वर का एक अनिवार्य अंग हूँ’’ यह विचार कर आप असीम प्रसन्नता और एक सर्वोच्च शक्तिषाली स्त्रोत से जुड़ेगें। यही सर्वोच्च ज्ञान है जो स्वानुभूति लाता है, और ईष्वरानुभूति की ओर ले जाता है।

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अपना लक्ष्य निर्धारित कीजिए और अपने स्वप्न का अनुभव कीजिए।

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सोमवार, सप्ताह का पहला दिन जिसे निर्मल एवं उत्साहपूर्ण ऊर्जा के साथ प्रारंभ किया जाता है। यह ऊर्जा आपके चेहरे और व्यवहार में परिलक्षित होनी चाहिए। आपका चेहरा आपके मस्तिष्क में चल रहे भावों का सूचक है। कई बार आप नीरस जीवन जीते हैं तो आपके चेहरे पर उत्साहहीनता की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। अतः आपको अपनी प्रवृत्ति में सुधार करना होगा। जब आप मुस्कुराते हैं तो आपके चेहरे पर अलग ही सौंदर्य दिखाई देता है। जब आप ‘सेल्फी’ लेते हैं तो आप मुस्कुराते हैं, किन्तु यह मुस्कुराहट मात्र कुछ क्षणों के लिए होती है।
मेरी यही कामना है कि आप हर पल इसी प्रकार मुस्कुराते रहें क्यों कि यदि आपको ही आपका उत्साहहीन चेहरा पसन्द नही है तो दूसरे लोग इसकी प्रषंसा कैसे करेंगे। आपको यह बात सदैव याद रखनी होगी और यह आपकी आदत बन जाएगी जो भविष्य में सदैव आपके व्यवहार में परिलक्षित होगी। अपनी अध्ययन की मेज पर अपना लक्ष्य लिखें और उसे पढ़कर निरंतर उसकी ‘पुनरावृत्ति ( Repetition) कीजिए जो आपके लिए अत्यंत आवष्यक है। यदि आप किसी बड़े संस्थान में कभी जाते है तो पायेंगे कि वहाँ एक ओर ‘मिशन’ (Mission) लिखा होता है और दूसरी ओर ‘विजन’(Vission) लिखा होता है। उदाहरण के लिए नासा जैसे संस्थान का अपना मिशन और विजन है।
प्रत्येक व्यक्ति का जीवन मूल्यवान है और सबको अपना स्पष्ट मिशन और एक विजन अवष्य रखना चाहिए। अतः अपना लक्ष्य निर्धारित कीजिए। इससे आप अपने व्यवसाय, रोजगार तथा सम्पूर्ण ंजीवन का आनंद ले पाएंगे और समाज की श्रेष्ठ रूप से सेवा भी कर पाएंगे। यदि आप अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर प्रत्येक कार्य को नियोजित रूप से करते हैं तो निश्चित रूप से अपने स्वप्न को साकार कर पाएंगे। अतः आवष्यक है कि अपना लक्ष्य निर्धारित करने का प्रयास करें।
लक्ष्य की प्राप्ति हेतु स्वस्थ शरीर मनुष्य की पहली प्राथमिकता है। अतः आपको अपने शरीर को स्वस्थ रखने हेतुु उचित प्रयास करना चाहिए। इसके लिए प्रतिदिन सुबह 15 मिनट का व्यायाम (Exercise) अवष्य कीजिए जो आपको स्वस्थ रखेगा और आप संपूर्ण ऊर्जा के साथ कार्य कर पाएंगे एवं अपने प्रत्येक लक्ष्य की प्राप्ति कर पाएंगे।

 

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मोबाइल के समान हमें स्वयं को भी प्रतिदिन चार्ज (Charge) करना चाहिए।

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हमें सदैव ऊर्जावान रहना चाहिए। हम सभी शक्तिशाली हैं। हम उन लोगों को ऊर्जावान बना सकते हैं, जिनमे ऊर्जा बहुत कम होती है यदि हम सकारात्मक ऊर्जा से युक्त होते हैं तो इसका तात्पर्य है कि हमारे भीतर अत्यधिक ऊर्जा है। मोबाइल के समान हमें स्वयं को प्रतिदिन चार्ज करना चाहिए।
यदि हम सूर्योदय के समय सूर्य की किरणों के समक्ष होते हैं तो हमें सूर्य से संसार की सर्वश्रेष्ठ ऊर्जा प्राप्त होती है और सूर्यग्रहण के समय चारों ओर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक किरणें व्याप्त रहती हैं। सूर्य अथाह ऊर्जा का स्त्रोत है। शक्तिषाली होने के लिए हमें ऊर्जावान होना पड़ेगा। यदि हमें ऊर्जा प्राप्त करने की प्रक्रिया ज्ञात नहीं है, तो प्रातःकाल जल्दी उठकर संसार के सौंदर्य को महसूस करने का प्रयास करना होगा। ऊर्जा हमें सकारात्मक जीवन जीने हेतु प्रोत्साहित करती है। मेडिटेशन द्वारा स्वयं को पूर्णतः एकाग्रचित्त और समर्पित कर हम स्वयं में सकारात्मक ऊर्जा विकसित कर सकते हैं।
ऊर्जा प्राप्त करने हेतु हमें कछुए की तकनीक अपनानी होगी जो आवष्यकतानुसार अपने अंगों को समेट और फैला सकता है। इसी प्रकार मेडिटेशन के द्वारा हम स्वयं के भीतर झाँकते है। यह एक आंतरिक यात्रा है। इसके द्वारा हम अपने मस्तिष्क को एकाग्रचित्त कर पाते हैं। अपने मस्तिष्क को शक्तिषाली बनने दीजिए ताकि आप स्वस्थ रह सकें। यदि आप में नकारात्मक ऊर्जा है तो आप शीघ्र रोगग्रस्त हो जाएंगे।
यदि आप एक षिक्षक हैं तो आपके चारों ओर कई विद्यार्थी होंगें जो आपसे निरंतर पढ़ने और कार्य करने की ऊर्जा प्राप्त करने आते हैं। अतः सर्वप्रथम षिक्षकों को स्वयं ऊर्जावान होना चाहिए ताकि वे विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर सकें। उदाहरणस्वरूप नर्सिंग व्यवसाय में आप बीमार व्यक्तियों से घिरे होते हैं जिनमें ऊर्जा कम होती है। उनकी सेवा के लिए आप में अधिक सकारात्मक ऊर्जा होनी चाहिए। मरीजां को स्वस्थ होने और सकारात्मक रहने की ऊर्जा देकर ही उन्हें स्वस्थ किया जा सकता हैं। अतः हम सभी को मेडिटेशन करना चाहिए ताकि हम श्रेष्ठ ऊर्जा प्राप्त कर सकें और समाज को सर्वोत्तम ऊर्जा दे सकंे।
प्रतिदिन प्रार्थना करने हेतु समय निकालिए। बाहरी संसार की अपेक्षा स्वयं के भीतर ध्यान केंद्रित कीजिए। संसार के प्रत्येक जीव के लिए सदैव कृतज्ञ रहिए। ऐसे मनुष्य बनिए जो सदैव दूसरों की सेवा करने हेतु तैयार रहे, तथा सभी को प्रोत्साहित करे। आइए! इस संसार को सकारात्मक ऊर्जा से युक्त पवित्र स्थान बनाएँ।

अन्य प्रष्न जिसका उत्तर दिया जाना चाहिए, अपनी इच्छा शक्ति को कैसे बढ़ाया जाए, ताकि अत्यधिक ऊर्जा प्राप्त कर सकें, जो जीवन जीने हेतु पर्याप्त और समुचित हो।
उक्त प्रष्न का उत्तर देने हेतु हम तीन प्रमुख शब्दों पर ध्यान केन्द्रित करेंगें-
प्रथम मुख्य शब्द है- समर्पण। यदि आप समर्पित रहते हैं तो आप सभी कुछ प्राप्त कर सकते है। आपको अपने संकल्प के प्रति पूर्णतः समर्पण करना होगा।
द्वितीय मुख्य शब्द है- कठिन परिश्रम। हमें कठिन परिश्रम करना होगा, क्योंकि जीवन में इसका कोई अन्य विकल्प नहीं है।
अंतिम मुख्य शब्द है- ध्यान केन्द्रित करना। अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करना। हम इसी के द्वारा अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। यदि हम इन शब्दों का अर्थ समझते है और इन्हें अपनी अभिवृत्ति में अपना लेते हैं तो हम एक सफल मनुष्य बन जाएंगें। हम लोगों को प्रसन्न रख पाएंगें और एक अत्यंत उत्तरदायी मनुष्य बन जाएंगें। आइए, हम सब संगठित हो जाएँ ताकि हम सभी अच्छे मनुष्य बन पाएं और यह संसार एक सुरम्य स्थान बन पाए।

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